Tuesday, July 14, 2020

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 74 [ एक आहंग-दो नाम ]

        उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 74 [ आहंग एक-नाम दो ]

    आज शकील बदायूँनी की ग़ज़ल केचन्द अश’आर मुलाहिज़ा फ़रमाएँ
 शकील बदायूँनी साहब का परिचय देने की कोई ज़रूरत नहीं है--आप सब लोग
परिचित होंगे।
अभी इन अश’आर का लुत्फ़ [आनन्द] उठाएँ ---इसके "बह्र" की बात बाद में करेंगे

लतीफ़ पर्दों से थे नुमायाँ मकीं के जल्वे मकाँ से पहले
मुहब्बत आइना हो चुकी थी  वुजूद-ए-बज़्म-ए-जहाँ  से  पहले

न वो मेरे दिल से बाख़बर थे ,न उनको एहसास-ए-आरज़ू था
मगर निज़ाम-ए-वफ़ा था क़ायम कुशूद-ए-राज़-ए-निहाँ से पहले

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अज़ल से शायद लिखे हुए थे ’शकील’ क़िस्मत में जौर-ए-पैहम 
खुली जो आँखे इस अंजुमन में ,नज़र मिली आस्माँ  से पहले

 एक दूसरी ग़ज़ल --के चन्द अश’आर--

न अब वो आँखों में बरहमी है ,न अब वो माथे पे बल रहा है
वो हम से ख़ुश हैं ,हम उन से ख़ुश हैं ज़माना करवट बदल रहा है

खुशी न ग़म की ,न ग़म खुशी का अजीब आलम है ज़िन्दगी का
चिराग़-ए-अफ़सुर्दा-ए-मुहब्बत न बुझ रहा है न जल  रहा है

ये काली काली घटा ये सावन फ़रेब-ए-ज़ाहिद इलाही तौबा
वुज़ू में मसरूफ़ है बज़ाहिर ,हक़ीक़तन हाथ मल रहा है 

 एक और ग़ज़ल --के चन्द अश’आर

स इक निगाहे करम है काफी अगर उन्हे पेश-ओ-पस नहीं है
ज़ह-ए-तमन्ना कि मेरी फ़ितरत असीर-ए-हिर्स-ए-हवस नहीं है

कहाँ के नाले ,कहाँ की आहें जमी हैं उनकी तरफ़ निगाहें
कुछ इस तरह मह्व-ए-याद हूँ मैं कि फ़ुरसत-ए-यक नफ़स नहीं है
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ऐसे ही चन्द अश’आर अल्लामा इक़बाल साहब की एक ग़ज़ल के ---

ज़माना आया है बेहिज़ाबी का आम दीदार-ए-यार होगा
सुकूत था परदावार जिसका वो राज़ अब आशकार होगा

खुदा के आशिक़ तो है हज़ारों बनों में फिरते है मारे मारे
मै उसका बन्दा बनूँगा जिसको ख़ुदा के बन्दों से प्यार होगा

न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही क़ैफ़ियत है उसकी
कहीं सर-ए-रहगुज़ार बैठा सितम-कशे इन्तिज़ार  होगा

 आप इन अश’आर को पढ़िए नहीं ।गुनगुनाइए --धीरे  गुनगुनाइए --गाइए तब इस आहंग का
 आनन्द आयेगा । ये सभी ग़ज़लें गूगल पर मिल जायेगी ।
अगर ’पढ़ना" ही है तो इनको  पढ़िए नहीं --समझिए--भाव समझिए -- तासीर [ प्रभाव ] समझिए --शे’रियत समझिए
तग़ज़्ज़ुल  समझिए--मयार देखिए--बुलन्दी समझिए--फिर देखिए कि हम लोग कहाँ खड़े हैं ।

 कितना दिलकश  आहंग है । इस बह्र में और भी शोअ’रा [ शायरों ] ने
अपनी अपनी ग़ज़ले कहीं है --मुनासिब मुक़ाम [ उचित स्थान] पर उनकी भी चर्चा करूँगा।
। आहंग [लय ] से पता चल गया होगा ।ये तमाम ग़ज़लें एक ही बहर में हैं ।
और वो आहंग है --
A 121--22  / 121--22 // 121--22 / 121--22 
  बह्र-ए-मुक़्तज़िब मुसम्मन मख़्बून मरफ़ूअ’ , मख़्बून मरफ़ूअ’ मुसक्किन मुज़ाइफ़
बड़ा लम्बा नाम है -मख्बून --मक्फ़ूफ़ -सब ज़िहाफ़ का नाम है ।

B 121-22 /121--22 / 121--22 / 121-22 
इसी आहंग का दूसरा नाम भी है 
बह्र-ए-मुतक़ारिब मक़्बूज़ असलम मुसम्मन मुज़ाहिफ़ 

यानी बह्र एक --नाम दो ? दोनो ही मुज़ाइफ़--।दोनो ही 16-रुक्नी॥ दोनो ही दो-दो- रुक्न का इज़्तिमा [ मिला हुआ ] है
शकल भी बिलकुल एक जैसी ।

बस ,यहीं पर controversy है ।
 कुछ अरूज़ की किताबों में --A- की सही मानते हैं  और  इसे  बह्र-ए-मुक़्तज़िब के अन्दर रखते है
कुछ अरूज़ की किताबों में --B -को सही मानते है । बह्र-ए-मुतक़ारिब के अन्दर रखते है
दोनों की अपनी अपनी दलाइल [ दलीलें ] हैं । अपने अपने ’जस्टीफ़िकेशन ’ हैं ।

-A-सही माना भी जाए कि -B- सही माना जाए।

आप इस चक्कर में क्यों पड़ें ?----बस ग़ज़ल  गुनगुनाए और रसास्वादन करें

चलिए पहले - B -पर चर्चा कर लेते है ।

B 121-22 /121--22 / 121--22 / 121-22
इसी आहंग का नाम  है
बह्र-ए-मुतक़ारिब मक़्बूज़ असलम मुसम्मन मुज़ाहिफ़

मुतक़ारिब का बुनियादी रुक्न है --"फ़ऊलुन--[ 1 2 2 ]

फ़ऊलुन [ 1 2 2 ] + क़ब्ज़ =  मक़्बूज़ =फ़ऊलु =1 2 1
फ़ऊलुन [ 1 2 2 ]  + सलम = असलम =फ़अ’ लुन = 2 2
[ कब्ज़ और सलम --ये सब ज़िहाफ़ है । और इनके  अमल के  के निज़ाम [ व्यवहार की नियम  ] है । यह खुद में
एक अलग विषय है --इसमे विस्तार में जाने से बेहतर है कि हम बस इसे यहाँ मान लें ।

अर्थात [ 121--22 ]    एक आहंग बरामद हुआ । अब इसी की तकरार [ repetition ] करें

मिसरा में 4-बार या शे’र में 8-बार तो उक्त आहंग मिलेगा
चूँकि  शे’र 16- अर्कान हो जायेंगे अत: इसे 16-रुक्नी बह्र भी कहते है    ।

अब इक़बाल के अश’आर की तक्तीअ’ इसी बह्र  से करते हैं---

1  2  1---2 2  /  1 2 1--2 2  / 1  2 1 - 2 2 / 1  2 1-2 2
ज़मान: -आया / है बे हि-ज़ाबी /का आम -दीदा /र यार -होगा

  1  2  1 - 2 2  / 1 2 1- 2  2    /  1 2 1 --2  2   / 1 2 1-2 2
सुकूत -था पर /द: वार -जिसका / वो राज़ -अबआ /शकार -होगा

{ ध्यान दीजिये --अब-आशकार - में =अलिफ़ की वस्ल नहीं हुई है ?
क्यों नहीं हुई ?  ज़रूरत ही नहीं पड़ी । बह्र या रुक्न ने मांगा ही नहीं ।
माँगता तो ज़रूर करते ।

बाक़ी 2-अश’आर की तक़्तीअ’ आप कर के देख लें ।कही शे’र
बह्र से ख़ारिज़ तो नहीं हो रही है ? अभ्यास का अभ्यास हो जायेगा -
आत्म विश्वास का आत्म विश्वास बढ़ जायेगा ।

अब -A-  वाले आहंग पर आते हैं --
A 121--22  / 121--22 // 121--22 / 121--22 
  बह्र-ए-मुक़्तज़िब मुसम्मन मख़्बून मरफ़ूअ’ , मख़्बून मरफ़ूअ’ मुसक्किन मुज़ाइफ़
मुक़तज़िब का बुनियादी अर्कान है --- मफ़ऊलातु--मुस तफ़ इलुन ---मफ़ऊलातु---मुस तफ़ इलुन
यानी   2221---2212------2221-----2212

मफ़ऊलातु [ 2221 ] + ख़ब्न + रफ़अ’  =  मुज़ाहिफ़ मख़्बून मरफ़ूअ’  1 2 1 = फ़ऊलु [ 1 2 1 ] बरामद होगा
मुस तफ़ इलुन [ 2 2 1 2 } + ख़ब्न + रफ़अ’+ तस्कीन =  मुज़ाहिफ़ मख़्बून मरफ़ूअ’ मुसक्किन = 2 2 = फ़अ’ लुन  बरामद होगा

[ ख़ब्न  और रफ़अ’ --ये सब ज़िहाफ़ है । और इनके  अमल के  के निज़ाम [ व्यवहार की नियम ] है । यह खुद में
एक अलग विषय है --इसमे विस्तार में जाने से बेहतर है कि बस आप इसे यहाँ मान लें ।

अब इस औज़ान से शकील के किसी शे’र का तक़्तीअ’ करते है और देखते हैं --
 1   2   1 - 2   2 /  1 2  1  - 2 2  /  1 2  1  - 2 2 / 1 2   1 - 2 2
न अब वो -आँखों /में बर ह  -मी है ,/न अब वो -माथे /पे बल र-हा है

  1   2   1 - 2   2   / 1  2   1  - 2  2   /  1 2 1 - 2  2    / 1 2 1 - 2 2
वो हम से -ख़ुश हैं ,/ ह मुन से  -ख़ुश हैं / ज़मान: -कर वट /ब दल र -हा है[

[ध्यान दीजिए-- हम-उन से - में -मीम- के साथ अलिफ़ का वस्ल हो गया और
ह मुन से [ 1 2 1 ]  रख दिया ।
क्यों भाई ? इसलिए कि  कि ज़रूरत पड़ गई । बह्र या रुक्न मांग रहा है  यहाँ ।

बाक़ी 2-अश’आर की तक़्तीअ’ आप कर के देख लें ।कही शे’र
बह्र से ख़ारिज़ तो नहीं हो रही है ? अभ्यास का अभ्यास हो जायेगा
आत्म विश्वास का आत्म विश्वास बढ़ेगा ।

अब सवाल यह है कि --जब दोनो आहंग एक हैं --तो नाम क्यों मुखतलिफ़ है ।
सही नाम क्या होगा ?
सही नाम मुझे भी नहीं मालूम } दोनो किस्म के अरूज़ियों की अपनी अपनी दलीले हैं
-A--वालों का कहना है [ जिसमे मैं भी हूँ --जब कि मैं अरूज़ी नहीं हूँ -एक अनुयायी हूँ ]
कि -B - वाले सही नही हैं । कारण कि ज़िहाफ़ ’सलम’ [ मुज़ाहिफ़ "असलम ’-एक खास
ज़िहाफ़ है जो शे’र के सदर/इब्तिदा के लिए मख़्सूस [ ख़ास] है --वो हस्व में लाया ही नही जा सकता
तो  zihaaf ka निज़ाम कैसे सही होगा ?

खैर --आप तो ग़ज़ल के आहंग का मज़ा लीजिए--- गुनगुनाइए--गाइए --- अरूज़ की बात अरूज़ वाले जाने ।

[नोट ; इस मंच पर मौजूद असातिज़ा [ गुरुजनों ] से दस्तबस्ता गुज़ारिश [करबद्ध प्रार्थना ] है अगर कुछ ग़्लर
बयानी हो गई हो तो बराय मेहरबानी निशानदिहि [ रेखांकित ] कर दे कि जिससे मै आइन्दा [ आगे से] खुद
को दुरुस्त कर सकूँ ।

सादर
-आनन्द.पाठक-