बुधवार, 17 जून 2020

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : किस्त 73 [ एक सामान्य बातचीत 02 ]

         उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त--- [ सामान्य बातचीत ]

[ नोट - वैसे तो यह बातचीत उर्दू बह्र के मुतल्लिक़ तो नहीं है --शे’र-ओ-सुखन पर एक सामान्य बातचीत ही है 
मगर अक़्सात के सिलसिले को क़ायम रखते हुए इसका क़िस्त नं0 दिया है कि मुस्तक़बिल में आप को इस क़िस्त
को ढूँढने में सहूलियत हो ]

उर्दू शायरी में या शे’र में आप ने --पे --या -पर-- के -या  कर  का प्रयोग होते हुए देखा होगा ।
 आज इसी पर बात करते हैं
मेरे एक मित्र ने अपने चन्द अश’आर भेंजे । कुछ टिप्पणी भी की । ये अश’आर बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ में थे ।
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2122-- 1212-- 22/112

हँस कर भी मिला करे कोई
मेरे ग़म की दवा करे कोई।

छोङ के वो चला गया मुझको ,
लौटने की दुआ करे कोई।

जिस पर मैने टिप्पणी की थी

--हँस  "कर"  भी--- [ -कर की जगह -के- कर लें ]
---छोड़  ’के’ वो चला --     [के- की जगह -कर- कर लें ]

मेरे एक मित्र ने पूछा ’क्यों ?
यह बातचीत उसी सन्दर्भ में हो रही है ।
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3-  इसी मंच पर [ शायद ]बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ के बारे में एक बातचीत की  थी और ग़ालिब के एक ग़ज़ल
’दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है -- जो इसी बह्र में है ,पर भी चर्चा की थी । हालांकि इस बह्र के मुतल्लिक़
और भी कुछ बातें थी जिस पर चर्चा नहीं कर सका था । इंशा अल्लाह ,कभी मुनासिब मुक़ाम पर फिर चर्चा कर लेंगे

अब इन अश’आर की तक़्तीअ’ पर आते है--

  2    2   2   / 1 2  1 2 /  2 2 
हँस कर भी /मिला करे/ कोई =          
2  1  2  2   /  1  2 1 2 / 2 2 
मेरे ग़म की /दवा करे /कोई।

 2 1  2   2  / 1 2 1 2  / 2 2
छोङ के वो/ चला गया /मुझको ,
2  1  2  2 / 1 2 1 2  / 2 2
लौटने की /दुआ करे /कोई।

पहले शे’र के सदर के मुक़ाम पर फ़ाइलातुन [ 2122] या फ़इ्लातुन [ 1 1 2 2 ] नहीं आ रहा है जब कि आना चाहिए था ।अत:
शे’र बह्र से ख़ारिज़ है ।


-पर- और -कर- यह दोनॊ लफ़्ज़ खुल कर अपनी आवाज़ देते है यानी तलफ़्फ़ुज़ एलानिया होता है और -2- के वज़न पर लेते है ।

यहाँ -के  [ यहां -के- संबंध कारक नहीं है -जैसे राम के पिता --आप के घर ]
 बल्कि  यह -कर - का  वैकल्पिक प्रयोग है । यहाँ -पे-कहना बेहतर कि -के- कहना बेहतर का सवाल नहीं
साधारण बातचीत और नस्र में प्राय: -कर- और -पर- ही बोलते हैं । दोनो के अर्थ भाव बिलकुल एक है ।
 मगर पर शायरी में वज़न के लिहाज़ से  यह दोनो ’मुख़तलिफ़’ हैं

 । -के - अपना  वज़न [-1-[ मुतहर्रिक ] और -2-[ सबब ]  बह्र की माँग पर दोनों ही धारण कर सकता  है
लेकिन - कर- /-पर- कभी -1- का वज़न धारण  नहीं कर सकता । अत: जहाँ -2- के वज़न की ज़रूरत है वहाँ पर आप के पास
दोनों विकल्प मौज़ूद है मगर - कर/-पर- -- का प्रयोग ही वरेण्य है ।
जहाँ -1- की ज़रूरत है वहाँ -के-/-पे- का ही प्रयोग उचित है । बाक़ी तो शायर की मरजी है ।

हँस कर भी ---/ में एक सबब [2] कम है अत: चलिए फिलहाल इसे -तो- से भर देते हैं । यह फ़ाइलातुन  [2 1 2 2  ] तो नहीं हुआ ।
/हँस कर भी तो / कर देते है । -तो - से वज़न [ 2 2 2 2 ] वज़न हो गया --जो ग़लत हो गया ।
 फिर? -
कर [2]- को -के [1 ]  कर देते हैं । विकल्प मौजूद है ।आप के पास
/हँस के भी तो /--- से  2  1  2  2   =फ़ाइलातुन = अब सही हो गया  } लेकिन -तो- को यहाँ  मैने भर्ती के तौर पर डाला था । जी बिल्कुल दुरुस्त । ऐसे लफ़्ज़ को

’भरती का लफ़्ज़ " ही कहते है । भरती के शे’र और भरती के लफ़्ज़ -पर किसी और मुक़ाम पर बात करेंगे ।
तो फिर ?
कुछ नहीं --

इसे यूँ कर देते है
/मुस्करा कर / = मुस-क-रा -कर /= 2 1 2 2 == फ़ाइलातुन= यह भी वज़न सही है । विकल्प आप के पास है --मरजी आप की।

इसी प्रकार

-/छोड़ के वो / = 2 1 2 2 = कोई कबाहत नहीं =दुरुस्त है ।
मगर आप के पास
 -के [2 ]- बजाय -कर  [2] का  दोनों विकल्प मौज़ूद है । कम से कम --कर - खुल कर साफ़ साफ़ आवाज़ तो देगा  । और विकल्प भी है आप के पास । अपनी अपनी पसन्द है । -इस मुकाम पर -कर-
 ही वरेण्य है -अच्छा लगता । बाक़ी शायर की मरजी ।
 यानी
/ छोड़ कर वो / 2 1  2 2  = फ़ाइलातुन =



यह सब मेरी ’राय’ है  कोई "बाध्यता " नहीं  और  नही  अरूज़  में ऐसा कूछ लिखा ही है ।
सादर
 [ असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कोई ग़लत बयानी हो गई हो तो बराये मेहरबानी निशान दिही फ़र्मा देंगे ताकि आइन्दा खुद को दुरुस्त कर सकूँ ।

-आनन्द.पाठक-

बुधवार, 10 जून 2020

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 72 [ अपनी एक ग़ज़ल की बह्र और तक़्तीअ’ ]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 72 [ अपनी एक  ग़ज़ल की बह्र और तक़्तीअ’ ]
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 कुछ दिन पहले किसी मंच पर मैने अपनी  एक ग़ज़ल पोस्ट की थी 

ग़ज़ल : एक समन्दर ,मेरे अन्दर...

एक  समन्दर ,  मेरे  अन्दर  
शोर-ए-तलातुम बाहर भीतर 1

एक तेरा ग़म  पहले   से ही 
और ज़माने का ग़म उस पर 2

तेरे होने का भी तसव्वुर  
तेरे होने से है बरतर    3

चाहे जितना दूर रहूँ  मैं  
यादें आती रहतीं अकसर  4

एक अगन सुलगी  रहती है 
वस्ल-ए-सनम की, दिल के अन्दर 5

प्यास अधूरी हर इन्सां  की   
प्यासा रहता है जीवन भर 6

मुझको ही अब जाना  होगा   
वो तो रहा आने  से ज़मीं पर 7

सोन चिरैया  उड़ जायेगी     
रह जायेगी खाक बदन पर    8

सबके अपने  अपने ग़म हैं 
सब से मिलना’आनन’ हँस कर 9
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जिस  पर कुछ सदस्यों ने उत्साह वर्धन किया था ।
और कुछ मित्रों ने इसकी बह्र जाननी चाही ।
 उन सभी सदस्यों का बहुत बहुत धन्यवाद।
यह आलेख उसी सन्दर्भ में लिखा गया है 
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वैसे इस ग़ज़ल की 
मूल बह्र है --[ बह्र-ए-मुतक़ारिब असरम मक़्बूज़ मक़्बूज़ सालिम अल आख़िर ]
अर्कान हैं   ----फ़अ’ लु--- फ़ऊलु--फ़ऊलु---फ़ऊलुन 
अलामत है 21--       121--   121-     -122 
जिस पर आगे चर्चा करेंगे अभी

यह आलेख उसी सन्दर्भ में लिखा गया है 
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इस ग़ज़ल की बह्र और तक़्तीअ’ पर आएँ ,उसके पहले कुछ अरूज़ पर कुछ
बुनियादी बातें कर लेते है ।
1- बह्र-ए-मुतक़ारिब कहने से हम लोगों के ज़ेहन में -मुतक़ारिब की 2-4 ख़ास बहरें ही उभर आती है जिसमे            अमूमन 
हम आप शायरी करते है । जैसे - मुसम्मन सालिम ,मुसद्दस सालिम या फिर इसकी कुछ महज़ूफ़ या           मक्सूर  शकल की ग़ज़लें
या ज़्यादा से ज़्यादा मुरब्ब: की कुछ शकलें
2- इन के अलावा भी और भी बहुत सी बहूर है मुतक़ारिब के जिसमें बहु्त कम शायरी की गई है  या की         जाती  है । ऊपर लिखी 
बह्र भी इसी में से एक बह्र है।
3- अगर कोई बह्र अरूज़ के उसूल के ऐन मुताबिक़ हो और अरूज़ के किसी कानून, उसूल या क़ायदा की कोई खिलाफ़वर्जी 
न करती हो -तो वह बह्र इस बिना पर रद्द या ख़ारिज़ नहीं की जा सकती कि इसका उल्लेख अरूज़ की कई किताबों में नहीं किया गया है ।या शायरों नें
इस बह्र में तबाज़्माई नहीं की है ।
4- वैसे तो बहर-ए-वफ़ीर में भी बहुत कम या लगभग ’न’ के बराबर शायरी की कई है तो क्या अरूज़ की किताबों से बह्र-ए-वाफ़िर को रद्द या ख़ारिज़ 
कर देना चाहिए ?
5-       यह अरूज़ और बह्र की  नहीं ,यह हमारी सीमाएँ हैं हमारी कोताही है  कि हम ऐसे बह्र में शायरी नहीं करते ।बहूर तो बह्र-ए-बेकराँ है ।
6- कुछ मित्रों ने इसे बह्र-ए-मीर से भी जोड़ने की कोशिश की । मज़्कूरा बह्र " बह्र-ए-मीर" भी नहीं है । जो सदस्य बह्र-ए-मीर के बारे में मज़ीद मालूमात चाहते 
हैं वो मेरे ब्लाग पर " उर्दू बह्र पर एक बातचीत :क़िस्त 59 [ बह्र-ए-मीर ] देख सकते हैं । वहाँ तफ़्सील से लिखा गया है ।
7- मैने इस  ग़ज़ल में कहीं  नही कहा कि इसकी बह्र" ---’ यह है । ध्यान से देखें तो मैने ’’मूल" बह्र है -----" लिखा है जिसका अर्थ होता है  कि इस "मूल’  बह्र से और भी 
मुतबादिल औज़ान बरामद हो सकते है जो मिसरा में एक दूसरे के बदले लाए जा सकते हैं । अरूज़ में और शायरी में इस की इजाज़त है ।
इन ’मुतबादिल औज़ान ’ और  बह्र की चर्चा  और ग़ज़ल की तक़्तीअ आगे करेंगे ।
8- यह यह एक " ग़ैर मुरद्दफ़" ग़ज़ल [ यानी वह ग़ज़ल जिसमें रदीफ़ नहीं होता ] है 

अब ग़ज़ल की बह्र पर  आते हैं

 1- मैने मूल बह्र में ही इशारा कर दिया था कि इस बह्र का आख़िरी रुक्न सालिम [फ़ऊलुन 1 2 2 ] है । अत: यह मुतक़ारिब की ही कोई बह्र होगी।
2-  आप बह्र-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम से ज़रूर  परिचित होंगे --
फ़ऊलुन---फ़ऊलुन --फ़ऊलुन--फ़ऊलुन
 यानी     1  2   2---1   2  2----1 2 2 2---1 2 2 
--A---------B---------C_--------D
अब इन्हीं अर्कान [तफ़ाईल] पर मुनासिब ज़िहाफ़ लगा कर देखते हैं क्या होता है ।

अगर A=फ़ऊलुन [ 1 2 2 ] पर ’सरम’ का ज़िहाफ़ लगाएँ तो जो मुज़ाहिफ़ रुक्न हासिल होगी उसका नाम ’असरम’ होगा और यह सदर और इब्तिदा
के मुक़ाम पर लाया जा सकता है

फ़ऊलुन [ 1 2 2 ]+ सरम =  असरम ’ फ़ अ’ लु ’  [ 2 1 ] बरामद होगा । -ऐन -साकिन   -लु- मुतहर्रिक [1] है यहाँ

अगर B= फ़ऊलुन [ 1 2 2 ] पर  ’कब्ज़’ का ज़िहाफ़ लगाया जाय तो मुज़ाहिफ़ रुक्न हासिल होगा उसका नाम होगा ’मक़्बूज़’

और यह आम ज़िहाफ़ है और ’हस्व’ के मुक़ाम पर लाया जा सकता है ।

फ़ऊलुन [1 2 2 ]  + कब्ज़  = मक़्बूज़ "फ़ ऊ लु " [ 1 2  1 ]बरामद होगा /  -लाम - [1]  मुतहर्रिक है 

फ़ऊलुन [ 1 2 2 ] तो ख़ैर फ़ऊलुन ही है । सालिम रुक्न  है ।
 तो अब मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम [ 122---122---122---122 ] की मुज़ाहिफ़ शकल
यूँ हो जायेगी

फ़ अ’ लु ’  ----फ़ ऊ लु -----फ़ ऊ लु ----फ़ऊलुन 
21-----------1 2  1 --------1 2 1 -------1  2  2
A                    B                   C                     D

इसी बह्र को मैने "मूल बह्र’ कहा है
 अब इस ’मूल बह्र ’ से हम आगे बढ़ते है --तख़्नीक- के अमल से
आप जानते हैं कि ’तख़्नीक’ का अमल सिर्फ़ ’मुज़ाहिफ़ रुक्न ’ पर ही लगता है । सालिम रुक्न पर कभी   नहीं  करता  ।
तो ऊपर जो ’मुज़ाहिफ़ ’ रुक्न  हासिल हुआ है उस पर अमल हो सकता है [ मात्र आखिरी रुक्न को छोड़ कर जो एक सालिम रुक्न है ]

 यहाँ ’तख़नीक़’ के अमल की  थोड़ी -सी चर्चा कर लेते है।
अगर किसी दो-पास पास वाले मुज़ाहिफ़  रुक्न [ adjacent rukn ] में ’तीन’ मुतहर्रिक हर्फ़ एक साथ ’ आ जायें तो "बीच वाला ’ हर्फ़ साकिन हो जायेगा

हमारे केस में ’तीन मुतहर्रिक हर्फ़ " -दो-पास पास वाले मुज़ाहिफ़  रुक्न [ adjacent rukn ] में आ गए हैं तो तख़नीक़ का अमल होगा ।
-फ़े-  लाम -और -ऐन-

  अगर  यह अमल आप  A--B---C---D  पर  ONE-by-ONE लगाएँगे तो आप को कई मुतबादिल औज़ान बरामद होंगे। आप ख़ुद कर के देख लें ।
मश्क़ की मश्क़ हो जायेगी और आत्मविश्वास भी बढ़ जायेगा ।
कुछ मुतबादिल औज़ान नीचे लिख दे रहा हूँ ---
E 21---122---22--22  
F 22---22----21-122
G 21---122----22--22
H 21--122---21---122
J 22---22--22---22-

इस अमल से एक वज़न यह भी बरामद होगा --जो मैने मतला के दोनो मिसरा में इस्तेमाल किया है ।और यह वज़न अरूज़ के  ऎन क़वानीन के मुताबिक़ है
और अरूज़ के किसी क़ाईद की ख़िलाफ़वर्ज़ी भी नहीं किया मैने ।

अच्छा । आप इस अरूज़ी तवालत से बचना चाह्ते हैं तो   A--B--C--D वाले रुक्न में एक आसान रास्ता भी है ।
 आप 1+1 =2 कर दीजिए तो भी काम चल जायेगा  । बहुत से मित्र प्राय: यह पूछते रह्तें हैं कि क्या हम 1+1= 2 मान सकते है ।
हाँ बस इस विशेष मुक़ाम पर मान सकते हैं । और किसी जगह नहीं । । यह रास्ता बहुत दूर तक नहीं जाता।बस यहीं तक जाता है ।
क्यों?
क्योंकि जब आप 1+1 को दो मानना शुरु कर देंगे तो
कामिल की बह्र का बुनियादी रुक्न है  ’मु त फ़ाइलुन  1 1 2 1 2 ] तो 2 2 1 2 हो जायेगा यानी  ’मुस तफ़ इलुन [2 2 1 2 ] हो जायेगा जो बह्र-ए-रजज़ का बुनियादी रुक्न है
यह तो फिर ग़लत हो जायेगा।
वैसे ही
वाफिर  की बह्र का बुनियादी रुक्न है  ’मुफ़ा इ ल तुन [ 1 2 1 1 2 ] तो  12 2 2  हो जायेगा यानी ’मफ़ाईलुन  [ 1 2 2 2  ]’ जो बह्र-ए-हज़ज ’ का बुनियादी रुक्न है ।
यह तो फिर ग़लत हो जायेगा।

इसीलिए कहता हूँ कि 1+1 = 2 हर मुक़ाम पर नहीं होता ।

अब अपनी ग़ज़ल की तक़्तीअ’ कर के देखते है कि यह बह्र में है या बह्र से ख़ारिज़ है "
21--     -/-122--     /     2  2 /  2 2 = E
एक       / स मन दर /   मेरे  /अन दर
21-----/1 2 2 /  2 2 /   2 2 = =E
शोर-ए-तलातुम बाहर / भीतर 1       = शोर-ए-तलातुम में कसरा-ए-इज़ाफ़त से शोर का -र- मुतहर्रिक हो जायेगा। और -र- खींच कर [इस्बाअ’] नहीं पढ़ना है

21---/ 1 2 2  /  2 2    / 2 2 =E
एक/ तिरा ग़म /  पहले  / से ही   
2  1   / 1 2 2 / 2 2     / 2 2 =E
और /ज़माने /का ग़म /उस पर 2

22   /  22  / 2  1  /  1 2 2  =F
तेरे / होने  /का भी /तसव्वुर
2  2   / 2  2 / 2 2 / 2 2 =J
तेरे   /होने   / से है / बरतर    3

2  2 /  2 2    / 21 / 1 2 2 =F
चाहे /जितना /दूर /रहूँ  मैं
22    / 22   / 2 2  /  2 2 =J
यादें /आती /रहतीं /अकसर  4

2 1  / 1 2   2    / 2 2 / 2 2 =E
एक /अगन सुल/गी  रह/ती है
2   1  /   1 2  2  / 2 2     / 2 2 =E
वस्ल-ए-सनम की, दिल के / अन्दर 5

21     / 1 2  2 / 2  2  /  2 2 = E
प्यास /अधूरी /हर इन्/साँ  की 
2   2    / 2 2   / 2  2/   2  2 =J
प्यासा /रहता /है जी   /वन भर 6

2      2   / 2  2  / 2 2   / 2 2  =J
मुझको /ही अब /जाना  /होगा 
2     1  / 1 2 2  / 2  1 / 1 2 2 =H
वो तो /  रहा आ / ने  से ज़मीं पर  7

2   1   /  122  / 2  2  /  2 2 =G
सोन /चिरैया  /उड़ जा/ येगी   
2  2     / 2  2 / 2 1  / 1 2 2 =F
रह जा/येगी /खाक /बदन पर    8

2     2   /   2  2/   2 2 / 2 2 =J
सब के /अप ने  /अप ने /ग़म हैं
2     2   / 2 2  / 2  2    / 2   2 =J
सब से/ मिलना’/आनन’/ हँस कर 9

उमीद करता हूँ कि मैं अपनी बात कुछ हद तक साफ़ कर सका हूँ ।

नोट - इस मंच के तमाम असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है  अगर कहीं कोई ग़लत बयानी हो गई हो तो बराय मेहरबानी 
निशानदिही फ़र्मा दें जिस से यह हक़ीर आइन्दा खुद को दुरुस्त कर सके ।

सादर
-आनन्द.पाठक -

गुरुवार, 4 जून 2020

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 71 [ ग़ालिब की एक ग़ज़ल और उसकी बह्र ]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त -71- [ग़ालिब की एक ग़ज़ल और उसकी बह्र]

मिर्ज़ा ग़ालिब की एक ग़ज़ल है --

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है 
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है 

हम है मुश्ताक़ और वो बेज़ार
या इलाही ! ये माजरा क्या  है 

मैं भी मुँह में  ज़ुबान रखता हूँ
काश ! पूछो कि "मुद्दआ क्या है "

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मैने माना कि कुछ नहीं ”ग़ालिब’
मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है 
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यह ग़ज़ल आप ने ज़रूर सुनी होगी । कई बार सुनी होगी ।कई  गायकों ने कई
मुख़्तलिफ़ अन्दाज़ में गाया है । बड़ी दिलकश ग़ज़ल है ।इतनी दिलकश
और मधुर कि हम इसको सुनने में  ही तल्लीन रहते हैं।
मगर
 हमने कभी इसकी ’बह्र’ पर ध्यान नहीं दिया कि इसकी बह्र क्या है ? ग़ज़ल ही इतनी मानूस
और मक़्बूल है  कि बह्र की कौन सोचे ? वैसे हमारे जैसे   श्रोता ,लोगों को ग़ज़ल के दिलकशी
अन्दाज़ से लुत्फ़ अन्दोज़ होते हैं।इसकी तअ’स्सुर में मुब्तिला हो जाते है ।

मगर नहीं ।
आप जैसे प्रबुद्ध पाठकों को फ़र्क पड़ता है जो आप जैसे अदब-आशना हैं
जो ग़ज़ल से ज़ौक़-ओ-शौक़ फ़र्माते है जो उर्दू शायरी के अरूज़-ओ-बह्र से शौक़ फ़र्माते हैं ।

जी ,यह ग़ज़ल --बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ - की एक मुज़ाहिफ़ शकल है । जिस पर आगे चर्चा करेंगे।
पहले "बहर-ए-ख़फ़ीफ़" की चर्चा कर लेते हैं । ग़ज़ल की बह्र की चर्चा बाद में करेंगे।

बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ --उर्दू शायरी की एक मुरक़्क़ब [ मिश्रित ] बह्र है जिसके अर्कान है 

फ़ाइलातुन--- मुस तफ़अ’ लुन--फ़ाइलातुन     - जिसे हम आप  1-2 की अलामत में 
2 1 2 2 ------2     2 1   2--    -2 1 2 2 
मुरक़्कब बह्र -वह बह्र होती है जिसमें ’दो या दो से अधिक ’ अर्कान का इस्तेमाल होता है
यहाँ 3-रुक्न का इस्तेमाल किया गया है ।

[नोट - यह 1-2 क़िस्म की अलामत अर्कान की बहुत सही नुमाइन्दगी नहीं करते । यह  ready-reckoner जैसा कूछ
है । इस निज़ाम से आप समन्दर के किनारे चन्द ’सीपियाँ ’ तो  फ़राहम [ एकत्र ] तो कर लेंगे मगर गहराई से ’गुहर’ नही ला पाएंगे
अगर आप को अरूज़ और अर्कान अगर सही ढंग से और गहराई से समझना है तो फिर फ़ाइलुन--फ़ाइलातुन जैसे अलामत पर आज नही तो कल
 आना ही होगा । कारण कि अरूज़ या अर्कान  ’आप के लघु-दीर्घ--गुरु -वर्ण पर ’ नहीं
बल्कि -हर्फ़ के हरकात और साकिनात [हर्फ़-ए मुतहर्रिक और हर्फ़-ए-साकिन ] -सबब--वतद -फ़ासिला जैसे अलामात  पर चलता है ।
लघु-दीर्घ--गुरु -वर्ण  का concept हिन्दी काव्य और संस्कृत के छन्द शास्त्र के लिए ही उचित है । ख़ैर ।

अगर आप ध्यान से देखें तो  दूसरा रुक्न ’मुस तफ़अ’-लुन लिखा है । यानी -ऎन-मुतहर्रिक है । यानी -ऎन- पर ज़बर है ।
इसका क्या मतलब ? मतलब है ।
मुसतफ़इलुन - [ 2 2 1 2 ]   -रुक्न 2-प्रकार से लिखा जा सकता है

[क] एक मुतस्सिल शकल में [     مستفعلن ]    जिसमे तमाम हर्फ़ एक दूसरे के ’सिलसिले ’ से  [ मिला कर ] लिखे जा सकते है ।जिसमें  मुस -तफ़-इलुन  में  ’-इलुन’- علن वतद-ए-मज़्मुआ होता है
यानी इलुन   [ मुतहर्रिक +मुतहर्रिक + साकिन ] हरूफ़।
तो क्या ? कुछ नही । बस जब आप ज़िहाफ़ का अमल करेंगे इस शकल पर तो वो ज़िहाफ़ लगायेंगे जो ’वतद -ए- मज़्मुआ ’ पर लगता है॥ बस यही बताना था ।

[ख] दूसरी मुन्फ़सिल शक्ल मे [    مس تفع لن ]    \जिसमें कुछ हर्फ़ ’फ़ासिला ’ देकर [ फ़र्क़ कर के ]  लिखा जा सकता है । इसमें मुस - तफ़अ’ -लुन  में "तफ़ अ’    تفع -वतद -ए-मफ़रूक़ है
यानी -एइन- मुतहर्रिक होने के कारण । यानी - तफ़अ’   [ मुतहर्रिक+साकिन+मुतहर्रिक ]

जबकि दोनो  की तलफ़्फ़ुज़ और दोनों का वज़न एक ही होता है -बस इमला [लिखने ]   का फ़र्क है ।

तो क्या ? कुछ नही । बस जब आप ज़िहाफ़ का अमल करेंगे इस शकल पर तो वो ज़िहाफ़ लगायेंगे जो ’वतद -ए- मफ़रुक़ ’ पर लगता है ।बस यही बताना था ।
अर्थात दोनों  शकलों  पर लगने वाले ज़िहाफ़ अलग अलग होते हैं ।

बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ एक मुरक़्क़ब [मिश्रित ] बह्र है । क्योंकि इसमें 3- रुक्न [ फ़ाइलातुन--- मुस तफ़ इलुन--फ़ाइलातुन    ] का
इस्तेमाल होता है
मुरक़्कब बह्र---वो बह्र जो ’दो या दो से अधिक ’ सालिम रुक्न से मिल कर बनता है ।
उर्दू शायरी में यह बह्र ’मुसद्दस शकल ’ [ यानी एक मिसरा में 3-रुक्न ] में ही इस्तेमाल हुई है ।और वह भी  " मुज़ाहिफ़ शकल’ में ।
 यानी हर किसी न किसी रुक्न पर कोई न कोई ज़िहाफ़ लगा हुआ है ।

वैसे तो शायरों ने इसके मूल अर्कान [ फ़ाइलातुन--- मुस तफ़ इलुन--फ़ाइलातुन   ] में शायरी तो नही जब कि की जा सकती थी
लेकिन रवायतन ’मुसद्दस’ में ही शायरी की । गो कि  कमाल अहमद सिद्दिक़ी साहब ने अपनी किताब -"आहंग और अरूज़ " में  इसकी ’मुसम्मन शकल ’
भी तज़वीज की है --मगर बात कुछ आगे न बढ़ सकी । ख़ैर ।

ज़िहाफ़ लगे हुए रुक्न को -मुज़ाहिफ़ रुक्न’ कहते है  । जैसे

अगर  सालिम रुक्न फ़ाइलातुन [ 2 1 2 2 ]  पर ’ख़ब्न’ का ज़िहाफ़ लगा हो तो बरामद रुक्न को  मुज़ाहिफ़ रुक्न ’मख़्बून ’ फ़ इ ला तुन ’ [ 1 1 2 2 ] कहेंगे
।यह एक ’आम ज़िहाफ़’ है जो शे’र के किसी मुक़ाम पर आ सकता है ।

अगर  सालिम रुक्न परख़ब्न और हज़्फ़ " का ज़िहाफ़ एक साथ लगाया जाए तो मज़ाहिफ़ रुक्न ’मख़्बून महज़ूफ़ ’ ’फ़े अ’लुन  [ 1 1 2 ] [فعلن ]  बरामद होगा।

अगर सालिम रुक्न मुस तफ़अ’ लुन [ 2 212 ] पर ’ख़ब्न’ का ज़िहाफ़ लगाया जाए तो ’मफ़ा  इ’लुन  [ 12 1 2 ] बरामद होगा

 इस प्रकार बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ मूल अर्कान पर अगर ये ज़िहाफ़ लगाए जाए तो  निम्न दो औज़ान बरामद हो सकते हैं
[1]   फ़ाइलातुन----मफ़ाइलुन-- फ़े अ’लुन 
         2 1 22   ----1  2 1 2 ---1 1 2 

[2]    फ़इलातुन ----मफ़ाइलुन---फ़े अ’लुन 
1122 ------1 2 1 2 ----1 1 2 

यानी सदर/ इब्तिदा के मुक़ाम पर -फ़ाइलातुन [ 2 1 2 2 ]  की जगह   1 1 2 2 [ फ़इलातुन ] लाया जा सकता है

1 1 2 [ फ़े अ’लुन] पर अगर तस्कीन-ए-औसत के अमल से  [ फ़अ’ लुन ]  2 2 लाया जा सकता है
उसी प्रकार 1 1 2 [ फ़े अ’लुन ] की जगह 1 1 2 1 [ फ़’इलान ] भी लाया जा सकता है
और उसी प्रकार 22 [ फ़अ’ लुन ] की जगह  फ़अ’ लान [ 2  2 1 ] भी लाया जा सकता है

कहने का मतलब यह है कि अरूज़ और ज़र्ब के मुक़ाम पर  112/ 1121/ 2 2/ 2 21 /  में से कोई एक लाया जा सकता है । इजाज़त है ।

इस एक बहर के 8- मुज़ाहिफ़ शकल  8-variants बरामद हो सकते हैं । यानी शायर के पास 8-आप्शन दस्तयाब है अपनी बात
कहने के लिए।
यही कारण है  कि "बहर-ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून महज़ूफ़ " बहुत ही मानूस और मक़्बूल [ लोकप्रिय ] बह्र है
और अमूमन हर शायर ने इस बहर में अपनी शायरी की है ।
------------------
अब ग़ालिब की दर्ज-ए-बाला [ ऊपर लिखित ] ग़ज़ल पर आते है

"दिल--ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है "  की बहर का नाम है 

बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून मुज़ाहिफ़ यानी
फ़ाइलातुन---मफ़ाइलुन---फ़ेअ’ लुन
2122----1212-----22-

 और इस पर  ऊपर लिखे हुए  ’विकल्प’ का अमल भी हो सकता है ।

किसी ग़ज़ल या शे’र का बह्र जाँचने का सबसे सही तरीक़ा ’तक़्तीअ’ करना होता है

 ग़ालिब के इस ग़ज़ल के मतला की तक़्तीअ’ मैं कर देता हूँ बाक़ी अश’आर की तक़्तीअ’  आप कर के  मुतमुईन हो लें कि क्या सही
है और क्या ग़लत ?

1  1      2  2  / 1 2 1 2 / 2 2 
दिल-ए-नादाँ/ तुझे हुआ/ क्या है 

[ नोट -दिल-ए-नादाँ  -में  कसरा-ए-इज़ाफ़त के कारण -दिल का लाम ’मुतहर्रिक’  सा आवाज़ देगा । जिसकी चर्चा
मैं ’कसरा-ए-इज़ाफ़त वाले मज़्मून में पहले ही कर चुका हूँ ।  अत: ’लाम’ का मुक़ाम बह्र के ऐन मुतहर्रिक मुक़ाम पर है जो सही भी है ।
मतलब दिले-नादाँ में ’लाम - खींच कर नहीं पढ़ना है }ध्यान रहे ।

 2   1    2     2   /  1  2  1 2  /  2 2 
आ ख़ि रिस दर / द  की दवा /क्या है 

[नोट-  जुमला ’ आखिर इस ’ में अलिफ़ का वस्ल -र-के साथ हो गया है अत: आप को आ खि रिस [ 2 1 2 --] की आवाज़ सुनाई देगी
तक़्तीअ’ भी इसी हिसाब से की जायेगी ।

देखा आप ने ? मतला  के मिसरा उला में 1122 और सानी में 2122 लाया गया है और जो अरूज़ के ऐन मुताबिक़ भी है ।

आप और अश’आर की तक़्तीअ’ खुद करें तो इस मज़्मून की सारी बातें साफ़ हो जायेंगी और आप का आत्म-विश्वास भी बढ़ेगा ।

[ बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ के बारे में मज़ीद जानकारी के लिये इसी ब्लाग पर कॄपया क़िस्त -57 देखें ]

असातिज़ा [ गुरुजनों ] से  दस्तबस्ता [हाथ जोड़ कर ] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो बराय मेहरबानी
निशानदिही फ़र्माये जिस से मैं ख़ुद को दुरुस्त कर सकूँ
सादर
-आनन्द.पाठक-


मंगलवार, 2 जून 2020

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 60 [ रुबाई की बह्रें ]

क़िस्त 60 : रुबाई की बह्रें


[नोट : कुछ  मित्रों का आग्रह था कि कभी ’रुबाई की बह्रों पर भी बातचीत की जाए। यह आलेख उसी सन्दर्भ में ]

रुबाई उर्दू शायरी की एक विधा है। यह विधा अरबी शायरी में नहीं पाई जाती है । इस का इज़ाद अहल-ए-इरान ने किया और फिर वहाँ से उर्दू शायरी में आई

आप जानते होंगे ,फ़ारसी के  शायर उमर ख़य्याम की रुबाईयात काफी मशहूर है और उनके  विश्व के कई भाषाओं में अनुवाद भी हो चुके हैं जिसमे अग्रेजी के कवि ’फिटजेराल्ड ’ का इंग्लिश  अनुवाद बहुत अच्छा माना जाता है

।उन रुबाईयात के हिन्दी में भी  कई अनुवाद हो चुके है  जिसमें  श्री हरिवंश राय ’बच्चन’ जी का हिन्दी अनुवाद बहुत अच्छा माना जाता है । बच्चन जी अनुवाद करते करते ख़य्याम की रुबाइयात से इतना प्रभावित हुए कि वो खुद ही बाद में मधुशाला मधुबाला मधु कलश आदि की रचना की ।
रुबाई की बह्रें [औज़ान] की चर्चा करने से पूर्व ,रुबाई के बारे में कुछ बात कर लेते हैं
अरबी में 4-की संख्या को ’अर्बा:’ कहते हैं इसी से ’मुरब्ब: [ 4-अर्कान वाले शे’र] और 4-लाइन वाली रचना को ’रुबाई’ बना है।
रुबाई चार लाइन की एक रचना होती है जिसमें पहली--दूसरी--और चौथी पंक्ति तुकान्त [हम क़ाफ़िया] होती है ।तीसरी पंक्ति हम क़ाफ़िया या तुकान्त होना  ज़रूरी नहीं । और हो तो मनाही भी नहीं । न होना ही बेहतर माना जाता है ।रुबाई की पहली दो पंक्ति को ’मतला’ नहीं कहते बल्कि ’मुस्सरा’ कहते है । रुबाई का सारा सार [निचोड़[’चौथी पंक्ति" में होता है या आप यूँ कह लें चौथी पंक्ति में जो जान डाली गई है -पहले की तीन लाइनें उसमें मदद करती हैं। क्लासिकल उर्दू शायरी में यह विधा काफ़ी लोक प्रिय रही मगर ग़ज़ल जैसी मक़्बूलियत हासिल न कर सकी। अमूमन हर पुराने हर शायर ने यथा ग़ालिब,मीर, ज़ौक़-दाग़-फ़िराक़ आदि कई शायरों ने कुछ न कुछ रुबाइयाँ कहीं है । परन्तु आजकल फ़ेसबुक व्हाट्स अप पर या यहाँ तक कि मुशायरों में भी रुबाइयाँ न के बराबर ही लिखी पढ़ी जाती हैं।  उसकी जगह ’चार लाइन’ के मुक्तक पढ़े जाते है ,जो रुबाई नहीं होते। ’मुक्तक’ नाम आदरणीय गोपाल दास’नीरज’ जी का दिया हुआ है ।

एक मुक्तक देख लें

[1]  बात को मन के मन से तोलूँगा
इस से पहले ज़ुबाँ न खोलूँगा
चाहे दुनिया सुने सुने न सुने
मैं जहाँ हूँ वहीं  से बोलूँगा

--बलवीर सिंह ’रंग’-
यह रुबाई नहीं है

एक रुबाई लिख रहा हूँ

[2] दुनिया के अलम  ’ज़ौक़’  उठा जाएँगे
हम क्या कहें  क्या आए थे क्या जाएँगे
जब आए थे रोते हुए आप  आए थे
जब जाएँगे औरों  को रुला  जाएँगे

-ज़ौक-

अब एक मतला और एक शे’र देख लें

[3] आज इतनी मिली है  ख़ुशी आप से
दिल मिला तो मिली ज़िन्दगी आप से
तीरगी राह-ए-उल्फ़त पे तारी न हो
छन के आती रहे रोशनी  आप से
-आनन-
आप ध्यान से देखें -सभी कलाम में चार पंक्तियाँ है ,सभी में पहली--दूसरी--और चौथी पंक्ति तुकान्त [हम काफ़िया है] और अमूमन सभी की ’चौथी’ पंक्ति में जान है मगर सभी ’रुबाई’ नहीं है --सिवा [2] के ज़ौक़ की रुबाई
इसी लिए कहते है हर चार लाईन की रचना ’रुबाई’ नहीं होती।मगर हर रुबाई ’चार लाईन’ की ही होती है । इसी रुबाई शब्द से ’मुरब्ब: ’ --[चार अर्कान वाले शेर]  बना है ।
कारण कि रुबाई की अपनी ख़ास बह्र होती है अपने ख़ास औज़ान होते हैं
यूँ तो ’रुबाई’ उत्पति के बारे में कुछ किंवदन्तियाँ  भी  है। यहाँ उल्लेख करने की कोई ज़रूरत नहीं । बस आप यहीं समझ लें कि रुबाई के बह्र की उत्पति ’बह्र-ए-हज़ज’ से हुआ है

बह्र-ए-हज़ज का बुनियादी सालिम  रुक्न  ’मुफ़ाईलुन ’[1222] होता है और यूँ तो इस सालिम रुक्न पर कई ज़िहाफ़ लग सकते हैं मगर ’रुबाई’ के सन्दर्भ में  कुछ ख़ास ज़िहाफ़ ही लगते हैं ।जो नीचे लिख रहा हूं

मुफ़ाईलुन [1222} + ख़र्ब  =अख़रब ’मफ़ऊलु- [221]  यानी लाम पर हरकत है[ ख़र्ब एक मुरक्कब ज़िहाफ़ है  जो दो ज़िहाफ़ से मिल कर बना है  =[ख़रम +कफ़]=और सालिम रुक्न पर दोनो ज़िहाफ़ का अमल एक साथ होगा  । यानी मुरक़्कब ज़िहाफ़ का अमल  "एक के बाद एक’--नहीं होगा।मतलब  One by One  नहीं होगा।

** मुफ़ाईलुन [1222] +ख़रम  =अख़रम ’मफ़ऊलुन’-[222]**
मुफ़ाईलुन [1222] +कफ़ =मक्फ़ूफ़ ’ ’मफ़ाईलु- [1221] यानी लाम पर हरकत है

मुफ़ाईलुन [1222]  +हतम =अहतम  ’फ़ऊलु ’[121] यानी लाम पर हरकत है [ हतम एक मुरक्कब ज़िहाफ़ है = बतर+क़ब्ज़+तसबीग़= तीनो ज़िहाफ़ का अमल एक साथ होगा
[** अख़रम के बारे में आगे चर्चा करेंगे]

 रुबाई की बह्र समझना बहुत आसान है-अगर आप ’तख़्नीक़’ का अमल समझ लिए हों तो
 उम्मीद है कि आप लोग "तस्कीन-ए-औसत" और "तख़नीक़" का अमल जानते होंगे। जो पाठक प्रथम बार इस पॄष्ठ पर आए है उनके लिए एक बार दुहरा देता हूँ
तख़नीक़ का अमल = अगर किसी बह्र के दो adjacent & consecutive [समीपवर्ती मुज़ाहिफ़ रुक्न] में ’" तीन मुतहर्रिक हर्फ़ [हर्फ़ मय हरकत] एक साथ आ गए हो तो उस पर तख़्नीक का अमल हो सकता है और बीच वाला हर्फ़ ’साकिन’ माना जायेगा। और इससे एक नया वज़न बरामद होगा और यह नया वज़न बाहम मुतबादिल [ आपस में एक दूसरे से बदले जाने योग्य] भी होगा

वैसे तो रुबाई की मूल बह्र तो दो - ही होती है या यूँ कह लें कि दो- ग्रुप होते है ।मगर  इसी ’तख़्नीक’ के अमल से 24 -औज़ान [ वज़्न का ब0व0] बरामद होते है।और वो दो मूल बह्र यूँ हैं

[A]  मफ़ऊलु---मफ़ाईलु---मफ़ाईलु----फ़ अ’ल/ फ़ऊल
221---------1221----1221--------12  / 121

[B]  मफ़ऊलु----मफ़ाइलुन---मफ़ाईलु-----फ़ अ’ल/फ़ऊलु
221----------1212-----1221-------12  / 121
ख़याल रहे -लु- मतलब -लाम मुतहर्रिक [यानी -लाम- मय हरकत]
-------------------     -----------------------------------     --------------------
अब मूल बह्र [A]  पर ’तख़्नीक़’ का अमल करते हैं फिर देखते हैं कि कितने ’मुतबादिल’ औज़ान बरामद होते हैं

  -a---------            --b--      -- -c-         ---- d-
[A]  मफ़ऊलु---मफ़ाईलु----मफ़ाईलु----फ़ अ’ल
221---------1221----1221--------12


[1]  मफ़ऊलु---मफ़ाईलु----मफ़ाईलु----फ़ अ’ल
221---1221----1221---12   -no  operation-

[2]  221----1221---1222-----2 operation on c & d

[3] 221----1222----221----12 operation on b &  C

[4] 222---221---1221----12 operation  on a & b

[5]  221---1222---222---2 operation on  b --c---d

[6] 222---221---1222---2 operation on  [a--b]-[-c--d]

[7] 222---222---221---12 operation on  a-b--c

[8] 222---222---222---2 operation  a--b---c---d

यह तो 8-वज़न  सिर्फ़ अरूज़ और ज़र्ब में ’फ़ अ’ल [12] से ही बरामद हुए
ऐसे ही 8- वज़न अरूज़ और ज़र्ब में में जब ’फ़ऊल [121] लिखेंगे तो बरामद  होंगे
और यूँ भी अरूज़ /ज़र्ब के मुक़ाम पर ’फ़ अ’ल [12] की जगह ’फ़ऊल [121] लाया जा सकता है
और वैसे भी अगर किसी शे’र के आख़िर में कोई सबब-ए-ख़फ़ीफ़ आता हो तो एक साकिन [1] बढ़ा देने से   शे’र के वज़न में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। आहंग मज़रूह नहीं होता।
और वो मज़ीद 8-वज़न आप लिख सकते हैं । चलिए आप के लिए मैं लिख देता हूँ same-to-same बस आख़िर में [1] साकिन जोड़ दूँगा ’फ़ऊल [121] दर्शाने के लिए

[1]  मफ़ऊलु---मफ़ाईलु----मफ़ाईलु----फ़ऊल
221---1221----1221--           -121   -no  operation-

[2]  221----1221---1222-----21 [फ़ा अ’] operation on c & d

[3] 221----1222----221----121 operation on b &  C

[4] 222---221---1221----121 operation  on a & b

[5]  221---1222---222---21 operation on  b --c---d

[6] 222---221---1222---21 operation on  [a--b]-[-c--d]

[7] 222---222---221---121 operation on  a-b--c

[8] 222---222---222---21 operation  a--b---c---d

इस प्रकार
 रुबाई की पहले बुनियादी वज़न से --16- औज़ान बरामद हुए [ नोट करें]
--------------_    -----------------------    --------------------
अब मूल बह्र [B]  पर ’तख़्नीक़’ का अमल करते हैं फिर देखते हैं कि कितने ’मुतबादिल’ औज़ान बरामद होते हैं
   a------------b-----------c------------d---
[B]  मफ़ऊलु----मफ़ाइलुन---मफ़ाईलु-----फ़ अ’ल
221---------1212----1221--------12

[1] 221----1212   -----1221----12        -no operation-

[2] 222-----212-------1221---12 operation on -a- &-b-

[3] 221-----1212 ----1222----2 operation on  c & d

[4] 222------212-----1222-----2 operation  on [a & b]- [c &d]

जैसा कि ऊपर कह चुके हैं कि अगर शे;र के आख़िर में एक साकिन [1] और बढ़ा भी दें तो शे’र के वज़न में कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा ।आहंग मज़रूह नहीं होता । और वैसे भी अरूज़ /ज़र्ब के मुक़ाम पर ’फ़ अ’ल [12] की जगह ’फ़ऊल [121] लाया जा सकता है

इस प्रकार 4 -वज़न  और बरामद होते हैं जो यूँ होंगे
[B]  मफ़ऊलु----मफ़ाइलुन---मफ़ाईलु-----फ़ऊल
221---------1212----1221--------121


[1] 221----1212   -----1221----121        -no operation-

[2] 222-----212-------1221---121 operation on -a- &-b-

[3] 221-----1212 ----1222----21 operation on  c & d

[4] 222------212-----1222-----21 operation  on [a & b]- [c &d]

इस प्रकार रुबाई की दूसरी बुनियादी बह्र से कुल 8-औज़ान बरामद हुए

अब आप दोनो बुनियादी रुक्न के तमाम औज़ान जो बुनियादी है और जो ’मुख़्नीक़ ’ [ जो तख़नीक़ के अमल से बरामद हुए हैं] है कुल मिला दें तो

16+8 = 24 औज़ान होंगे और यही अरूज़ की किताबों में लिखा है --रुबाई के 24-औज़ान होते हैं। इन अर्कान को रटने की ज़रूरत नहीं है बस समझने की ज़रूरत है।

1  आप की सुविधा के लिए ये सभी 24-अर्कान एक साथ एक जगह एक क्रम से लिख रहा हूँ जिससे किसी रुबाई की तक्तीअ’ या वज़न पहचानने में सुविधा हो। नीचे का क्रम सुविधाजनक ढंग से लिखा  हुआ है, पर हैं वही 24-औज़ान जिसका ऊपर  चर्चा कर चुका हूँ  । इन में से 12-औज़ान तो वही हैं जो अरूज़/ज़र्ब में ’फ़ अ’ल’ [12] या ’फ़े’ [2] वाले हैं । बाक़ी 12-औज़ान वो हैं जिसमें मात्र अरूज़/ज़र्ब के मुक़ाम पर -1-साकिन बढ़ा दिया गया है
2 इन 12-औज़ान में से 6-औज़ान तो  अख़रब  मफ़ऊलु [221] से शुरु होते है। बाक़ी 6-औज़ान मफ़ऊलुन [222] से शुरु होते है
3 मफ़ऊलु [221] से शुरु होने वाले 6 औज़ान में से 3-औज़ान तो ’फ़ अ’ल [12] पर खतम होते है और बाक़ी 3-औज़ान ’फ़े’ [2] पर
4 यही हाल ’मफ़ऊलुन [222] से शुरु होने वाले औज़ान के साथ भी लागू होता है
5 इसका मतलब यह हुआ कि रुबाई का मिसरा या तो मफ़ऊलु [221] से शुरु होगी या फिर ’मफ़ऊलुन’ [222] से
और खतम होगा ’फ़े/फ़ाअ’[ 2 /21] पे या फिर ’फ़ अ’ल’ /. फ़ऊल   [ 12 /121] पे

6 आप की सुविधा , सफ़ाई और स्प्ष्टता  के लिहाज़ से इन अर्कान के नाम अलामत के ऊपर नहीं लिखा।आप चाहें तो मश्क़ कर अलग से लिख सकते हैं जैसे
221 =मफ़ऊलु
1212 =मफ़ाइलुन
1221 =मफ़ाईलु
1222 =मफ़ाईलुन
**222 =मफ़ऊलुन**
12 = फ़ अ’ल  [-लाम-साकिन ]
121 =फ़ऊल   [-लाम- साकिन]
2 =फ़े
21 =फ़ाअ’  [-ऐन- मुतहर्रिक]
** लेख के आरम्भ में कहा था कि ’मफ़ऊलुन’ [222] के बारे में बात में बात करेंगे। कहना यही थी कि यह ’मफ़ऊलुन’ [222] रुबाई में  मुख़्नीक़ [ तख़्नीक के अमल ] से हासिल होता है। न कि ’अख़रम’ ज़िहाफ़ से । अरूज़ की कई किताबों में इसे ’अख़रम’ ज़िहाफ़ से हासिल दिखाया /बताया गया है ।

R-1 221-- -1221----1221-- -12

R-2 221----1222----221----12

R-3 221----1212   --1221---12 
    
R-4 221----1221--- 1222-----2

R-5 221--- 1222--   -222--    -2

R-6 221----1212 ---1222----2
------       --------         ---------------     ----
R-7 222---  221--   -1221----12

R-8 222--  -222--  -221-   --12

R-9 222-----212- --1221---12

R-10 222-   --221-- -1222--  -2

R-11 222--  -222-  --222--   -2

R-12 222-----212- --1222-----2
----------------    ------------------     ----------

 अगले 12-अर्कान लगभग  समान ही होंगे -बस आखिर वाली रुक्न [अरूज़/ज़र्ब] मे -1-साकिन बढ़ाते जाइए।आप चाहें तो उसे पहचानने के लिए    R'1---R'2---R'3---  ---  R'12  Index कर सकते है जिससे पता चलता रहे कि ये वो औज़ान है जिसके अरूज़/ज़र्ब में -1-साकिन मज़ीद जुड़ा हुआ है ।
यह तमाम 24-औज़ान आपस में ’मुतबादिल’ [यानी एक की बदल/जगह दूसरा] लाया जा सकता है
्कारण इन तमाम 12 औज़ान की मात्रा जोड़िए ---सभी का योग एक जैसा है [20] बराबर
यानी रुबाई के चारों पंक्तियों में 4-अलग अलग वज़न [ इन्ही 24 में से कोई चार] हो सकते हैं । या चारों पंक्तियों में एक ही वज़न हो सकता है
उसी प्रकार बाक़ी 12 [जो अरूज़/ज़र्ब मेम -एक-साकिन बढ़ाने से हासिल होंगे] में कुल मात्रा भार 21 होगा
-----     ---------------------    -----------------------------   ----------
चलिए एक दो रुबाइयों की तक़्तीअ कर के देख लेते है -
[क] ज़ौक़ की रुबाई देख लेते हैं

दुनिया के अलम  ’ज़ौक़’  उठा जाएँगे
हम क्या कहें  क्या आए थे क्या जाएँगे
जब आए थे रोते हुए आप  आए थे
जब जाएँगे औरों  को रुला  जाएँगे
-ज़ौक-
इसकी तक़्तीअ कर के देख लेते हैं
2   2    1   / 1  2    2  1   / 1  2  2 2  / 2 R-4
दुनिया के /अलम  ’ज़ौक़’ / उठा जाएँ /गे
2     2     1 /  1 2 2  1 / 1 2 2 2  / 2 R-4
हम क्या क/हें  क्या आए/ थे क्या जाएँ /गे
2      2   1  / 1  2 2  1/1  2    2  2  /2 R-4   [ -आप आए-  में   अलिफ़ का वस्ल है और आपाए [222]
जब आए /थे रोते हु    /ए आप  आए /थे
2      2   1/ 1  2  2  1 / 1 2   2 2  /1 R-4
जब जाएँ /गे औरों  को /रुला  जाएँ /गे
-ज़ौक-

[ख] मीर अनीस लखनवी की एक बहुत ही मशहूर रुबाई है

दुनिया भी अजब सराय-ए-फ़ानी देखी
हर चीज़ यहाँ की आनी जानी देखी
जो आ के न जाए वो बुढ़ापा  देखा
जो जा के न आए वो  जवानी   देखी
-मीर अनीस लखनवी

तक़्तीअ’ कर के देख लेते हैं
   221     /  1212       / 1 2 2  2      / 2 =221-1212---1222--2 =  R-6
दुनिया भी /अजब सरा /य-ए-फ़ानी दे/खी
2    2   1 /  1  2  1  2   / 1 2  2  2  / 2 = 221-1212---1222--2 =  R-6
हर चीज़ / यहाँ की आ /नी जानी दे  /खी
 2    2   1 / 1  2 1 2  / 1 2 2 2    /2 =221-1212---1222--2 =  R-6
जो आ के/ न जाए वो  /बुढ़ापा  दे    /खा
2      2   1/ 1 2 1 2    / 1 2 2 2  / 2 = 221-1212---1222--2 =  R-6
जो जा के/ न आए वो  /जवानी   दे /खी
[नोट -इस रुबाई में एक ही वज़न चारों पंक्तियों में इस्तेमाल हुई है ]

हैरत कि बात यह कि  औज़ान में  इतनी ’फ़ेक्सिबिल्टी ’[ Flexibility] के बावजूद भी  रुबाइयाँ दौर-ए-हाज़िर में कम ही कही जा रही है और उनकी जगह मुक्तक या ’एक मतला-एक शे’र’ ने ले लिया है किसी मुशायरे को सरगर्म करने के लिए।
शायद एक कारण ये रहा हो कि रुबाई की गायकी [मौसिक़ी] ग़ज़ल के मुकाबले कमज़ोर हो या फिर शायर के सामने इतनी राहें [24] खुल जाती है कि वो भ्रमित हो जाता हो कि कौन सा वज़न इस्तेमाल करें। यह सब मेरा ख़याल है
बेहतर तो होगा कि यदि आप रुबाई कहना चाह्ते हैं तो सभी चार मिसरे एक या दो वज़न में ही कहें --कोई दिक्कत नहीं

अस्तु


{नोट- असातिज़ा [ गुरुवरों ] से दस्तबस्ता  गुज़ारिश  है कि अगर कहीं कुछ ग़लतबयानी हो गई हो गई हो तो बराये मेहरबानी  निशान्दिही ज़रूर फ़र्माएं  ताकि मैं आइन्दा ख़ुद को दुरुस्त कर सकूँ --सादर ]

-आनन्द.पाठक-
Mb                 8800927181ं
akpathak3107 @ gmail.com

-आनन्द.पाठक--

सोमवार, 1 जून 2020

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त -70 -[ कसरा-ए-इज़ाफ़त और वाव-ए-अत्फ़ ]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त -70 -[ कसरा-ए-इज़ाफ़त और वाव-ए-अत्फ़ ]


[ यह  बह्र का विषय तो नहीं है पर पाठकों की सुविधा के लिए और शायरी संबंधित जानकारी 
क़िस्तवार यकजा दस्य्तयाब हो सके  ,इसीलिए इसे यहाँ पर लगा रहा हूँ --सादर ]

आप ने उर्दू शायरी में दो या दो से अधिक अल्फ़ाज़ को जुड़े हुए इस प्रकार देखे होंगे

[क]  दर्द-ए-दिल --ग़म-ए-इश्क़---वहसत-ए-दिल ---पैग़ाम-ए-हक़---ख़ाक-ए-वतन---बाम-ए-फ़लक--जल्वा-ए-हुस्न-ए-अजल --जू-ए-आब---राह-ए-मुहब्बत--- बहर-ए-बेकरां----कू-ए-उलफ़त--दर्द-ए-निहाँ --दिल-ए-नादां ---दौर-ए-हाज़िर -बर्ग-ए-गुल - बाद-ए-बहार---चिराग-ए-सहर  ---शब-ए-फ़ुरक़त---रंग-ए-महफ़िल--दिले-नादां ----साहिब-ए-ख़ाना---

और  ऐसे ही  बहुत से  ,हज़ारो अल्फ़ाज़

[ख]  ज़ौक-ओ-शौक़ ----सूद-ओ-जियाँ----ख़्वाब-ओ-ख़याल ---जान-ओ-जिगर--बादा-ओ-ज़ाम ---आब-ओ-हवा ----आब-ओ-गिल ---शे’र-ओ-सुखन-- शम्स-ओ-क़मर  ----शैख़-ओ-बिरहमन---- दैर-ओ-हरम 

  और ऐसे ही  बहुत से  ,हज़ारो अल्फ़ाज़

पहले वाले ग्रुप को ’कसरा-ए-इज़ाफ़त ’ कहते है
दूसरे वाले ग्रुप को  ’वाव-ओ-अत्फ़ ’ कहते हैं

आज हम इन्हीं दो तराक़ीब [तरक़ीब का बहुवचन ] पर बात करेंगे
इन दोनो तरक़ीबों से ग़ज़ल या शे’र की खूबसूरती बढ़ जाती है

हिंदी में  क़सरा-ए-इज़ाफ़त की जगह ’संबंध कारक ---’ जैसे -का-- के--की  का प्र्योग करते है 

दिल का दर्द ---दिल का ग़म------ख़ुदा का पैगाम--- वतन की मिट्टी---रूप की आभा---सुबह का दीया --जुदाई की शाम

 अत्फ़ की जगह -और - का प्रयोग करते है या फिर ’द्वन्द-समास ’ का 

आग और पानी----चाँद और सूरज ---मन्दिर और मसजिद ---हानि और लाभ
या फिर आग-पानी ---चाँद--सूरज----मन्दिर-मसजिद--हानि-लाभ ---जीवन-मरण--यश-अपयश --आदि

हमारे बहुत से हिंदीदाँ दोस्त कभी कभी  शे’र में या ग़ज़ल में -और- की जगह -औ’-- लिख देते हैं शायद बह्र या वज़न मिलाने के चक्कर में ।
उर्दू में -औ’ - नाम की कोई चीज़ नहीं होती । आप शे’र में ’और’ ही लिखिए --बह्र में और अपने आप वज़न ले लेगा ।

सच पूछिए तो वस्तुत: यह ’दो-या दो से अधिक फ़ारसी- अल्फ़ाज़ " जोड़ने की तरक़ीब है । और यही तरक़ीब उर्दू वालों ने भी अपना लिया । चूँकि उर्दू में अरबी फ़ारसी तुर्की हिंदी के भी बहुत से शब्द समाहित हो्ते  गए   अत" ’फ़ारसी अल्फ़ाज़ ’ की शर्त दिन ब दिन खत्म होती गई ।अब उर्दू के कोई दो या दो से अधिक अल्फ़ाज़ इसी तरक़ीब से जोड़े जाते हैं । अब तो कुछ लोग /..अरबी -अरबी- /अरबी -फ़ारसी के शब्द / यहाँ तक कि फ़ारसी-हिंदी शब्द जोड़ कर  भी इज़ाफ़त करने लगे है आजकल । जब कि अरबी में दो शब्द जोड़ने का अलग निज़ाम है । ’अलिफ़-लाम’ का निज़ाम ।बाद में चर्चा करेंगे कभी इस पर ।ख़ैर

कसरा-ए-इज़ाफ़त =इज़ाफ़त --इज़ाफ़ा शब्द से बना है  जिसका शाब्दिक अर्थ होता है वॄद्धि या बढोत्तरी और  उर्दू में जिसे ’ज़ेर’ कहते है अरबी में अरबी में उसे ’कसरा’ कहते है
दोनों का काम एक ही है । ज़ेर माने-नीचे । उर्दू में किसी हर्फ़ को हरकत [यानी आवाज़ ,स्वर देने के लिए --ज़ेर--जबर--पेश  के निशान लगाते है } ज़ेर -हर्फ़ के नीचे
’ [ छोटा सा / का निशान ] लगाते है । नीचे लगाते है इसीलिए इसे उर्दू में -ज़ेर- और अरबी में -कसरा- कहते है । यह निशान पहले लफ़्ज़ के आखिरी हर्फ़ के नीचे लगाते है
इस तरक़ीब में जोड़े जाने वाला    पहला लफ़्ज़ संज्ञा [इस्म ] और दूसरा शब्द भी संज्ञा [ इस्म ]हो सकता है
जैसे  साहिब-ए-ख़ाना
ग़म-ए-इश्क़
सरकार-ए-हिन्द
या फिर   पहला शब्द संज्ञा [इस्म] और दूसरा शब्द विशेषण [ सिफ़त ] हो सकता है जैसे
वज़ीर-ए-आज़म
चश्म-ए-नीमबाज़
दिल-ए-शिकस्ता

 तरक़ीब जो भी हो --दूसरा लफ़्ज़ --पहले लफ़्ज़ को qualify or Modify करता है ।

  इसके भी लगाने और दिखाने के तीन नियम है ।
नियम 1-   उर्दू में दो शब्दो के जोड़ने  में अगर पहले शब्द का आखिरी हर्फ़ [ अगर  ’हर्फ़-ए-सही ’ है तो ] कसरा की अलामत ठीक उसी हर्फ़ के ’नीचे’ लगाते है  ज़ेर की शकल में ।

नियम 2- अगर उर्दू  युग्म शब्द [ जुड़ने वाले दो-अल्फ़ाज़] के पहले शब्द का आख़िरी  हर्फ़ अगर हर्फ़-ए-इल्लत का "अलिफ़’ और”वाव’  पर ख़त्म हो रहा है तो  अलिफ़ और वाव के बाद " ये’ का इज़ाफ़ा कर दिया जाता है ।

नियम 3- अगर उर्दू  युग्म शब्द [ जुड़ने वाले दो-अल्फ़ाज़] के पहले शब्द का आख़िरी  हर्फ़ अगर हर्फ़-ए-इल्लत -ई- से ख़त्म हो रहा हो तो अल्फ़ाज़ पर  ’हमज़ा और कसरा ’ लगा कर इज़ाफ़त दिखाते हैं

 [ नोट - घबराइए नहीं । आप को हर्फ़-ए-सही , हर्फ़-ए-इल्लत यह सब जानने की ज़रूरत नहीं और न ही आप इन नियमों के बारे में परेशान  हों ।वह तो बात निकली तो लिख दिया आप के विशेष जानकारी के लिए ।
 हम हिंदी वाले ,ग़ज़ल उर्दू रस्म-उल ख़त  [ लिपि ] में तो लिखते नहीं बल्कि ’देवनागरी लिपि’ में लिखते है । बस आप  समझ लें कि -कसरा-ए-इज़ाफ़त -को -ए- से दिखायेंगे अपने कलाम में ।

हिंदी में कसरा-ए-इज़ाफ़त दिखाने या लिखने  का तरीका-

आप ने [ देवनागरी लिपि में छपा ]अश’आर ज़रूर  देखा होगा --कि ऐसे तरक़ीब को  कभी कभी  ’रंगे-महफ़िल ’   --दर्दे-दिल ---ग़मे-दिल --जैसे दिखाते हैं
और कहीं कहीं इसी चीज़ को ; रंग-ए-महफ़िल ---- दर्द-ए-दिल ---ग़म-ए-दिल --के तरीक़े से भी दिखाते है ।
 तरीक़ा अलग अलग है मगर भाव और अर्थ में कोई फ़र्क़ नहीं है । यह व्यक्तिगत अभिरुचि  ज़ौक़-ओ-शौक़ का सवाल है  कि आप इसे कैसे लिख कर दिखाते हैं । इस [ - ] से ही पता चल जाता है कि
यह  शब्द ’पर कसरा इज़ाफ़त है और इस शब्द के आख़िरी हर्फ़ पर ’कसरा ’ [ यानी -ज़ेर- का निशान [अलामत ] लगा हुआ है ।

वैसे जहाँ तक मेरा सवाल  है मैं  ’ग़म-ए-दिल ’ वाली तरक़ीब ही पसन्द करता हूँ ।

एक बात और ’जानेमन ’ जान-ए-मन ? या जाने-मन ? क्या ? आप बताए ?
मैं तो यही बता सकता हूँ कि यहाँ -’मन-’  हिंदी वाला मन  mood  वाला  मन नही बल्कि फ़ारसी वाला है -मन -मतलब -Me ,Mine वाला है यानी ’मेरी जान "
अब बताइए ’ जानेमन ’ क्या ?
ख़ैर
कसरा ए-इज़ाफ़त  और  शे’र पर अमल
आप को शायद याद हो [ ------याद हो कि न याद हो ] जब अर्कान की चर्चा कर रहे तो तो एक इस्तलाह [ परिभाषा]  था --’सबब-ए-सक़ील का -" और -’सबब-ए-ख़फ़ीफ़ ’ का  । वतद-ए-मफ़रूक़ का भी ज़िक्र आया था ।
सबब-ए-सक़ील = यानी वो दो हर्फ़ी जुमला जिसमे दोनो हर्फ़ मुतहर्रिक हों । यानी  दोनो हर्फ़ों पर कोई न कोई ’हरकत [ जबर--ज़ेर---पेश ] लगे हों
मगर उर्दू ज़ुबान का मिज़ाज ऐसा कि उसके हर लफ़्ज़ का आख़िरी हर्फ़ ’साकिन’ होता है [ लफ़्ज़ का आख़िरी हर्फ़  का मुतहर्रिक  नहीं होता } तो सबब-ए-सक़ील शब्द फिर कौन से होंगे जिसमें दोनों हर्फ़ हरकत वाले हों ?

बस इसी मुक़ाम पर ’कसरा-ए-इज़ाफ़त ’ की ENTRY होती है । देखिए कैसे ?
ग़म्-ए-दिल् --
ग़म् [ 2 ]  = म् -साकिन् है
दिल् [2]   = ल् -साकिन् है
मगर जब ’ग़म-ए-दिल ’ पढ़ेंगे तो फिर -म्- पर एक हल्का सा वज़न आ जायेगा। हल्का ही सही एक भार [ सक़ील ] आ जायेगा -म्- के तलफ़्फ़ुज़ में फिर म् --साकिन न हो कर मुतहर्रिक का आभास देगा ।यानी
ग़म-ए-दिल में -ग़म-- [ 1 1 ] माना जायेगा  । इसी कसरा-ए-इज़ाफ़त की वज़ह से ।


खाक्-ए-वतन्  में
ख़ाक् = में -क्- साकिन् है
वतन् = में   -नून् =-साकिन् है
परन्तु
ख़ाक-ए-वतन्  = में  -क- मुतहारिक् का आभास दे रहा है   [ ख़ाक ----वतद-ए-मफ़रूक़= 2 1 ] इसी कसरा-ए-इज़ाफ़त की वज़ह से ।
यही बात् ’ वाव् -ए-अत्फ़् ’ के साथ भी है ।
जैसे
आब-ओ-गिल [ पानी-मिट्टी ] देखें
आब् = में -ब्- साकिन है
गिल् =ल् -साकिन है
परन्तु
आब-ओ-गिल्   =  मे -ब- मुतहर्रिक् का आभास् देगा- अत्फ़् की तरक़ीब् के कारण् [ आब ----वतद्-ए-मफ़रूक़्  2 1 ] इसी कसरा-ए-इज़ाफ़त की वज़ह से ।


एक दो  शे’र देखते हैं तो बात और साफ़ हो जायेगी --
इक़बाल साहब का एक शे’र है । आप सबने सुना होगा --सितारों के आगे जहाँ और भी हैं -- ग़ज़ल । यह  गज़ल "बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम" में है
यह  भी आप जानते होंगे । यानी   122---122 --  122 --   122 में है ।

कनाअत न कर आलम-ए-रंग-ओ- बू पर 
चमन और भी  आशियाँ  और भी  हैं 

अगर खो गया इक नशेमन तो क्या ग़म 
मुक़ामात-ए-आह-ओ- फ़ुगाँ और भी हैं 

 अब हम इसकी तक़्तीअ’ कर के देखेंगे कि ’इज़ाफ़त ’ और अत्फ़’ की  क्या भूमिका होगी ।

1   2   2    / 1 2   2     / 1  2      2    / 1  2   2
 कनाअत / न कर आ /ल  म-ए -रं /ग- ओ-  बू पर 
चमन औ /र भी  आ शियाँ  औ /र भी  हैं 

अगर खो /गया इक /  नशेमन / तो क्या ग़म 
मुक़ामा /त-ए-आ ह-ओ-/ फ़ुगाँ औ/र भी हैं 

यहाँ पर  -आलम-ए-रंग-ओ- बू  को देखते हैं । इसकी तक़्तीअ /-ल मे रं /  1 2 2 / पर की  गई है
और -मुक़ामात-ए-आह-ओ- फ़ुगाँ  की तक़्तीअ  / त आ हो / 1 2 2 / के वज़न पर की गई है

जानते हैं क्यों ?

बह्र और रुक्न की माँग पर शायर को यह इजाजत है कि वह ’कसरा-ए-इज़ाफ़त’  वाले पहले अल्फ़ाज़ के आखिरी हर्फ़ को ’खींच कर [ इस्बाअ’ ] कर पढ़े या ’ खींच कर न पढ़े "
उसी प्रकार "वाव-ओ-अत्फ़  ’ वाले पहले अल्फ़ाज़ के आख़िरी हर्फ़ को ’खींच कर [ इस्बाअ’ ] कर पढ़े या ’ खींच कर न पढ़े "
एक बात और -मुक़ामात - में -त- तो साकिन है तो मुतहर्रिक क्यों लिया ?
 इसलिए कि -त- जिस मुकाम पर है शे’र में -वह मुक़ाम मुतहर्रिक [ फ़ ऊ लुन 1 2 2  में -फ़े- के मुकाम पर है और -फ़े-मुतहर्रिक है रुक्न में   ] है और इस साकिन -त- को ]कसरा-ए-इज़ाफ़त ने उसे मुतहर्रिक कर दिया या मुतहर्रिक का आभास दे रहा है
और -ते -खींच कर नहीं पढ़ा बल्कि -त- की वज़न पर पढ़ा ।

उसी प्रकार आह-ओ-फ़ुगाँ में -ह- को खींच कर पढ़ा --हो - के वज़न पर । शायर की मरजी --शायर को इजाजत है ।
यही बात आलम-ए-रंग के साथ है और  रंग-ओ-बू के साथ है ---। वो मिला कर पढ़े या मिला कर न पढ़े --शायर की मरजी --शायर को इजाजत है ।

{नोट- असातिज़ा [ गुरुवरों ] से दस्तबस्ता  गुज़ारिश  है कि अगर कहीं कुछ ग़लतबयानी हो गई हो गई हो तो बराये मेहरबानी  निशान्दिही ज़रूर फ़र्माएं  ताकि मैं आइन्दा ख़ुद को दुरुस्त कर सकूँ --सादर ]

-आनन्द.पाठक-
Mb                 8800927181ं
akpathak3107 @ gmail.com

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 69 [ बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन मुज़ाहिफ़ ]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 69 [ बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन मुज़ाहिफ़ ]

किसी की ग़ज़ल का एक मतला है

नहीं उतरेगा अब कोई फ़रिश्ता  आसमाँ से 
उसे डर लग रहा  होगा  अहल-ए-जहाँ  से 

इस मतले की बह्र और अर्कान इस हक़ीर के मुताबिक़ दर्ज--ए-ज़ेल
यूँ ठहरता है ।

मुफ़ाईलुन---मुफ़ाईलुन--मुफ़ाईलुन--- फ़े’लुन
1 2  2  2--- 1 2 2 2 ---1 2 2 2 ---1 2 2 
बहर-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम महज़ूफ़ 

[नोट-किसी मंच पर किसी मित्र को इस बह्र तकि जवीज पर ऐतराज़ था
उनका कहना था कि यह बह्र दुरुस्त नहीं है ऐसी कोई बह्र नहीं होती।

क्यों नही होती -? इस बात का तो उन्होने कोई सन्तोष जनक जवाब नहीं दिया।
मैं अपना जवाब आप लोगों के बीच दे रहा हूँ । आप बताएँ मेरी वज़ाहत 
कहाँ तक सही है और कहाँ तक ग़लत ?

यह आलेख उसी सन्दर्भ में लिखा गया है ।]

अगर मुफ़ाईलुन [1 2 2 2 ]  पर ’हज़्फ़’ का ज़िहाफ़ लगाया जाए तो फ़े’लुन [1 2 2 ] या ’फ़ऊलुन’ बरामद होगा।

हज़्फ़ का ज़िहाफ़ : अगर रुक्न के आख़िर में ’सबब-ए-ख़फ़ीफ़ ’ हो [जैसे यहाँ -लुन-है ] तो उसको गिरा देना
’हज़्फ़’ का काम है और मुज़ाहिफ़ रुक्न [1 2 2]  जो बरामद होती है -को ’महज़ूफ़ ’ कहते हैं । और यह ज़िहाफ़ किसी शे’र के ’अरूज़/ज़र्ब
कि लिए मख़्सूस है [ यानी ख़ास है ।

यह ज़िहाफ़ ’ मुफ़ाईलुन’ [1 2 2 2 ] पर नहीं लगेगा ऐसी  कहीं  कोई मनाही तो नहीं ?

मुमकिन है कि मेरे मित्र को  यह बह्र किसी अरूज़ की किताब में न दिखी हो
या किसी मुस्तनद शायर का कोई कलाम  इस बहर में उनके ज़ेर-ए-नज़र न गुज़रा हो।

1-अरूज़ , बह्र का सिर्फ़ क़ायदा -क़ानून-निज़ाम  बताता है । किताबों में अरूज़ के प्रत्येक बह्र के
[ मुरब्ब: .मुसद्दस, मुसम्मन या मुज़ाहिफ़  }लिए उदाहरण देना या तफ़्सीलात पेश करना
मुमकिन नहीं है और न कोई मुसन्निफ़ [लेखक ] ऐसा करता है । अत: प्रत्येक बह्र किताबों में आ ही जाय
ज़रूरी नहीं।अत: जो बह्र किताबों में न मिले या न दिखे - वह बह्र नही हो सकती -कहना मुनासिब नहीं।

2- मेरा मानना है जबतक कोई बह्र अरूज़ के ऐन निज़ाम , के मुताबिक़ हो और क़वाईद और क़वानीन की कोई
खिलाफ़वर्जी न करता हों तो उसे बह्र मानने में किसी को एतराज़ नहीं होना चाहिए ।या जबतक अरूज़ कोई मनाही न करता हो
या कोई क़ैद न लगाता हो ,तो ऐसे बह्र में तबाज़्माई की जा सकती है ।

3- यह बात सही है कि शायरों ने ज़्यादातर कलाम "बहर-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम " या बह्र-ए-हज़ज मुसद्दस महज़ूफ़ में कहें  हैं
     मेरा कहना है कि अगर बह्र-ए-हज़ज मुसद्दस महज़ूफ़ जब मानूस और राइज है और शे’र या ग़ज़ल कहे जा सकते है  तो फिर इसके ’मुसम्मन महज़ूफ़’
      शकल में शे’र क्यॊं नहीं कहे जा सकते हैं ।
4- अगर शायरों ने इस बह्र [ हज़ज मुसम्मन महज़ूफ़ ] में कम शायरी की तो इसका मतलब यह तो नहीं कि यह बह्र वज़ूद नहीं क़रार

     पा सकती । शायरों ने मुद्दत से "बह्र-ए-वाफ़िर" में भी कलाम पेश नहीं किए तो क्या ’बहर-ए-वाफ़िर ’  वज़ूद में नहीं होना चाहिए ?

{नोट- असातिज़ा [ गुरुवरों ] से दस्तबस्ता  गुज़ारिश  है कि अगर कहीं कुछ ग़लतबयानी हो गई हो गई हो तो बराये मेहरबानी  निशान्दिही ज़रूर फ़र्माएं  ताकि मैं आइन्दा ख़ुद को दुरुस्त कर सकूँ --सादर ]

-आनन्द.पाठक-
Mb                 8800927181ं
akpathak3107 @ gmail.com

उर्दू बह्र पर एक बातचीत ; क़िस्त 68 [ एक सामान्य बातचीत 01 ]

{नोट--मेरे एक मित्र ने अरूज़ के मुतल्लिक़ एक सवाल किया था ,यह आलेख उसी सन्दर्भ  [संशोधित और परिवर्धित रूप ] में  लिखा गया है  जिससे अन्य मित्रगण भी मुस्तफ़ीद [लाभान्वित ] हो सकें 

्सवाल ---
आदरणीय आदाब। 
होली की अग्रिम बधाईयॉ। 
कृपया मार्ग दर्शन करें। 
अधिकार, पुरुषोत्तम, गिरि, दुहिता, लघु जैसे शव्दों में आगे के दो लघुओं को १+१= २ मात्रा करके मुफरद बहरों के २ के स्थान पर लिखा जा सकता है क्या? कृपया कारण भी बताएँ।

जवाब --
आ0  ख़ान साहब
होली की बधाई के लिए आप का बहुत बहुत धन्यवाद।

आप के सवाल के दो पहलू है

एक  --हिन्दी छन्द-शास्त्र का
दूसरा --  [उर्दू में ] अरूज़ का

समस्या यहीं है
 जब हम दोनो पहलू को एक साथ मिला कर  देखते हैं ,वहीं से ख़ल्त मल्त शुरु  हो जाता है। मेरा मानना है --हिन्दी की काव्य विधायें हिन्दी छन्द शास्त्र से देखी और परखी जाएँ और उर्दू के अस्नाफ़-ए-सुखन
उर्दू अरूज़ के नुक्त-ए-नज़र ्से देखें जाएँ । छन्द शास्त्र का व्याकरण अलग है और ग़ज़ल का व्याकरण अलग है । हमारे कुछ हिन्दी के साथियों ने दोनों विधाऒं के एक मंच पर लाने का प्रयास कर रहें है । कुँअर बेचैन साह्ब ने ’ग़ज़ल का व्याकरण ’ किताब में इस दिशा में एक प्रयास किया गया है। उन्होने उर्दू बह्र के कुछ हिन्दी नाम भी सुझाएँ हैं ।कुछ लोगों ने रुक्न का हिंदी नाम ’मापनी’ भी दिया है।परन्तु यह बहुत मान्यता प्राप्त नहीं कर सकी है।

हिन्दी छन्द शास्त्र में---मात्रा की गणना करते है /लघु/ह्रस्व -दीर्घ की मात्रा से करते है ।हिन्दी में जैसा बोलते हैं वैसा ही लिखते है और वैसा ही गणना करते है।
परन्तु  अरूज़ में  हर्फ़/लफ़्ज़ का वज़न  तलफ़्फ़ुज़ के आधार पर [नातिक़ हर्फ़, ग़ैर नातिक़ हर्फ़ यानी मलफ़ूज़ी और ग़ैर मल्फ़ूज़ी हर्फ़ ,हरकत. साकिन हर्फ़ ,मक्तूबी ,ग़ैर मक़्तूबी हर्फ़, ] के आधार पर करते हैं। रुक्न की माँग  पर वज़न निकालते है .ज़रूरत पड़ती है तो  हर्फ़ के वज़न गिराते भी हैं
]
उर्दू में ऐसे बहुत से हर्फ़ ऐसे हैं जो लिखते तो  है [जिन्हे मक़्तूबी  यानी किताबत किया हुआ ,लिखा हुआ कहते हैं ]मगर तलफ़्फ़ुज़ में नहीं आता ।जैसे ’ख़्वाब’ में ’वाव’ तलफ़्फ़ुज़ में नहीं आता तो तक़्तीअ में उसका वज़न नहीं लेते।

उर्दू में 1+1 को 2 नहीं मानते ।  अगर ऐसा होता भी है  तो वो "तस्कीन-ए-औसत"  की  अमल से ऐसा होता है जिसे हम हिन्दी वाले समझते हैं कि उर्दू में 1+1=2 होता है

उदाहरण
उर्दू में एक  रुक्न  है ’ फ़ाइलुन ’ -बह्र-ए-मुतदारिक का बुनियादी रुक्न है । इस सालिम रुक्न पर अगर "ख़ब्न’ का ज़िहाफ़ लगा दें तो मुज़ाहिफ़ शकल " फ़ अ’ लुन "[ 1 1 2 ] हासिल  होगा । इस "फ़अ’लुन " [1 1 2 ] जिसमे [ फ़े--ऐन--लाम तीन मुतहर्रिक एक साथ आ गए हैं और तस्कीन-ए-औसत की अमल से बीच वाला  मुतहर्रिक [यानी - ऐन- को] ’साकिन’ कर देते हैं तो यही 1 1 2 अब  फ़ अ’ लुन [ यानी -ऐन- अब साकिन हो गया इस अमल से ] 2 2  हो जायेगा । बस यहीं से हम समझ लेते है ं कि उर्दू में ’दो लघु [1 +1 ]मिल कर  2 हो जाता है ।अरे  1+1 यहाँ 2  हुआ तो ज़रूर ,मगर तस्कीन के अमल से हुआ जो हिन्दी के छन्द-शास्त्र से बिलकुल मुख्तलिफ़ [अलग]  है। यह विषय दोनो ही भाषाओं में  ख़ुद एक तवील मौज़ू है ।
अब एक उदाहरण और देखते हैं
आप जानते हैं कि उर्दू अर्कान में दो रुक्न ऐसे है जिसमे  -1 1- आता है
मु त फ़ाइलुन [ 1 1 2 1 2 ] --बह्र-ए-कामिल का बुनियादी रुक्न है
और
मुफ़ा इ ल तुन [ 1 2 1 1 2 ]--बह्र-ए-वाफ़िर का बुनियादी रुक्न है
अगर आप के सवाल के मुताबिक़ "दो लघुओं को १+१= २ मात्रा करके मुफरद बहरों के २ के स्थान पर " लिखें तो क्या होगा ?
मु त फ़ा इलुन [ 1 1 2 1 2] -- 2  2 1 2 [ मुस तफ़ इलुन ] हो जायेगा जो बह्र-ए- रजज़ का बुनियादी रुक्न है -----जो सही नहीं होगा ।इससे तो बह्र में मुबहम [ भ्रम] पैदा हो जायेगा जो उचित नहीं है । इसी प्रकार
मुफ़ा  इ ल तुन [ 12 1 1 2 ] --1 2  2  2 [ मफ़ा ईलुन     ] हो जायेगा जो बह्र-ए-हज़ज  का बुनियादी रुक्न है ---जो सही नहीं होगा । इस से तो भ्रम की स्थिति पैदा हो जाएगी जो उचित नहीं है

अब आप कहेंगे इन दोनों अर्कान पर ’तसकीन-ए-औसत’ का अमल कर के  1 +1  को 2 कर देते है । नहीं वो भी नही कर सकते हैं। कारण कि तस्कीन-ए-औसत का अमल हमेशा ’मुज़ाहिफ़ रुक्न [ वह रुक्न जिस पर ज़िहाफ़ लगा हुआ हो। पर होता है । सालिम रुक्न पर कभी नहीं होता ।

हाँ यदि आप काम चलाऊ जवाब चाहते है तो मेरे ख़याल से

हिन्दी में  जैसा लिखते है
वैसा बोलते हैं  तो  उर्दू में जैसा बोलेंगे
अधिकार =  1 1 2 1 2 2 1
पुरुषोत्तम = 1 1 2 2 1          2 2 2 1
गिरि        =1 1  2

अब आप तय करें कि शे’र-ओ-सुखन के लिए कौन सा विधि अपनायेंगे----हिन्दी का छन्द-शास्त्र या उर्दू का अरूज़ ?
मेरी राय तो यह है
1- उर्दू के शे’र-ओ-सुखन - उर्दू के अरूज़ की नुक्त-ए-नज़र से देखी जाए
2- हिन्दी के छन्द "हिंदी के छ्न्द शास्त्र’ के दॄष्टिकोण से देखा जाए
3- अरूज़ के अर्कान को 1 1 2 2 1 जैसे अलामात से नहीं बल्कि उनके नाम से जैसे फ़े’लुन--फ़ाइलुन---मफ़ाईलुन----आदि के नामों से पढ़ा और समझा जाए तो बेहतर

{नोट- असातिज़ा [ गुरुवरों ] से दस्तबस्ता  गुज़ारिश  है कि अगर कहीं कुछ ग़लतबयानी हो गई हो गई हो तो बराये मेहरबानी  निशान्दिही ज़रूर फ़र्माएं  ताकि मैं आइन्दा ख़ुद को दुरुस्त कर सकूँ --सादर ]

-आनन्द.पाठक-
Mb                 8800927181ं
akpathak3107 @ gmail.com

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 67 [ शायरी का एक ऐब -शुतुरगर्बा ]

उर्दू शायरी का एक ऐब : शुतुरगर्बा

डा0 शम्शुर्रहमान फ़ारुक़ी ने अपनी क़िताब " अरूज़ आहंग और बयान’ में लिखा है -

शे’र में ’ग़लती’  और”ऐब’ दो अलग अलग चीज़ हैं। ग़लती महज़ ग़लती है ।न हो तो अच्छा ।
मगर इसकी मौजूदगी में भी शे’र अच्छा हो सकता है ।जब कि ’ऐब’ एक ख़राबी है और शे’र की मुस्तकिल [स्थायी]
ख़राबी का बाइस [कारण] हो सकता है ।

शायरी [ शे’र ] में कई प्रकार के ऐब का ज़िक्र आता है जिसमें  एक ऐब " शुतुर्गर्बा का  ऐब"  भी शामिल है ।
 शुतुर्गर्बा का लग़वी [शब्द कोशीय ] अर्थ "ऊँट-बिल्ली" है यानी शायरी के सन्दर्भ में यह ’बेमेल" प्रयोग के अर्थ में किया जाता है
[शुतुर= ऊँट  और  गर्बा= बिल्ली । इसी ’शुतुर’ से शुतुरमुर्ग भी बना है । मुर्ग= पक्षी । वह पक्षी जो  पक्षियों ऊँट जैसा लगता हो या दिखता हो--]
ख़ैर

अगर आप हिन्दी के व्याकरण से थोड़ा-बह्त परिचित हों तो आप जानते हैं

उत्तम पुरुष सर्वनाम-मैं-
       एकवचन   बहुवचन
मूल रूप     मैं     हम
तिर्यक रूप मुझ    हम
कर्म-सम्प्रदान मुझे     हमें
संबंध     मेरा,मेरे,मेरी     हमारा.हमारे.हमारी

मध्यम पुरुष सर्वनाम-’तू’
एकवचन बहुवचन
मूल रूप तू तुम
तिर्यक रूप तुझ तुम
कर्म-सम्प्रदान तुझे तुम्हें
संबंध तेरा-तेरे--तेरी तुम्हारे-तुम्हारे-तुम्हारी


अन्य  पुरुष सर्वनाम-’वह’-
            एकवचन बहुवचन
मूल रूप            वह वे
तिर्यक रूप    उस उन
कर्म-सम्प्रदान    उसे उन्हें
संबंध उसका-उसकी-उसके उनका-उनके-उनकी

अन्य पुरुष सर्वनाम-यह-
           एकवचन बहुवचन
मूल रूप            यह ये
तिर्यक रूप    इस इन
कर्म-सम्प्रदान     इसे इन्हें
संबंध इसका-इसकी-इसके/ इनका-इनकी-इनके

कभी कभी शायरी में बह्र और वज़न की माँग पर हम लोग -यह- और -वह- की जगह -ये- और -वो- वे- का भी प्रयोग ’एकवचन’
के रूप में करते है -जो भाव के सन्दर्भ के अनुसार सही होता है
शे’र में एक वचन-बहुवचन का पास [ख़याल] ्रखना चाहिए । व्याकरण सम्मत होना चाहिए।यानी शे’र में सर्वनाम की एवं तत्संबंधित क्रियाओं में  "एक रूपता" बनी रहनी चाहिए
ख़ैर
दौर-ए-हाज़िर [वर्तमान समय ] में नए शायरों के कलाम में यह दोष [ऐब] आम पाया जाता है । अजीमुश्शान शायर [ प्रतिष्ठित शायर] के शे’र भी ऐसे
ऐब से  अछूते नहीं रहे हैं। हालाँ कि ऐसे उदाहरण इन लोगों के कलाम में बहुत कम इक्का-दुक्का ही मिलते है ।
’ग़ालि’ब’ का एक मशहूर शे’र है। आप सबने सुना होगा।

मैने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन
ख़ाक हो जायेंगे हम तुमको ख़बर होने तक
-ग़ालिब-

इस शे’र में बह्र और वज़न के लिहाज़ से कोई ख़राबी  नहीं है मगर ’शुतुरगर्बा’ का ऐब है। कैसे ?
पहले मिसरा में "मैनें और दूसरे मिसरा में ’हम’ --जो अज़ रूए-क़वायद [ व्याकरण के हिसाब से ] दुरुस्त नहीं है
अगर शे’र में ’मैने’ की जगह ’हमने" कह दिया जाय तो फिर यह शे’र ठीक हो जाएगा । हो सकता है कि ग़ालिब के किसी मुस्तनद दीवान
[प्रामाणिक दीवान ] में शायद यही  सही रूप  लिखा हो ।”
’मोमिन’ की एक मशहूर ग़ज़ल है --जिसे आप सभी ने सुना होगा । ---तुम्हें याद हो कि न याद हो ---। नहीं नहीं मैं आप की बात नहीं कर रहा हूँ । यह तो उस ग़ज़ल की ’रदीफ़’ है । इस ग़ज़ल को कई गायकों ने अपने बड़े ही दिलकश अन्दाज़ में गाया है
यदि आप ने इस ग़ज़ल के मक़्ता पर कभी ध्यान दिया हो तो मक़्ता यूँ है

जिसे आप कहते थे आशना,जिसे आप कहते थे बावफ़ा
मैं वही हूँ मोमिन-ए-मुब्तिला ,तुम्हें याद हो कि न याद हो 
-मोमिन-

यह शे’र बह्र-ए-कामिल की एक खूबसूरत मिसाल है । इस शे’र में भी बह्र और वज़न के हिसाब से कोई नुक़्स नहीं है
पहले मिसरा में ’आप’ और दूसरे मिसरा में ’तुम्हें’ --यह शुतुरगर्बा का ऐब है
मगर यह कलाम इतना कर्ण-प्रिय , दिलकश और मक़्बूल है कि  हम लोगों का ध्यान इस तरफ़ नहीं जाता ।
मगर ऐब है तो है --और चला  आ रहा है ।
[नोट - अगर मिसरा सानी मे थोड़ी सी तरमीम कर दी जाये तो मेरे ख़याल से मिसरा सही हो जायेगा
 जिसे तुम भी कहते थे  आशना  ,जिसे तुम भी कहते थे बावफ़ा 
’आप ’ [ 2 1] की जगह ’तुम भी [ 2 1 ]   यानी  ’भी ’   मुतहर्रिक ---मेरे ख़याल से वज़न और बह्र अब भी बरक़रार है ] शे’र की तासीर में क्या फ़र्क पड़ा -नहीं मालूम ]

एक बात और
सिर्फ़ असंगत सर्वनाम के प्रयोग या वचन  के प्रयोग से ही यह ’ऐब’ होता हो नहीं । कभी कभी इससे सम्बद्ध ’क्रियाओं’ के असंगत प्रयोग से भी यह दोष उत्पन्न होता है
ग़ालिब का ही एक शे’र लेते हैं

वादा आने का वफ़ा कीजिए ,यह क्या अन्दाज़ है 
तुम्हें क्या सौपनी है अपने घर की दरबानी मुझे ?
-ग़ालिब-

मिसरा उला  मे "कीजिए" से ’आप’ का बोध हो रहा है जब कि मिसरा सानी में ’तुम्हें’ -कह दिया
है न असंगत प्रयोग ? जी हां ,यहाँ शुतुर गर्बा का ऐब है ।

 एक मीर तक़ी मीर का शे’र देखते हैं

ग़लत था आप से  ग़ाफ़िल गुज़रना
न समझे हम कि इस क़ालिब में तू था 
-मीर तक़ी मीर-

वही ऐब । पहले मिसरे में ’आप’ और दूसरे मिसरे में ’तू’ " ग़लत है ।ऐब है॥शुतुरगर्बा ऐब।

 अगर आप क़दीम [पुराने ] शो’अरा के कलाम इस नुक़्त-ए-नज़र से देखेंगे तो  ऐसे ऐब आप को भी नज़र आयेंगे।

किसी का ’ऐब’ देखना कोई अच्छी बात तो नहीं ।मगर हाँ -- ऐसे दोष को देख कर आप अपने शे’र-ओ-सुखन में इस दोष से बच सकते हैं
और ख़ास कर अपने नौजवान साथियों से ,शायरों से यह निवेदन है कि अपने कलाम में शे’र-शायरी में ऐसे ’ऐब’ से बच सकें।

{नोट- असातिज़ा [ गुरुवरों ] से दस्तबस्ता  गुज़ारिश  है कि अगर कहीं कुछ ग़लतबयानी हो गई हो गई हो तो बराये मेहरबानी  निशान्दिही ज़रूर फ़र्माएं  ताकि मैं आइन्दा ख़ुद को दुरुस्त कर सकूँ --सादर ]

-आनन्द.पाठक-
Mb                 8800927181ं
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उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 66 [ अल्लामा इक़बाल साहब की एक ग़ज़ल ]

इक़बाल साहब की एक बहुत मशहूर ग़ज़ल है 
कभी हक़ीक़त-ए-मुंतज़र नज़र लिबास-ए-मजाज़ में
कि हज़ारों सज्दे तड़प रहे हैं मिरी जबीन-ए-नियाज़ में
तरब-आशना-ए-ख़रोश हो तो नवा है महरम-ए-गोश हो
वो सरोद क्या कि छुपा हुआ हो सुकूत-ए-पर्दा-ए-साज़ में
तू बचा बचा के रख इसे तिरा आइना है वो आइना
कि शिकस्ता हो तो अज़ीज़-तर है निगाह-ए-आइना-साज़ में
दम-ए-तौफ़ किरमक-ए-शम्अ ने ये कहा कि वो असर-ए-कुहन
तिरी हिकायत-ए-सोज़ में मिरी हदीस-ए-गुदाज़ में
कहीं जहाँ में अमाँ मिली जो अमाँ मिली तो कहाँ मिली
मिरे जुर्म-ए-ख़ाना-ख़राब को तिरे अफ़्व-ए-बंदा-नवाज़ में
वो इश्क़ में रहीं गर्मियाँ वो हुस्न में रहीं शोख़ियाँ
वो ग़ज़नवी में तड़प रही वो ख़म है ज़ुल्फ़-ए-अयाज़ मैं
मैं जो सर-ब-सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम-आश्ना तुझे क्या मिलेगा नमाज़ में
[ रेख़्ता के सौजन्य से ]

शब्दार्थ 
1-ईश्वरीय प्रेम का साधक 5- ईश्वर की नज़र में 
2-सांसारिक प्रेम का चोला 6-शरण ,शान्ति
3-श्रद्धानत माथा 7-गुनाह
4-टूटा  8-क्षमा करुणा कॄपा
9- ग़ज़नवी के एक नजदीक़ी गुलाम ’अयाज़’ के घुँघराले बालों में 

यह ग़ज़ल बहुत ही फ़लसफ़ाना और बुलन्द मयार का है
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मेरे एक मित्र ने अनुरोध किया था कि "उर्दू बह्र पर एक बातचीत: क़िस्त8 में वर्णित
बह्र-ए-कामिल कुछ ख़ास समझ में नहीं आया और कहीं कहीं उन्हें कुछ समझने में दुविधा
भी थी ।
मैने सोचा कि बह्र-ए-कामिल की तफ़्सीलात किसी ख़ास ग़ज़ल से की जाय तो शायद मेरे मित्र को
बह्र-ए-कामिल समझने में कुछ सुविधा हो ।
इस लिए मैने अल्लामा इक़बाल साहब की एक मशहूर ग़ज़ल --कभी ऎ हक़ीक़त-ए-मुन्तज़िर---" लिया है
जो बह्र-ए-कामिल की एक उम्दा मिसाल है ।
यह आलेख उसी सन्दर्भ में लिखा गया है ।...
...
 अरूज़ में निम्न लिखित दो बह्रें  ऐसी हैं जो अरबी अदब -ओ-अरूज़ से उर्दू शायरी में आई है
1-बह्र-ए-कामिल जिसका बुनियादी रुक्न ’मु त फ़ाइलुन [ 1 1 212 ] है और जिसमें  -मीम [1]- और -ते [1]- मुतहर्र्रिक हैं यानी इन दोनो हरूफ़ पर ’हरकत’ है 
2-बह्र-ए-वाफ़िर  जिसका बुनियादी  रुक्न ’मफ़ा इ ल तुन [ 12 1 1 2 ] है जिसमें -ऐन[1]- और -लाम[1]-मुतहर्रिक है यानी इन दोनों हरूफ़ पर ’हरकत’ है 

इन दोनों बह्र के बाबत  कुछ दिलचस्प बातें भी है ।दर्ज-ए-ज़ैल है [नीचे लिखी हैं]
[1] यह दोनो बह्रें अरबी  अरूज़ से आईं हैं
[2] क्लासिकल अरूज़ के 8-सालिम अर्कान में यही दो अर्कान ऐसे हैं जिसमे ’दो मुतहर्रिक’[ 1 1 ] एक साथ आते हैं
[3] यही दो अर्कान ऐसे है जिसमें ’फ़ासिला’ का प्रयोग करना पड़ता है वरना सभी रुक्न में "वतद और सबब’ से काम चल जाता है । काम तो ख़ैर वतद और सबब से इस में भी चल जायेगा
      [ फ़ासिला --वो चार हर्फ़ी कलमा जिसमे हरूफ़ ’हरकत +हरकत+हरकत+ साकिन" के क्रम में हो उसे "फ़ासिला सग़रा" कहते हैं जैसे शब्द "हरकत" खुद ही फ़ासिला सुग़रा है।इसी प्रकार ’बरकत’ भी
  फ़ासिला की एक शकल और है जिसे "फ़ासिला कबरा" कहते है जिसमे 5-हरूफ़ एक् साथ [ हरकत+हरकत+हरकत+हरकत+साकिन] वाले कलमा हो । उर्दू शायरी "फ़ासिला कबरा" को
सपोर्ट नहीं करती।ख़ैर
[4] उर्दू शायरी में जो ज़िहाफ़ात लगभग 50-के आसपास है उसमें से 11-ज़िहाफ़ तो सिर्फ़ इन्ही दो अर्कान पर लगते है । मगर खूबी यह कि कोई शायर इस बह्र में 2-4 ज़िहाफ़ से ज़्यादा प्रयोग नहीं करता
कारण कि बह्र-ए-कामिल का मुसम्मन सालिम आहंग खुद ही इतना आहंगखेज़ और दिलकश है कि अन्य कोई आहंग आजमाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती । यहाँ तक कि लोग मुसद्दस सालिमऔर मुरब्ब ्सालिम
में भी ग़ज़ल नहीं कहते हैं । और करते भी होंगे तो आटे में नमक के बराबर ।
[5]  यह दोनो रुक्न आपस में ’बरअक्स’ [ Mirror Image ] हैं । देखिए कैसे ?

मु त फ़ाइलुन [ 1 1 2 1 2 ] = फ़ासिला सुग़रा [1 1 2 ]+वतद मज़्मुअ’[ 1 2]---कामिल का रुक्न
मफ़ा इ ल तुन [ 1 2 1 1 2 ]= वतद मज़्मुअ’ [ 1 2 ] + फ़ासिला सुग़रा [ 1 1 2 ]-- वाफ़िर का रुक्न
देखिए दोनो रुक्न में फ़ासिला या वतद location ! Mirror image लगता है कि नहीं ?

[6]   बह्र-ए-कामिल में तो अमूमन सभी शायरों ने ग़ज़ल कही .मगर बह्र-ए-वाफ़िर में बहुत कम ग़ज़ल कही गई लगभग न के बराबर । शायद बह्र-ए-वाफ़िर के रुक्न की बुनावट ही ऐसी हो जो आहंगखेज न हो।दिलकश न हो।
हाँ आप या कोई अन्य बह्र-ए-वाफ़िर में शायरी करना चाहे तो मनाही भी नही । यह आप का फ़न होगा।
 [7] इन दो-अर्कान में 3-हरकत एक साथ आ रहे है मगर ख़याल रहे इन पर तस्कीन-ए-औसत का अमल नहीं होगा ? कारण ? कारण यह कि तस्कीन-ए-औसत का अमल हमेशा ’ मुज़ाहिफ़ रुक्न" पर होता है
’सालिम रुक्न’ पर कभी नहीं होता।
चूंकि इसमे 3-हरकत एक साथ आ रहे हैं तो ्यहाँ सारा खेल ’मुतहर्रिक ’ हर्फ़ का है
ज़रूरी नहीं कि जिस हर्फ़ पर ’ज़बर ’ का अलामत लगा हो --मात्र वही हर्फ़ मुतहर्रिक हों जिस हर्फ़ पर ’ज़ेर’ और ’पेश’ ’[यानी स्वर ]  की अलामत लगा होता है या दो-चस्मी के साथ हो  वह भी मुतहर्रिक होता है जैसे -कि- कू- के --भी--थी--

ब इक़बाल साहब की ग़ज़ल की तक़्तीअ’ पर आते हैं
1   1 - 2  1  2 / 1  1 - 2  1  2   /  1  1  2  1 2  /1  1  2 1 2 = 1 1 2 1 2---1 1 212---1 1 2 1 2 ---1 1 2 1 2
क भी ऎ हक़ी /क़ ते मुन त ज़िर  / न ज़ (र आ)  लिबा / से म जाज़ में 
1   1  - 2 1  2       / 1 1 - 2  1 2  / 1 1  2    1 2  / 1 1  - 2 1 2 = 1 1 2 1 2---1 1 212---1 1 2 1 2 ---1 1 2 1 2
कि ह ज़ारों सिज/ द त ड़प रहे / है ,मि -री  जबी /ने -नि  याज़ में

[ ध्यान देने की बातें --- तक़्तीअ के बारे में
एक बात तो यह  कि जहाँ कसरा-ए-इज़ाफ़त होता है वहाँ इज़ाफ़त के ठीक पहले वाला हर्फ़ मुतहर्रिक माना जाता है । यही बात ’अत्फ़’ [ जैसे रंज-ओ-ग़म ] के साथ भी है।
उदाहरण - दर्द-ए-दिल --में दूसरा हर्फ़ [दाल]-द- मुतहर्रिक हो जाता है वरना तो दर्द में दूसरा -द- साकिन ही होता है
ग़म-ए-दिल -में  -म- [मीम] को मुतहर्रिक हो जाता है  वरना सिर्फ़ लफ़्ज़  ’ग़म’ में -मीम- साकिन ही होता है
उसी प्रकार हक़ीक़त-ए-मुन्तज़िर  में -त- [ते-] मुतहर्रिक हो जाएगा वरना तो मात्र हक़ीक़त शब्द में -त- तो साकिन ही होता है।
यहीं एक बात और वाज़ेह कर दूँ
1-उर्दू में हर लफ़्ज़ का पहला हर्फ़ ’मुतहर्रिक’ होता है और आखिरी हर्फ़ ’साकिन’ पर गिरता है । यानी उर्दू का कोई लफ़्ज़ साकिन से शुरु नहीं होता ,। हिन्दी में भी नहीं होता
2- दूसरी बात वस्ल की है --नज़र आ लिबास---में न ज़ (र+आ} --यानी -रे- के साथ -अलिफ़ मद्द- का वस्ल होकर तलफ़्फ़ुज़ न ज़ रा का सुनाई देगा यानी 1 1 2 का वज़न आयेगा और यही लिया भी  गया है
यही बात --है मेरी इक --के साथ भी है ।  मि (रिक)  -रे-के साथ -इक- का वस्ल हो कर -रिक-की आवाज़ दे रहा है यानी 2 [सबब-ए-ख़फ़ीफ़] का वज़न दे रहा है
3- हज़ारों - में -रों-- मुतहर्रिक है ।सिज़्दे में -दे- मुतहर्रिक है
4- एक बात और--बहुत से लफ़्ज़ आप को ऐसे दिखाई दे रहे होंगे जिन्हे सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [2]  होना चाहिए मगर बह्र की माँग पर उसे मुतहर्रिक लिया जा रहा है [ मगर कुछ शर्तों के साथ]
यानी तलफ़्फ़ुज़ के हिसाब से तक़्तीअ में लिया जायेगा
5-अरबी में  जबर--ज़ेर--पेश बड़े ही वाज़ेह तरीक़े से लिखते है और दिखाते हैं जिससे पता चलता है कि कौन सा हर्फ़ मुतहर्रिक है मगर न जाने क्यों उर्दू में यह अलामत अब धीरे धीरे कम क्यों दिखी जाने लगी है जिससे मुतहर्रिक हर्फ़ पहचानने
में ज़रा मुश्किल पेश आती है ।यही बात हिंदी में भी देखी जा सकती है । संस्कृत से हिंदी में आये कुछ  तत्सम  शब्दों में [ जैसे  अकस्मात् --अर्थात् ---श्रीमान्--पश्चात् ---] हिंदी में ’हलन्त’ का न लगाना भी ऐसा ही है ।  मगर अनुभव और प्रैक्टिस मश्क़ के साथ साथ मुतहर्रिक और् साकिन्  हर्फ़ समझना आसान हो जाता है । मोटा-मोटी  साकिन् हर्फ़्--हलन्त् व्यंजन् के equivalent समझिए।

ब एक दूसरा शे’र लेते हैं
1  1  2  1  2  / 1  1  2  1  2  / 1  1   2 1 2  / 1 1  2 1 2
तू ब चा ब चा / के न रख इ से / ,ति रा आइना / है वो आइना
1   1     2  1   2   / 1 1   2 1  2    / 1 1   2 1    2   / 1 1  2 1 2
कि शि कस् त: हो / तो अ ज़ी ज़ तर / ,है नि गाह--आ / इ न: साज़  में

ध्यान् देने की बात --तक़्तीअ’ के बारे में
-तू-- के-ति--रा--वो --यह सब मुतहर्रिक शुमार होंगे । जो उर्दू लिपि जानते है वह इसे बा आसानी समझ सकते है
हम हिंदी वालों की मुश्किल यह है कि देवनागरी में लिखे होने के कारण ज़रा समझना मुश्किल हो जाता है
जैसे --आइना--आईना--आइन: [ हम हिंदी में कभी आइन: नही लिखते ] यही कारण है कि इस शे;र में बह्र की माँग पर
-ना- न: के दो अलग अलग वज़न -एक सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [2] और दूसरा -न: [1] - मुतहर्रिक लिया गया है

बाक़ी अश’आर के  तक़्तीअ’  आप इसी तरह कर सकते हैं

चलते चलते एक बात और--आप के लिए

मोमिन की एक मशहूर ग़ज़ल है 

वो जो हम में तुम में क़रार था ,तुम्हें याद हो कि न याद हो
वही यानी वादा निबाह का ,तुम्हें याद हो कि न याद हो

वो जो लुत्फ़ मुझ पे थे पेशतर ,वो करम कि था मेरे हाल पर
मुझे याद सब है ज़रा ज़रा , तुम्हें याद हो कि न याद हो

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जिसे आप कहते थे आशना ,जिसे आप कहते थे बावफ़ा
मैं वहीं हूँ मोमिन-ए-मुबतिला ,तुम्हें याद हो कि न याद हो

[ मक़्ता वाले शे’र में एक ’ऐब’ है --आप बताएँ कि वह कौन सा ऐब है ?

या बशीर बद्र साहब की एक ग़ज़ल है

युँ ही बेसबब न फिरा करो ,कोई शाम घर भी रहा करो
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है ,उसे चुपके चुपके पढ़ा करो

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अभी राह में कई मोड़ हैं ,कोई आएगा कोई जाएगा
तुम्हे जिस ने दिल से भुला दिया उसे भूलने की दुआ करो

या इस हक़ीर की एक ग़ज़ल के चन्द अश’आर भी बर्दाश्त कर लें

वो जो चढ़ रहा था सुरूर था  ,जो उतर रहा है ख़ुमार है
वो नवीद थी तेरे आने की  , तेरे जाने की  ये पुकार  है

ये जुनूँ नहीं  तो  है और क्या . तुझे आह ! इतनी समझ नहीं
ये लिबास है किसी और का ,ये लिबास तन का उधार है

आप बताएँ कि तमाम अश’आर की बह्र क्या है ? जी बिल्कुल सही
ज़रा तक़्तीअ’ कर के भी जाँच लें  तो बेहतर
उमीद करता हूँ कुछ हद तक मैं अपनी बात स्पष्ट कर दिया हूँगा

{नोट- असातिज़ा [ गुरुवरों ] से दस्तबस्ता  गुज़ारिश  है कि अगर कहीं कुछ ग़लतबयानी हो गई हो गई हो तो बराये मेहरबानी  निशान्दिही ज़रूर फ़र्माएं  ताकि मैं आइन्दा ख़ुद को दुरुस्त कर सकूँ --सादर ]

-आनन्द.पाठक-
            8800927181ं
akpathak3107 @ gmail.com