रविवार, 31 मई 2020

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 10 [ ज़िहाफ़ात 01]

उर्दू बह्र पे एक बातचीत :: क़िस्त 10

  ज़िहाफ़ात
[disclaimer clause -वही जो क़िस्त 1 में 
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[ पिछली क़िस्त 09 में मैने ज़िहाफ़ात [ब0ब0 ज़िहाफ़] के बारे में ज़िक़्र किया था ]

इस मज़्मून में  ज़िहाफ़ क्या होते हैं ,कितने क़िस्म के होते है  ,उर्दू शायरी में इनकी क्या अहमियत या हैसियत है , ज़िहाफ़ात न होते तो क्या होता वग़ैरह वग़ैरह पर बातचीत करेंगे
"ज़िहाफ़" का लगवी मानी [शब्द कोशीय अर्थ] ...न्यूनता ,कमी,छन्द की मात्राओं के काट-छाँट कतर-व्योंत करना वगैरह. होता है
मगर शायरी के इस्तलाह [परिभाषा ] में किसी सालिम रुक्न की वज़न [मात्राओं] में काट-छाँट ,क़तर-ब्योंत करना .कम करने के अमल  को ज़िहाफ़ कहते हैं । ज़िहाफ़ लगाने से हमेशा मात्रा में कमी ही हो जाती है ऐसा भी नहीं है कभी कभी वज़न बढ़ भी जाता है। कैसे बढ़ जाता है इसकी चर्चा आगे करेंगे।
तसव्वुर कीजिये कि ’ज़िहाफ़’ न लगाते या ज़िहाफ़ न होता तो क्या होता ? कुछ नहीं होता । सारे शायर बस उन्हीं 7-सालिम और 12 मुरक्क़ब बहूर में शायरी करते रहते फिर शायरी में रंगा रंगी न आती ,जीवन्तता न आती विविधता न आती । बयान की वुसअत न आती ।
तसव्वुर कीजिये कि आप के ज़ेहन [दिमाग] में कोई मिसरा सरज़द [निसृत] हुआ । ज़रूरी नहीं कि मिसरा किसी बहर में ही हो। असातिज़ा शायर[ उस्ताद शायर] जो हज़ारों अश’आर कहते सुनते पढ़ते आए हैं ,मुमकिन है कि उनके मिसरे किसी बहर में ही सरज़द हों मगर जो नौ-मश्क़ [ नए नए उभरते शायर] शायर हैं उन्हे अपने मिसरे को तरासना होता है किसी ज़िहाफ़ की मदद से-किसी बहर में।
तो फिर ये ज़िहाफ़ है क्या ?
ज़िहाफ़ उर्दू शायरी में एक अमल है जो सालिम बहर की शकल और मात्राओं को बदल देता है और बहर फिर भी आहंग में रहती है
आलिम जनाब कमाल अहमद सिद्दक़ी साहब [ जो उर्दू अरूज़ के मुस्तनद [प्रामाणिक] अरूज़ी है अपनी किताब "आहंग और अरूज़" में इन ज़िहाफ़ात की संख्या 48 [अड़तालिस] बतलाई है। घबराईए नहीं। ये सारे ज़िहाफ़ात न आप को याद रखने है और न ही ये सारे ज़िहाफ़ात किसी एक सालिम् बहर पर ही लगते है। ख़ास ज़िहाफ़ात ख़ास सालिम रुक्न पर ही लगते हैं
ज़िहाफ़ के बारे में कुछ बुनियादी बातें है जो ध्यान देने योग्य हैं
1- सारे ज़िहाफ़ सारे रुक्न पर नहीं लगते । कुछ ज़िहाफ़ कुछ ख़ास रुक्न के लिए ख़ास तौर से निर्धारित है हैं[आगे आयेगा]
2-ज़िहाफ़ के अमल से सालिम रुक्न की वज़न ,शकल और नाम बदल जाते हैं और बदली हुई रुक्न[ बदली हुई शकल] को ’मुज़ाहिफ़’शकल कहते है [आगे आयेगा]
3- यह तो आप जानते ही होंगे और पिछले क़िस्तों में ] में हम बयान भी कर चुके हैं कि सालिम रुक्न -सबब-[2-हर्फ़ी लफ़्ज़]और वतद [3-हर्फ़ी लफ़्ज़] के combination से बनते हैं तो ये ज़िहाफ़ भी ’सबब’ और ’वतद’ पर ही लगते हैं । सबब पे लगने वाले ज़िहाफ़ अलग होते हैं और वतद पे लगने वाले ज़िहाफ़ अलग होते हैं।
4-कुछ ज़िहाफ़ आम होते है जो शे’र के किसी भी मुकाम [ सदर..हश्व...अरूज़...इब्तिदा...ज़र्ब] पर आने वाले रुक्न पर लगते है इसे आम ज़िहाफ़ कहते हैं
जब कि कुछ ज़िहाफ़ सिर्फ़ सदर और इब्तिदा के लिए मख़्सूस है या फिर अरूज़ या ज़र्ब मुकाम के लिए ख़ास है [सदर..हस्व...अरूज़...आदि की चर्चा पिछले क़िस्तों  में कर चुके हैं]उन्हें ख़ास ज़िहाफ़ कहते हैं
3- किसी रुक्न पर एक साथ दो ज़िहाफ़ का भी अमल हो सकता है । उसे मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ [मिश्रित ज़िहाफ़]कहते हैं ।यानी दोनो ज़िहाफ़ रुक्न पर एक साथ ही लगेंगे। यह नहीं कि सालिम रुक्न पर एक ज़िहाफ़ का अमल कर दिया और उसकी मुज़ाहिफ़ शकल मिल गई और फिर उसके बाद उस  मुज़ाहिफ़ शकल पर दूसरे ज़िहाफ़ का अमल किया ।्यह अरूज़ी लिहाज से ग़लत होगा।
ज़िहाफ़ हमेशा सालिम रुक्न पर ही लगता है टूटी-फूटी शकल पर नहीं।
4-कुछ ज़िहाफ़[11-ज़िहाफ़] तो अरबी बहर [ बह्र-ए-कामिल और बहर-वाफ़िर ] के लिए मख़्सूस हैं
5 ज़िहाफ़ का अध्याय इतना विस्तृत है  कि इस संक्षिप्त] आलेख में विस्तृत वर्णन करना संभव नहीं है फिर भी
 हम यहाँ 48 -ज़िहाफ़ के नाम न लिख कर ,चन्द मक़्बूल और मशहूर  ज़िहाफ़ का ही नाम लिख रहा हूँ जो उर्दू शायरी में  [प्रचलित] ,मक़्बूल और आहंग खेज़ है
6- ज़िहाफ़ बनाने के कुछ ख़ास नियम ,क़ायदा,.Rules निर्धारित है कि कौन सा ज़िहाफ़ रुक्न के किस स्थान से कौन से मक़ाम का मात्रा गिरायेगा या साकिन कर देगा या साकित कर देगा या उसके अमल से क्या होगा जैसे---
उदाहरण के लिए -एक ज़िहाफ़ है ’ख़ब्न" ---अगर कोई रुक्न सबब-ए-ख़फ़ीफ़ से शुरु होता है तो इस ज़िहाफ़ का काम है. सबब-ए-ख़फ़ीफ़ के दूसरे हर्फ़  को गिराना [ज़ाहिर है कि सबब-ए-ख़फ़ीफ़ का दूसरा हर्फ़ साकिन ही होता है]
फिर उसकी मुज़ाहिफ़ बहर के नाम में "मख्बून’ जोड़ देंगे

वैसे ही एक ज़िहाफ़ है ;कस्र’ ---- अगर कोई रुक्न सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर खत्म होता है तो ज़िहाफ़ क़स्र आखिरी साकिन को साकित कर के उस से पहले वाले हर्फ़ की हरकत को साकिन कर देता है
और उसकी मुज़ाहिफ़ बहर के नाम में ’मक़्सूर’ जोड़ देंगे जैसे

या ऐसे ही एक ज़िहाफ़ है ’ख़रम’ ---अगर कोई रुक्न वतद मज़्मूआ से शुरू हो रहा है तो शुरू होने वाले पहले हर्फ़ को गिराना ’ख़रम’ कहलाता है
और फिर मुज़ाहिफ़ बहर के नाम में ’अख़रम’ जोड़ देंगे

कहने का मतलब यह कि ऐसे ही हर ज़िहाफ़ का अपना उसूल है ...नियम है ...क़ायदा है...कानून है ,जो अरूज़ की किसी किताब में आसानी से मिल जायेगा
अत: हर ज़िहाफ़ का कुछ न कुछ काम होता है जो रुक्न के किसी न किसी स्थान से वज़न का कमी कर देता है  या काट-छाँट कर देता है
मगर कुछ ज़िहाफ़ ऐसे भी है जो रुक्न के वज़न को बढ़ा भी देते हैं [ रुक्न के हर्फ़-ए-अल आखिर मे] यानी रुक्न के आखिरी हर्फ़ में इज़ाफ़ा भी कर देता है
यहाँ पर सभी ज़िहाफ़ात की चर्चा करना न मुमकिन है न मुनासिब है पर यहाँ हम कुछ ख़ास ख़ास ज़िहाफ़ की चर्चा करेंगे
ज़िहाफ़ के नाम        मुज़ाहिफ़  नाम          
ख़ब्न मख़्बून
इज़्मार मुज़्मार
ख़रम अख़रम
ख़रब अख़रब
ह्ज़्फ़ महज़ूफ़
क़तअ मक़्तूअ
कस्र मक़्सूर
क़फ़ मक़्फ़ूफ़
शकल मश्कूल
सलम असलम
शतर अशतर
बतर अबतर
कब्ज़ मक़्बूज़
वग़ैरह....वग़ैरह....वग़ैरह.....वग़ैरह....

अरूज़ में कुछ ज़िहाफ़ ’वतद" के लिए ही मख़्सूस [ख़ास  तौर से निर्धारित ] हैं जो लगेगा तो ’वतद’ पर ही लगेगा जैसे.जैसे.ख़रम..सालिम...हज़ज वग़ैरह वग़ैरह......। यह  और बात है कि वतद के भी 3-भेद [ वतद.ए-मज़्मूआ...वतद-ए-मफ़रुक़...वतद-ए-मौकूफ़ ] होते हैं और इनके लिए भी अलग अलग ’ज़िहाफ़ निर्धारित हैं ...
और कुछ ज़िहाफ़ "सबब" के लिए मख़्सूस है जो लगेगा तो सबब पर ही लगेगा ।जैसे.ख़ब्न...तय्यी...क़ब्ज़..कफ़...वग़ैरह वग़ैरह वग़ैरह ।.यह  और बात है कि सबब के भी 2-भेद [ सबब-ए-ख़फ़ीफ़ और सबब-ए-सकील] होते है और इनके लिए भी अलग अलग ज़िहाफ़ निर्धारित हैं

 अब ऊपर कही हुई बातों को एक उदाहरण से स्पष्ट करते है
एक बहर है -मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम जिसका वज़न होता है ’फ़ऊलुन...फ़ऊलुन...फ़ऊलुन...फ़ऊलुन [यानी 122    122   122  122 ] .यह सालिम बहर है और ’फ़ऊलुन’-सालिम रुक्न है। "फ़ऊ लुन" --एक वतद [तीन हर्फ़ी  फ़ऊ (1 2) ] और एक सबब [दो हर्फ़ी  लुन (2)} से बना है । अब जो भी ज़िहाफ़ लगेगा वो इसी वतद और सबब पर लगेगा।
 ज़िहाफ़ के अमल से सिर्फ़ इसी बहर यानी बहर-ए-मुतक़ारिब  के 13 से ज़्यादा मुज़ाफ़िफ़ बहर बरामद की जा सकती हैं
[नोट-ध्यान रहे कि हर सालिम रुक्न =8 नं0 [फ़ऊलुन...फ़ाइलुन...फ़ाइलातुन...मफ़ाईलुन....मुसतफ़इलुन.. मुफ़ाइलतुन...मुतफ़ाइलुन...मफ़ऊलात] वतद + सबब् के combination - से ही बना है और ज़िहाफ़ भी इन्ही वतद और सबब के टुकड़े पर लगेंगे।]
अब इसी बहर में एक शे’र पढ़ते हैं.जो बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम में है...[अल्लामा इक़बाल का बड़ा ही मशहूर और दिलकश शे’र है]
122--122---122----122
सितारों के आगे जहाँ और भी हैं
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

यह शे’र अरूज़ के लिहाज़ से बिल्कुल वज़न और बहर में है दुरुस्त है साथ ही साथ बहुत ही मानीख़ेज़ [अति अर्थपूर्ण] भी है

अब एक काम करते है
आखिरी रुक्न [औ] र भी हैं [1 2 2] जो शे’र के अरूज़ [मिसरा ऊला ] और इत्तिफ़ाकन शे’र के जर्ब [मिसरा सानी] के मुकाम पर वाके हुआ है में थोड़ी तब्दीली कर देते है [ अल्लामा साहिब से क्षमा याचना सहित] मे से- ’है"- हटा देते है फिर देखते है क्या होता है

122    ---122---  122----12
सितारों के आगे जहाँ और भी
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी
वज़न और बहर के लिहाज़ से यह शे’र भी दुरुस्त है
अब इसका वज़न हो गया 122---122---122---12 यानी सूरत बदल गई और वज़न बदल गया यानी आखिरी रुक्न [1 2 2] के बजाय अब [1 2 ] हो गया यानी आखिरी रुक्न पर कोई ज़िहाफ़ लग गया । जी हाँ ,और उस ज़िहाफ़ का नाम है ’हज़्फ़’ । ज़िहाफ़ "हज़्फ़" का काम है ---अगर किसी रुक्न के अन्त में सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [यहाँ पर [औ] र भी हैं 1 2 2 में "है" (2)] आता है तो "हज़्फ़’ उस सबब-ए-ख़फ़ीफ़ को साक़ित यानी शान्त कर देता है] बज़ाहिर अब मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम बहर ’मुज़ाइफ़’ बहर हो गई और इस बहर का नाम बदल जायेगा यानी ’बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन महज़ूफ़" [क्योंकि आखिरी रुक्न पर ’हज़्फ़’ का अमल है]
यही सूरत तब भी होगी जब मतला में से ’"भी’-हटा देंगे तब मतला हो जायेगा
122    122    122  12
सितारों के आगे जहाँ और हैं
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और हैं

यानी वज़न 122---122---122--12 हो गया और बहर का नाम बज़ाहिर "मुसम्मन सालिम महज़ूफ़’ होगा । कारण वही कि आखिरी रुक्न में "हज़्फ़’ [1 2 फ़ऊ] है
यहाँ ’हज़्फ़’ -एक ख़ास ज़िहाफ़ है कारण कि यह शे’र के ’अरूज़’ और जर्ब’ मुक़ाम के लिये निर्धारित है । मिसरा ऊला का आखिरी रुक्न का मुक़ाम अरूज़ का मुकाम  है और मिसरा सानी के आखिरी रुक्न का मुकाम "जर्ब’ का मुकाम है और यह ज़िहाफ़ सिर्फ़ इन्हीं दो ख़ास मुक़ाम पर लगेगा अत: यह ख़ास ज़िहाफ़ है
अब आप के सामने अल्लामा साहब के नज़्म के 3-विकल्प है

(1)  सितारों के आगे जहाँ और भी हैं
अभी इश्क़ के इम्तिहां और भी हैं  -----  बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम[122---122---122---122]

(2) सितारों के आगे जहाँ और भी
    अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी ----------बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन महज़ूफ़ [122---122---122---12]

(3)  सितारों के आगे जहाँ और हैं
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और हैं --------  बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन महज़ूफ़ [122---122---122---12]

अब आप यह तय करें कि इन तीनों अश’आर में कौन सा शे’र आप को ज़्यादा पसन्द है और क्यों?
इस नज़्म के अन्य शे’र नीचे लिख रहा हूँ

सितारों के आगे जहाँ और भी है
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

तू तायर है परवाज़ है काम तेरा
तिरे सामने आसमाँ और भी हैं

गए दिन कि तनहा था मैं अन्जुमन में
यहाँ अब मिरे राज़दाँ और भी हैं

इसी प्रकार हर उर्दू की बहर पर कोई न कोई ज़िहाफ़ लगाया जा सकता है क्योंकि बहर रुक्न से बनता है और रुक्न ’सबब [2-हर्फ़ी लफ़्ज़] और वतद [3-हर्फ़ी लफ़्ज़] ’ से बनता है  और ज़िहाफ़ इन्हीं वतद और सबब पर लगता है।ऐसे ही अन्य बहर और अन्य ज़िहाफ़ पे चर्चा की जा सकती है।
सिर्फ़ इस रुक्न पे ही अगर 8-10 ज़िहाफ़ लग सकते हैं तो आप कल्पना कर सकते है कि 8-सालिम रुक्न पर कितने ज़िहाफ़ लग सकते है और 19- उर्दू की बहरों की कितनी मुज़ाहिफ़ शकलें हो सकती हैं। मगर घबराईए नहीं । कोई भी शायर सभी बहर में शायरी नहीं करता और न ही सभी मुज़ाहिफ़ बहर में शायरी करता है । वो तो ख़ास ख़ास और मक़्बूल बहर में ही शायरी करता है और ये बहरे लगभग 200 के आस-पास बैठती हैं।
अब एक बुनियादी सवाल --
(क) क्या शायरी के लिए ’अरूज़’ का जानना ज़रूरी है?
कत्तई नहीं ,बिना अरूज़ की जानकारी के भी शायरी की जा सकती है। दर हक़ीक़त बिना मुकम्मल अरूज़ की जानकारी के भी लोग शायरी करते  हैं । अरूज़ जानना वैसे ही ज़रूरी नही है जैसे मुहम्मद रफ़ी के गाना गाने के लिए आप को संगीत की विधिवत शिक्षा लेना ज़रूरी नहीं बस आप को वही लय वही सुर वही ताल वही आलाप वही अवरोह वही आरोह मिला कर भी मुहम्मद रफ़ी के [या ऐसे ही किसी और शायर के] गाने गा सकते है। वैसे ही आप किसी उस्ताद शायर के अश’आर के लय [आहंग ] पर भी शे’र कह सकते है मगर
फिर आप को कभी ये पता न लगेगा और न ही बारीकियाँ ही पता चल पायेगी कि कमी कहाँ पर है और क्यों है या इस में और सुधार की कहाँ गुंजाईश है
(ख) क्या एक अच्छा अरूज़ी [उर्दू का छन्द शास्त्र जानने वाला] क्या एक अच्छा शायर भी होता है?
ज़रूरी नहीं कि एक अच्छा अरूज़ी -एक अच्छा शायर भी हो या एक अच्छा शायर अच्छा अरूज़ी भी हो। दोनो अलग अलग बातें हैं अगर किसी शख़्स में ये दोनों सिफ़त एक साथ  हो तो कहना ही क्या....सोने में सुहागा ...या सोने में सुगन्ध !!!

शायरी सिर्फ़ बहर--वज़न ..रुक्न...मात्रा का ही खेल नहीं असल बात तो उसके ’कथ्य’ में होती है....शे’र की बुनावट में होती है ..मुहावरो के सही प्रयोग में होता  है और यही शायर का हुनर है और यही शे’र का हुस्न है।वरना आजकल तो मंच पर हर तीसरा आदमी शायरी कर रहा है कुछ लोगों की शायरी में कथ्य और बुनावट की बात तो छोड़ ही दीजिए ..मात्रा वज़न क़ाफ़िया रदीफ़ का तो .मालिक .अल्ला अल्ला खैर सल्ला..और उस पर  तुर्रा ये कि 50-100 वाह वाह भी करते मिल जायेंगे हर मंच पर।यही कारण है कि फ़क़त तुक भिड़ा देना या तुकबन्दी कर देना ही शायरी नहीं होती।
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नोट- असातिज़ा [ गुरुवरों ] से दस्तबस्ता  गुज़ारिश  है कि अगर कहीं कुछ ग़लतबयानी हो गई हो गई हो तो बराये मेहरबानी  निशान्दिही ज़रूर फ़र्माएं  ताकि मैं आइन्दा ख़ुद को दुरुस्त कर सकूँ --सादर ]

-आनन्द.पाठक-
Mb                 8800927181ं
akpathak3107 @ gmail.com

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 09 [ सामान्य बातें 02 ]


[Disclaimer clause --वही  क़िस्त 1- में 
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अहबाब-ए-महफ़िल !
    
बहुत दिनों बाद एक बार फिर इस ब्लाग पर हाज़िर हो रहा हूँ। ताख़ीर[विलम्ब] के लिए माज़रतख्वाह[क्षमा प्रार्थी] हूँ। दीगर कामों में मसरूफ़[व्यस्त] था। माहिया निगारी और तन्ज़-ओ-मिज़ाह को माइल [ आकर्षित] हो गया था ।मुझे लगा कि उर्दू बहर पर इस मज़्मून का कोई तलबगार नहीं है तो दीगर अक़्सात के लिए हौसला न हुआ । हमारे एक हिन्दीदाँ  दोस्त ने जब यह कहा कि इन मज़ामीन से वो काफी मुस्तफ़ीद हुए है और कुछ कुछ ग़ज़ल कहने का ज़ौक़-ओ-शौक़ पैदा हो रहा है तो मैं जज़्बाती हो गया कि कोई तो है जो इस मज़ामीन से मुस्तफ़ीद हो रहा है ,यही  सोच कर फिर आ गया हूँ अब ये सिलसिला चलता रहेगा। ख़ुदा इस कारफ़रमाई की तौफ़ीक़ अता करे।

पिछले क़िस्त -8 में मैने उर्दू शायरी में मुस्तमिल [इस्तेमाल में] 19- बहूर [ ब0ब0 बह्र] का ज़िक़्र किया था और उनके नाम और वज़न पर बातचीत की थी ।
www.urdu-se-hindi.blogspot.com पर देख सकते हैं

 इस से पहले कि हम इन बहूर पर बा तरतीब चर्चा करें उस से पहले ’ज़िहाफ़’ पे चर्चा करना मैं ज़रूरी समझता हूँ जिस से आइन्दा मुज़ाहिफ़ बहरें समझने में कारीं को आसानी होगी। 

  ज़िहाफ़....
 यह तो आप जानते है कि बहर ’रुक्न’ से बनती है और इसमे सालिम रुक्न 7- हैं । आप की सुविधा के लिए एक बार फिर दुहरा रहा हूँ
1- फ़ ऊ लुन      =  1 2 2 = बह्र मुतक़ारिब की बुनियादी और सालिम रुक्न है

2-फ़ा इ लुन   2 1  2 = बह्र मुतदारिक की बुनियादी और सालिम रुक्न है

3-मफ़ा ई लुन =   1 2 2 2  = बह्र हज़ज  की बुनियादी और सालिम रुक्न है

4- फ़ा इला तुन=  2 1 2 2  = बह्र रमल की बुनियादीौर सालिम  रुक्न है

5- मुस तफ़ इलुन= 2 2 1 2 = बह्र रजज़ की बुनियादी और सालिम रुक्न है

6- मफ़ा इल तुन = 1 2 1 1 2= बह्र वाफ़िर की बुनियादी और सालिम रुक्न है

7- मुत फ़ा इलुन = 1 1 2 1 2= बह्र कामिल की बुनियादी और सालिम रुक्न है

एक रुक्न " मफ़ ऊ ला तु" भी सालिम है मगर वो किसी बहर की बुनियादी रुक्न नहीं है इसका इस्तेमाल बहर-ए-मुक्तज़िब में करते है मगर मुज़ाहिफ़ शकल में करते हैं
कारण ? कारण यह कि इसका हर्फ़-उल-आखिर [यानी आखिरी हर्फ़ ’तु’ -पर हरकत है और उर्दू शायरी में शे’र का हर्फ़-उल-आखिर ’साकिन’ होता है .हरकत नहीं
जब हम  इसे किसी शे’र में इस रुक्न को बाँधेंगे -जैसे  मफ़ ऊ ला तु" -----मफ़ ऊ ला तु" ----मफ़ ऊ ला तु" ----मफ़ ऊ ला तु"  तो [अरूज़ और ज़र्ब] आखिरी हर्फ़ ’हरकत ’ ’तु’ पर गिरेगा जो शायरी में अरूज़ के लिहाज़ से जायज़ नहीं है इसी लिए इसे सालिम शकल में इस्तेमाल नहीं करते है

तो फिर?

या तो इसे शे’र के  दर्मियान [ इब्तिदा--हश्व..-सदर ] में इस्तेमाल कर सकते है -अरूज़ और ज़र्ब में नहीं। और अगर अरूज़ और ज़र्ब में इस्तेमाल करना ही है तो इस सालिम रुक्न की सालिम शकल के बज़ाय ’ मुज़ाहिफ़ शकल [ इस पर ज़िहाफ़ लगा कर कि आखिरी हर्फ़ साकिन हो जाय ] में इस्तेमाल करेंगे।
 आप ऊपर देखेंगे कि मैने रुक्न के सामने ’बुनियादी और सालिम’ लिखा है । मतलब यह कि इस रुक्न की "ज्यों की त्यों’ [ बिना किसी काट छांट के या रद्द-ओ-बदल के] करते है तो उसे सालिम बहर कहते है 
जैसे - बहर-ए-मुतक़ारिब मुसद्दस सालिम’ या  बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम 
या बहर-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम .... वग़ैरह वग़ैरह

आप अगर ग़ौर से देखे तो रुक्न -1 और रुक्न-2 ,पाँच हर्फ़ी [122 या 212] है जिसे ख़्म्मासी अर्कान कहते है  जब कि बाक़ी रुक्न 7-हर्फ़ी है जिसे सुबाई अर्कान[ब0ब0 रुक्न] कहते हैं । दिलचस्प बात यह है कि उर्दू शायरी में सुबाई [7-हर्फ़ी] अर्कान पहले आया जब कि ख़्म्मासी अर्कान [5-हर्फ़ी] बाद में आया । कहते है 5-हर्फ़ी अर्कान हिन्दी छन्द से आया ।

देखिये कैसे?

हिन्दी छन्द शास्त्र में गण की गणना के लिए ’दशाक्षरी सूत्र है -" यमाताराजभानसलगा" । यह आप सब जानते होंगे
यगण   = यमाता = 1 2 2 = फ़ ऊ लुन
रगण   = राजभा  = 2 1 2 = फ़ा इ लुन  

क्लासिकी अरूज़ की किताबों में यही सालिम रुक्न दिया हुआ या बताया गया है  
मगर
कमाल अहमद सिद्दक़ी साहब [ अरूज़ के उस्ताद माने जाते हैं ] ने अपनी किताब "आहंग और अरूज़" में कहा है तकीनिकी रूप से 8-हर्फ़ी बहुर भी मुमकिन है और उन्होने उस का बाक़यादा नाम भी दिया है जिसकी यहाँ पर चर्चा करना ग़ैर मुनासिब है

बहर बज़ाहिर [स्पष्ट है] रुक्न से बनते है ,रुक्न पर ज़िहाफ़ के अमल से बनते है और कभी कभी तखनीक की अमल से भी बनते हैं यह स्वयं में अलग विषय है

मुरब्ब:---मुसम्मन---मुसद्दस...मुज़ाहिफ़..किसे कहते है -पिछले अक़सात [ब0ब0 क़िस्त ] में बताया जा चुका है। एक बार फिर याद दिहानी करते हुए
मुरब्ब:  =अगर किसी मिसरा में 2-रुक्न [शे’र मे 4-रुक्न ] आते हैं तो उसे मुरब्बा: कहते हैं।[मुरब्ब: माने ही होता है वो समकोण चतर्भुज[4] जिसकी सब रेखायें बराबर हो यानी   वर्गाकार
मुसद्दस = अगर किसी मिसरा में 3-रुक्न [शे’र में 6-रुक्न] आते हैं तो उसे मुसद्दस कहते हैं [मुसद्दस माने ही होता 6-पहलू वाला षट्कोण]
मुसम्मन= अगर किसी मिसरा में 4-रुक्न [शे’र में 8-रुक्न] आते है तो उसे मुसम्मन कहते है[ मुसम्मन मानी ही होता है 8-पहलू वाला यानी अष्ट्कोण]

अगर किसी शेर में 8-12-16 रुक्न आये तो? 

तो नाम तो वही रहेगा मुरब: ...मुसद्दस.....मुसम्मन   मगर उसके आगे एक शब्द ’मुज़ाअफ़’ जोड़ देते  है [मुज़ाअफ़ माने ही होता है दो-गुना करना]
अर्थात अगर किसी शे’र में 16-रुक्न है तो उसे कहेंगे -’ बह्र-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन मुज़ाअफ़ सालिम’ -या 16-रुक्नी बहर

अब सामने एक दिलचस्प पहलू आया -आप ने ध्यान नहीं दिया !
अगर किसी शे’र में 8 रुक्न है तो?

क्या यह "मुरब्ब: मुज़ाअफ़"[4x2=8]  कहलायेगा या  मुसम्मन [8] कहलायेगा?
वो तो शे’र की बुनावट देखने के बाद ही कहा जा सकता है
मुरब्ब: में हश्व नहीं होता सिर्फ़ इब्तिदा-अरूज़ और सदर-ज़र्ब होता है जब कि मुसम्मन के एक मिसरा में 2-हश्व [शे’र में 4-हश्व होते हैं]
अब आप पूछेंगे कि यह सदर----हश्व-----अरूज़---इब्तिदा----ज़र्ब क्या बला है?
जनाब ये बला नहीं हैं शे’र के हुस्न है और ये  शे’र में रुक्न के ख़ास  मुकाम के नाम है
एक मुसम्मन शे’र पढ़ता हू‘ तो ये मकामात वाज़ेह [स्पष्ट] हो जायेंगे

जिगर मुरादाबादी  का एक शे’र है

इक लफ़्ज़-ए-मुहब्बत है , अदना सा फ़साना है
सिमटे तो दिल-ए-आशिक़, फ़ैले तो ज़माना  है

अब इसकी तक़्तीअ करते है 

221---1222   //221---1222
 सदर    / हश्व        // हश्व      / अरूज़
इक लफ़्ज़/-ए-मुहब्बत है //, अदना  ए’/ फ़साना है

  इब्तिदा  /हश्व       //  हश्व    /  ज़र्ब 
सिमटे तो/ दिले आशिक़ //,फ़ैले तो/ ज़माना  है

इस शे’र की बह्र का नाम है "हज़ज मुसम्मन अखरब’ और बीच में जो // लगाया है उसे अरूज़ी वक्फ़ा कहते है । अरूज़ी वक्फ़ा के बारे में कभी विस्तार से और अलग से बात करेंगे

मिसरा उला में 4-रुक्न है और मिसरा सानी में भी 4-रुक्न है अत: कुल मिला कर 8-रुक्न हुए तो बज़ाहिर मुसम्मन है। रुक्न 1 2 2 2 [मफ़ा ई लुन ] है जो बह्र-ए-हज़ज का बुनियादी रुक्न है तो हज़ज मुसम्मन हुआ और रुक्न 221 जो सदर और इब्तिदा के मुकाम पर है और [1 2 2 2 पर ख़र्ब का ज़िहाफ़ लगा तो शकल 2 2 1 में बदल गई यानी मुज़ाहिफ़ बहर हो गई] 

सदर और अरूज़ /या इब्तिदा और ज़र्ब के बीच जो रुक्न है वो हश्व के मुकाम  है 

अर्थात मुसम्मन बहर के एक मिसरा में 2 हश्व ,मुसद्दस बहर में 1 हश्व और मुरब्ब: बहर मे वो भी नहीं यानी कोई हश्व नहीं ।
अच्छा ,कभी आप ने सोचा है बहर में रुक्न 2..4...6....8...16 ही क्यों होते हैं  5....7....9. .रुक्न क्यों नहीं होते?? कारण आप जानते हैं । भाई शे’र में 2- मिसरा जो होते है तो 5--7--9 को कैसे divide करेंगे। हम ने तो ऐसी कोई बह्र देखी नहीं है .आप की नज़र से कभी कोई गुज़री हो तो बताईयेगा। 
 मैं इन मकामात का नाम इस लिए लिख रहा हूँ कि जब हम ज़िहाफ़ की चर्चा करेंगे तो इन का ज़िक़्र आयेगा क्योंकि कुछ ज़िहाफ़ इब्तिदा और सदर मुकाम पर आने वाले रुक्न के लिए मख़्सूस [ख़ास तौर से निर्धारित हैं] जब कि कुछ ज़िहाफ़ अरूज़ और ज़र्ब मुकाम के लिए मख़्सूस होते है\य़ानी हर ज़िहाफ़ हर मुकाम पर नहीं लगते 

एक बात और

ज़िहाफ़ सिर्फ़ रुक्न पर लगते है और रुक्न की शकल [वज़न ] बदल जाती है
आप तो जानते ही है कि रुक्न - सबब [2-हर्फ़ी लफ़्ज़ जैसे..फ़ा....लुन..मुस..मुत तफ़ ..आदि.]और वतद[ 3-हर्फ़ी लफ़्ज़ जैसे..फ़ऊ..मफ़ा..इला..इलुन.........] के combination & permutation से बनते हैं तो ज़िहाफ़ भी इन्ही सबब और वतद  [जिसकी चर्चा हम पिछले क़िस्त में कर चुके हैं ] पर ही अमल आते है और रुक्न की शकल बदल जाती है ।

चलते चलते एक बात और कह दें कि अगर इन सालिम बहर ,मुरक्क़ब बहर ,मुज़ाहिफ़ बहर ,बहर जो तखनीक के अमल से बरामद होती हैं फिर मुसम्मन...मुसद्दस..मुरब्ब; को भी जोड़ लें फिर सदर ---अरूज़--इब्तिदा--अरूज़ को भे जोड़ लें तो इन बहरों की संख्या लगभग 200 के आस पास बैठती है
कोई भी शायर इतने बहर में शायरी नहीं करता ।वो तो चन्द मक़्बूल बहर में ही शायरी करता है । कहते हैं ग़ालिब ने अपने दीवान में 19-20 किस्म के बहूर ही इस्तेमाल किए है जब कि मीर तक़ी मीर ने 28-30 क़िस्म के बहूर इस्तेमाल किए हैं

शायरी में सिर्फ़ बहर और वज़न ही नहीं ’कथन ’[content]   भी मानी रखता है 
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नोट- असातिज़ा [ गुरुवरों ] से दस्तबस्ता  गुज़ारिश  है कि अगर कहीं कुछ ग़लतबयानी हो गई हो गई हो तो बराये मेहरबानी  निशान्दिही ज़रूर फ़र्माएं  ताकि मैं आइन्दा ख़ुद को दुरुस्त कर सकूँ --सादर ]

-आनन्द.पाठक-
Mb                 8800927181ं
akpathak3107 @ gmail.com
 

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 8 [ सामान्य बातें-01 ]


[Disclaimer clause  : -वही भाग 1 का ]
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जैसे किसी काव्य के दो-पहलू होते है ,वैसे ही उर्दू शायरी में भी दो-पहलू हैं
1-कला पक्ष ---में भाषा ,अलंकार छन्द कव्य सौष्ठ्व बह्र वज़न फ़साहत आदि रख सकते हैं
2-भाव पक्ष ----में रस ,तग़ज़्ज़ुल,रंग,तख़य्युल, शे’रियत लताफ़त-ओ-बलाग़त आदि रख सकते हैं

आप तो जानते ही होंगे कि उर्दू शायरी में मुस्तमिल [इस्तेमाल में] बहूर [बह्र का ब0ब0] अरबी और फ़ारसी से आया है । अरबी की बहुत सी बह्रें उर्दू में अब राईज़ [प्रचलित] नहीं है ।
 दौर-ए-हाज़िर [वर्तमान समय में] उर्दू शायरी में 19-बह्रें राइज हैं ,दर्ज़-ए-ज़ैल [ निम्न लिखित] हैं

नाम वज़न    रुक्न
सालिम बहूर
1 बह्र-ए-मुतक़ारिब  1 2 2 फ़ ऊ लुन्
2 बह्र-ए-मुत्दारिक़ 2 1 2 फ़ा इ लुन्
3 बह्र-ए-हज़ज 1 2 2 2 मफ़ा ई लुन्
4 बह्र-ए-रमल 2 1 2 2 फ़ा इला तुन्
5 बह्र-ए-रजज़ 2 2 1 2 मुस तफ़ इलुन्
   मुक़्तज़िब 2 2 2 1     मफ़ ऊ लात
*6 बह्र-ए-वाफ़िर 1 2 1 1 2   मफ़ा इ ल तुन्
7 बह्र-ए-कामिल 1 1 2 1 2   मु तफ़ा इ लुन्

मुरक़्क़ब बहूर

8 बह्र-ए-तवील 1 2 2 + 1 2 2 2 [ फ़ऊलुन्+मफ़ाईलुन्]
9 बह्र-ए-मदीद 2 1 2 2 + 2 1 2 [फ़ाइलातुन्+फ़ाइलुन् ]
10 बह्र-ए-बसीत 2 2 1 2 + 2 1 2 [मुस तफ़ इलुन्+फ़ाइलुन्]
11  बह्र-ए-मुशाकिल 2 1 2 2 + 1 2 2 2 + 1 2 2 2 [फ़ाइलातुन्+ मफ़ाईलुन्+मफ़ाईलुन्]
**12 बह्र-ए-मुन्सरिअ 2 2 1 2 + 2 2 2 1 [मुस तफ़ इलुन्+ मफ़ ऊ लात]
**13 बह्र-ए-मुक़्तज़िब 2 2 2 1 + 2 2 1 2 [मफ़ ऊ लात +मुस तफ़ इलुन्]
**14  बह्र-मज़ारिअ 1 2 2 2 + 2 1 2 2 [मफ़ाईलुन्+फ़ाइलातुन्]
**15  बह्र-ए-मुज्तस   2 2 1 2 + 2 1 2 2 [मुस तफ़ इलुन्+ फ़ाइलातुन्]
**16  बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ 2 1 2 2 + 2 2 1 2 + 2 1 2 2 [ फ़ाइलातुन्+मुस तफ़ इलुन्+फ़ाइलातुन्]
**17  बह्र-ए-सरीअ 2 2 1 2 +2 2 1 2 + 2 2 2 1   [  मुस तफ़ इलु्न्+मुस तफ़ इलुन्+मफ़ ऊ लात] 
**18  बह्र-ए-क़रीब 1 2 2 2 + 1 2 2 2 + 2 1 2 2  [मफ़ाईलुन्+ मफ़ाईलुन्+फ़ाइलातुन्] 
**19 बह्र-ए-ज़दीद    2 1 2 2 + 2 1 2 2 + 2 2 1 2 [फ़ाइलातुन्+फ़ाइलातुन्+मुस तफ़ इलुन्]

घबड़ाइए नहीं । । मैं  तो बस जो इधर उधर से कुछ पढ़ा अपने हिन्दी दाँ दोस्तों के बताने समझने व समझाने के लिए लिख रहा हूँ।ताईराना नज़र {विहंगम दृष्टि}से इस लिए लिख रहा हूँ कि आप को शे’र-ओ-शायरी और उसकी तासीर समझने में सुविधा हो।ग़ज़ल और तुकबन्दी में फ़र्क महसूस कर सके । शरद तैलंग जी का एक शे’र है-

सिर्फ़ तुकबन्दियां ही हैं काफी नहीं
शायरी कीजिए शायरी की तरह

 यहाँ कुछ बातें स्पष्ट कर दें

[1]-कि एक अच्छा ’अरूज़ी’ [ बह्र /छन्द शास्त्र को जानने वाला ] एक अच्छा ’शायर’ भी हो ज़रूरी नहीं और यह भी ज़रूरी नहीं कि एक अच्छा ’शायर" एक अच्छा ’अरूज़ी’ भी हो। दोनो अलग अलग बाते हैं। अगर एक ही शख़्स में ये दोनो सिफ़त [गुण] हो तो समझिए सोने में सुगन्ध भी है।

[1]अ-कि आप बग़ैर इल्म-ए-अरूज़ [छन्द शास्त्र की ग्यान ] के भी शायरी कर सकते हैं वैसे ही कि बिना राग के ज्ञान के बिना फ़िल्मी गाना गाते है। किसी उस्ताद शायर की ग़ज़ल के सहारे सहारे कभी चुटकी बजा कर ,कभी टेबल थपथपा कर बह्र मिला सकते है। दर हक़ीक़त कुछ लोग ऐसा करते भी हैं और दिन में 2-4 "ग़ज़ल" लिख भी लेते है मगर इस से आप को ग़लत-सही का अन्दाज़ा नहीं लग सकता।

[1] ब--- कि ग़ज़ल सिर्फ़ बहर ,वज़न,रुक्न ,रदीफ़ या काफ़िया का पैमां बन्दी ही नहीं होता। वो इस से भी आगे बहुत कुछ होता है

[2]---कि बह्र-ए-मुतक़ारिब और बह्र मुतदारिक़ का रुक्न 5-हर्फ़ी है और इसका ईज़ाद बाद में हुआ यानी 7-हर्फ़ी रुक्न का ईज़ाद पहले हुआ था।

[2]अ-- बहर 6 और 7 अरबी शायरी का है ।अगर आप ग़ौर से देखे तो बहर-ए-वाफ़िर [12 112] ,बहर-ए-कामिल [112 12 ] का बरअक्स [प्रतिबिम्ब mirror image] है | बह्र-ए-कामिल खुद मे इतनी मक़्बूल और आहंग्ख़ेज़ बहर है इसी बहर में अल्लामा इक़बाल की एक ग़ज़ल बड़ी मशहूर है---

कभी ऎ हक़ीक़त-ए-मुन्तज़िर ,नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में  [11212--1121--11212-11212]
कि हज़ारों सिजदे तड़प रहे हैं ,मेरी इक जबीन-ए-नियाज़ में

जो मैं सर-ब-सिजदा हुआ कभी ,तो ज़मीं से आने लगी सदा
तेरा दिल तो है सनम-आश्ना ,तुझे क्या मिलेगा  नमाज में 

कहने का मतलब ये है कि ऐसे मानूस बहर में कम ही शे’र या ग़ज़ल  देखने को मिलते हैं

[3]-अगर आप ग़ौर फ़र्मायें तो देखेंगे कि 7-हर्फ़ी रुक्न[1 से लेकर 5 तक और मफ़ऊलात तक] में 1 की रोटेशन कैसे बदल रही है यानी आप कल्पना करें कि 2 -2 -2- 1 किसी वृत्त पर हो और आप तीन -तीन  अंक एक साथ का गिर्दान लें तो किसी न किसी बह्र का वज़न बनता जायेगा । अरूज़ की भाषा में इस वृत को ’दायरा’ कहते हैं

[4]- मफ़ऊलात को ’सालिम’ बह्र में नहीं रखा गया जब कि इसके रुक्न [2 2 2 1 ] सालिम हैं। कारण कि यह रुक्न अपने सालिम शक्ल में इस्तेमाल नहीं होती । क्यों ? इस लिए कि उर्दू शायरी में मिसरा या शे’र का आख़िरी ’हर्फ़’ साकिन होता है जब कि ’मफ़ऊलात’ का आखिरी हर्फ़ ’त’ पे हरकत है । अगर इस रुक्न को मुसद्दद [ मिसरे में 3 रुक्न -मफ़ऊलात -,मफ़ऊलात-मफ़ऊलात ] या ’मुसम्मन में [ मिसरे में 4 रुक्न] बांधे तो आखिरी ’हर्फ़’ जो होगा वो हरकत पे ख़त्म होगा जो उर्दू के शे’र में ज़ायज नहीं माना जाता है। तब ?? इसी लिए इस रुक्न की ’मुज़ाहिफ़’[ बदली हुई] शक्ल इस्तेमाल करते हैं जिससे ’मिसरे’ का आख़िरी ’हर्फ़’ साकिन पे गिरे।
[ पाठकों की जानकारी के लिए- हिन्दी  में आजकल ’साकिन’ और ’हरकत’ का concept  नहीं है । संस्कृत में है।
साकिन को मोटा मोटी आप यूँ समझे ’हलन्त’ लगा हुआ वर्ण जैसे तत्पशचात्...कदाचित्..अकस्मात्. और हरकत को आप मोटा मोटी यूँ समझे जैसे ’रात’ ’बात’ यानी ’त’ पर जबर या फ़त्ता: का [हरकत] है]

[5]- ऊपर एक से लेकर सात तक ’सालिम’ बह्रें कहलाती है कारण कि इसके रुक्न बिना किसी काट-छांट या कतर-ब्योंत के अपने सालिम शक्ल में ही इस्तेमाल में होती हैं । इन सालिम बह्र पे मैं इसी मंच पे सोदाहरण चर्चा कर चुका हूं [ क़िस्त 1 से क़िस्त 7 तक] में  देखा जा सकता है

मुतक़ारिब बहर में ये फ़िल्मी गीत भी आप ने सुना होगा
बह्र-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम में यह गाना

"इशारों इशारों में दिल लेने वाले,  [122---122--122--122]
बता ये हुनर तूने सीखा कहाँ से" 
या
तुम्हें प्यार करते हैं करते रहेंगे
 कि दिल बन के दिल में धड़कते रहेंगे

या बह्र-ए-हजज़ मुसम्मन सालिम [1222] में यह गाना

ख़ुदा भी आस्मां से जब ज़मीं पे देखता होगा [1222--1222--1222--1222]
मेरे महबूब को किसने बनाया सोचता  होगा

 फ़िल्मी गीत का मिसाल देने का मक़सद फ़क़त इतना ही है कि आप बहर की आहंग [लय] मौसिकी [संगीत] तअस्सुर[प्रभाव] और दिलकशी से कितना मुत्तस्सिर [प्रभावित] होते हैं जब कोई ग़ज़ल बह्र में होती है । बह्र से ख़ारिज़ गज़ल की बात ही क्या करना

[आप ’तक़्तीअ’ कर के देख भी सकते हैं ,ऐसे बहुत से फ़िल्मी गीत या ग़ज़ल मिल जायेंगे जो किसी न किसी बहर में होंगे]

[6]- ऊपर 8 से लेकर 19 तक की बह्र को ’मुरक़्क़ब’ [यानी मिश्रित ] बहर कहते हैं । कारण कि ये बहर दो या तीन रुक्न से मिल कर बनती है ।ये रुक्न मुसद्दस या मुसम्मन की सूरत में अलग अलग ही गिने जाते हैं यानी बह्र-ए-तवील की अगर कोई मुसम्मन शकल होगी तो मिसरा ऊला में रुक्न की सूरत होगी [1 2 2 + 1 2 2 2 ,1 2 2 + 1 2 2 2 ] जब कि बह्र तवील का अफ़ाईल है [ 1 2 2 + 1 2 2 2 ]

[6[अ] बज़ाहिर [स्पष्टतया] बहर 8 से लेकर 14 तक ,मिसरा या तो मुरब्ब[शे’र में 4-रुक्न] या मुसम्मन [शे’र में 8-रुक्न] में ही बाँधा जा सकता है । मुसद्दस [ शे’र में 6-रुक्न] तो क़त्तई नहीं बांधा जा सकता।

[7]- बह्र **12-से लेकर **19 तक और बह्र-ए-वाफ़िर [**6] ,उर्दू शायरी में जब भी बाँधी गईं तो मुज़ाहिफ़ शकल में ही बांधी गईं। दीगर अल्फ़ाज़ में हम यह कह सकते हैं कि ये बहरें अपनी ’मुज़ाहिफ़" शकल में ही मुस्तमिल रहीं ।

[7]अ--11 ,16,17,18,और 19 बहर , ग़ज़ल में अपनी मुसद्दस शक्ल में इस्तेमाल होती हैं कारण साफ़ है कि ये बह्रें तीन रुक्न मिला कर तो बना है तो किसी शे’र में छह ही रुक्न तो आयेंगे न। मुसम्मन में तो कत्तई नहीं बाँधा जा सकता।

 [7] ब---इन बह्र्रों में हालाँकि  मुसम्मन शकल बाँधने में कोई मनाही नहीं है और अगर कभी कोई शायर मुसम्मन शकल में शेर कहना चाहे तो उसके लिए अलग से शर्त निर्धारित है जिसकी चर्चा मैं अगले किसी क़िस्त में करूँगा जब इन बहर की चर्चा करूंगा

[8]- इन 19 बह्रों के अलावा भी उर्दू शायरी में और बहुत से बह्रें इस्तेमाल में होती हैं । आखिर वो बह्रे कहाँ से आती हैं या कैसे बनती हैं? ये बहरें ’ज़िहाफ़’ से बनती है । जब किसी सालिम रुक्न पे ’ज़िहाफ़’ लगाते हैं तो रुक्न की शकल और नाम बदल जाते हैं । उर्दू शायरी मे 49-क़िस्म के ज़िहाफ़ हैं जिसमें से कुछ ज़िहाफ़ तो कुछ ख़ास बहर पे लगते है ,और कुछ शे’र के  ख़ास location[ पे लगते हैं .यानी इब्तिदा अरूज़/जर्ब] के लिए मख़्सूस [ ख़ास तौर से निर्धारित ] हैं इनके अपने क़वानीन [कानून] और क़वायद [क़ायदे] हैं । ऐसे तर्मीम शुदा बहरें लगभग 19-20 के आस पास बैठती हैं [ फ़ेहरिस्त {सूची} इसी मंच पर कभी लगा दूँगा}

[9]- घबराईए नहीं । अरूज़ सीखना और समझना कोई मुश्किल नहीं । सीखने के बाद ये सब आसान सा हो जाता है।
अगर हम ये 19-बहर और ज़िहाफ़ लगी बह्रें यानी मुज़ाहिफ़ बहरें और जोड़ लें तो ऐसे बहूर की तादाद सैकड़ों में [लगभग 200] के आसपास बैठती है

[10] - मगर आप घबराईए नहीं । कोई भी शायर इन 200 बहरों में अपनी शायरी नहीं करता और न उस से इसकी उम्मीद की जाती है । हर शायर के अपने ख़ास पसन्द दीदा बहर होते है। जिस पर उनका अधिकार होता है और वो उसी बहर में शायरी करते है जो उनको दिलकश लगता है ।अब बह्र-ए-कामिल को ही ले लीजिये । आहंगखेज़ और दिलकश बहर होने के बावज़ूद शायरों नें इस बहर में शायरी करने से  न जाने क्यों गुरेज़ किया ।इस बहर की मिसाल कम ही देखने को आती है ।इसी तरह ,अगर अज़ीम शो’अरा अगर कुछ ही बह्र में शायरी फ़र्मायेंगे तो मुस्तक़बिल [भविष्य ] में वो बहरें धीरे धीरे ख़त्म जायेंगी। ग़ालिब के दीवान में 19-अक़्साम [क़िस्में] [सालिम ,मुरक्क़ब और मुज़ाहिफ़ सब मिला कर ]  बह्र मिलते हैं-ऐसा कहा जाता है॥,जब कि मीर तक़ी मीर के छह दीवान में 28 क़िस्म के बहर का प्रयोग हुआ है

[11]- दरस्ल शायरी सिर्फ़ बहर ,रदीफ़ ,क़ाफ़िया ,वज़न फ़साहत का ही खेल नहीं बल्कि तग़ज़्ज़ुल शे’रियत ,बलाग़त-ओ-लताफ़त [काव्य सौष्ठव] तख़्ख़्य्युल .लसानी, तसव्वुरात का खेल है इसके बग़ैर शे’र बेमानी .फ़ीका .सपाट..बेजान  है भले ही वो शे’र या ग़ज़ल बहर में हो ,रदीफ़ में हो या क़ाफ़िया बन्दी सही ही क्यों न हो।सच्चा शे’र तो दो मिसरों में कायनात का तसव्वुफ़ समेटने की बात है

[12] -घबराईए नहीं ।  बिना अरूज़ जाने  आप भी ’एक दिन में चार ग़ज़ल ’-कह सकते हैं मगर अरूज़ समझने अरूज़ जानने  के बाद चार दिन में एक शे’र भी सरज़द [निस्सृत] नहीं होता । सच्चे शे’र की तो बात ही छॊड़ दीजिए। ये बात मैं अपनी ज़ाती तज़ुरबात के बिना[आधार] पर कह रहा हूँ । पहले जब अरूज़ नहीं पढ़ा था तो मैं भी एक दिन में ’तथाकथित’ ग़ज़ल लिख लेता था। मगर अब  नहीं होता .लगता है कि जो शे’र कह रहा हूँ उस शे’र में जान नहीं है ,सपाट है ,नाक़िस [बेकार] है । फिर भी कुछ न कुछ नाक़िस शे’र कहने की कोशिश करता ही रहता हूँ । ख़ैर आजकल तो हर कोई ग़ज़ल कह रहा है।

[13]- आप अगर ग़ज़ल कहने का इब्तिदाईया शौक़-ओ-ज़ौक़ फ़र्माते हैं तो दो चार मानूस[प्रिय] बहर चुन लें और उसी में ग़ज़ल कहने की कोशिश करें कि कम अज कम बहर और वज़न तो सही हो।

कभी मौक़ा मिला तो मुरक़्क़ब बहरों पर भी आइन्दा अक़्सात [क़िस्तों ] में चर्चा करूंगा। शायद उस से पहले ज़िहाफ़ पे चर्चा लाजिमी होगा बाईस कि[कारण कि] ज़िहाफ़ सालिम रुक्न पे ही लगती है और इन्ही सालिम बहूर से कई ’मुज़ाहिफ़’ बहरें बनती हैं

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नोट- असातिज़ा [ गुरुवरों ] से दस्तबस्ता  गुज़ारिश  है कि अगर कहीं कुछ ग़लतबयानी हो गई हो गई हो तो बराये मेहरबानी  निशान्दिही ज़रूर फ़र्माएं  ताकि मैं आइन्दा ख़ुद को दुरुस्त कर सकूँ --सादर ]

-आनन्द.पाठक-
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उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 7 [ बह्र-ए-कामिल ]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत -7
बह्र-ए-कामिल [1 1 2 1 2]

[Disclaimer clause : -वही -[भाग -1 का]
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[ अब तक ’बह्र-ए-मुतक़ारिब’, बह्र-ए-मुत्दारिक, बह्र-ए-हज़ज , बह्र-ए-रमल और बह्र-ए-रजज़ ,बह्र-ए-वाफ़िर [6-बह्र] पर बातचीत कर चुका हूं और बात स्पष्ट करने के लिए उन की कुछ मिसालें भी पेश कर चुका हूँ । अब बात आगे बढ़ाते हुए 7-वीं बह्र बह्र-ए-कामिल पर बातचीत करते हैं......]

पिछले मज़्मून (आलेख) में ’बह्र-ए-वाफ़िर’ पर चर्चा कर चुका हूं.आज ’बह्र-ए-कामिल’की चर्चा करूंगा। ये दोनो बह्रें अरबी है और अरबी शायरी में काफी मक़्बूल और मानूस हैं ,जो उर्दू में भी राईज़ (प्रचलित) हैं’ ’बह्र-ए-कामिल’ का बुनियादी रुक्न है--मुत फ़ा इलुन् ’ जिसका वज़न है [ 1 1 2 1 2 ] .यह रुक्न भी सालिम रुक्न की हैसियत रखता है और यह भी एक सुबाई (7-हर्फ़ी) रुक्न है । उर्दू में यह बड़ी ही आहंगख़ेज़ [लयपूर्ण] बहर है काफी लोकप्रिय भी है ।
 बक़ौल डा0 कुँअर बेचैन ....."’
’कामिल’ शब्द भी अरबी का है । इसके अर्थ हैं-पूरा,समूचा,दक्ष ,निपुण ,चमत्कारी, साधु,फ़कीर। इन सभी शब्दों में निपुण शब्द अच्छा लगा अत: इसी अर्थ के आधार पर इस का नाम ’निपुणिका छंद’ रख रहे हैं ...."
डा0 साहब का उर्दू के बह्रों को हिन्दी नाम देना और हिन्दी के दशाक्षरी "य मा ता रा ज भा न स ल गा" के सूत्र से इन बह्रों को समझना और समझाना  आप का मौलिक प्रयास है।

आप ने  इस बह्र की भी व्याख्या त्रिकल अक्षर(वतद ) और एकल अक्षर (1-हर्फ़ी) से की है जैसे    + 1 एकल (1-हर्फ़ी) +1 वतद(3-हर्फ़ी लफ़्ज़) + 1 वतद (3-हर्फ़ी)  =7 हर्फ़ी रुक्न से की है
 उदाहरण के लिए उन्होने एक शे’र नीचे दिया है (उनकी किताब : ग़ज़ल का व्याकरण से साभार)[नोट:- डा0 साहब ने यह स्पष्ट कर दिया है  कि यह शे’र सिर्फ़ समझाने की गरज़ से कहा गया है इस में आप शे’रियत न देखें]
  न तुझे मिले ,न मुझे मिले
किसी याद के नए क़ाफ़िले

यह बह्र-ए-कामिल मुरब्ब: सालिम का एक उदाहरण है -कारण कि रुक्न [1 2 1 1 2] शे’र में 4 बार [यानी मिसरा में 2-बार] आया है
अब इसकी तक़्तीअ कर के भी देख लेते हैं
1 1 2 1 2 / 1 1 2 1 2
न तुझे मिले ,न मुझे मिले
किसी याद के नए क़ाफ़िले

हालांकि डा0 साहब ने इस की तक़्तीअ यूँ की है
1 +12  + 12  / 1+ 12  + 12
न +तुझे+ मिले /,न +मुझे +मिले
कि+सी या+द के /न+ए क़ा+फ़िले

जो कि सही प्रतीत नहीं होता है
बात वहीं पे आ कर अटक गई। जो ’बह्र-ए-वाफ़िर’ के सिल्सिले पे अटकी थी। [देखिए पिछली क़िस्त-6]
क्योंकि उर्दू की क्लासिकल अरूज़ की किताब में इसे या तो ’वतद’[3-हर्फ़ी] लफ़्ज़  और ’फ़ासिला’[4-हर्फ़ी] लफ़्ज़ = 7 हर्फ़ी रुक्न से समझाया गया है या तो फिर 1-वतद[3] +1-सबब[2] +1 सबब[2] = 7 हर्फ़ी से।
इस लिए ’बेचैन’ जी की तज़्वीज़-ए-तक़्तीअ  उचित प्रतीत नहीं हो रही है कारण कि 1-हर्फ़ से कोई रुक्न नहीं बनता ।यहाँ तक कि अगर सालिम रुक्न पे ज़िहाफ़ भी लगाते है तो न्यूनतम (सबसे छोटा से छोटा जुज़ (टुकड़ा) भी 2 हर्फ़ी ही रहता है। 1-हर्फ़ी नहीं होता।

एक बात और
’बेचैन’ जी के तज़्वीज़ के तरकीब में मुत फ़ा इलुन् को’ ’मु तफ़ा इलुन ’के वज़न पे लिया है जिसमे ’सबब’[ न सबब-ए-ख़फ़ीफ़ और न ही सबब-ए-सक़ील ही दिखाई दे रहा है जो ज़ाइज़ प्रतीत नहीं हो रहा है ]

यह बह्र  ’वतद’[3-हर्फ़ी कलमा] और ’फ़ासिला [4 हर्फ़ी कलमा] से बना है मगर कुछ अरूज़ी इसे वतद और सबब से भी बना कर बताते हैं। चूँकि हम ने अभी तक ’फ़ासिला’ की इस्तिलाह (परिभाषा)  नहीं बयान की है तो अभी करेंगे भी नहीं । सिर्फ़ ’वतद’ और ’सबब’ के इश्तिराक (योग) से ही इस की भी व्याख्या करेंगे । आखिर ’फ़ासिला’ [4-हर्फ़ी कलमा] भी =  ’सबब[2] + सबब[2] से भी दिखाया जा सकता है

पिछले अक़्सात (किस्तों में ) में मैने कहा था कि सबब के 2- भेद होते है । चलिए एक बार फिर दुहरा देते हैं
 सबब-ए-ख़फ़ीफ़
 सबब-ए-सक़ील

 सबब-ए-ख़फ़ीफ़ = वो 2-हर्फ़ी कलमा जिसमे पहले हर्फ़ पर ’हरकत’ हो और दूसरा हर्फ़ ’साकिन’ हो
 हिन्दी में ’साकिन’ का कन्स्पेट तो नही हैं फ़िलवक़्त ’साकिन’ हर्फ़ समझने के  लिए आप संस्कृत का ’हलन्त’ का तसव्वुर करे
 जैसे ’तुन्’ ’लुन्’ मुस्’ तफ़्’...यह् सब ’सबब-ए-ख़फ़ीफ़’ है जिसका वज़न [2] होता है जिसमें पहले हर्फ़ तु’..’ल’...’मु’ ...त’पर हरकत है जब कि ’न्’ ’स्’ फ़्’ हर्फ़ साकिन है

सबब-ए-सक़ील  = वो 2-हर्फ़ी कलमा जिसमे दोनो हर्फ़ पर हरकत हो इसका भी वज़न 2 होता है मगर इसे दिखाते है [1 1] की शकल में , अगर आप दोनो हर्फ़ पर बराबर वज़न से बोल रहे होते है तब
उर्दू में तो दोनों सबब साफ़ ज़ाहिर हो जाते है हिन्दी में इन दोनो सबब का अन्तर बहुत बारीक़ है कारण कि
उदाहरण के लिए हम हिन्दी के 2 शब्द  ’बात’ और ’रात’  तथा ’अकस्मात्’ या ’तत्पश्चात्’ लेते हैं । बात और रात के ’त’ पे हरकत (ज़बर की हरकत ) है मगर ’त्’ साकिन है मगर आज कल हिन्दी में अकस्मात् और तत्पश्चात् भी ’अकस्मात और तत्पश्चात’ ही लिखा जा रहा है । और यही बात श्रीमन् के साथ भी है

यह रुक्न भी बनती है ’सबब’ और ’वतद ’ के इश्तिराक (साझे) से

चलिए अब, मुत फ़ा इलुन् ’ रुक्न कैसे बनती है, देखते हैं
  मुत फ़ा इलुन् =  सबब-ए-सक़ील + सबब-ए-ख़फ़ीफ़ + वतद
      [1 1 2 1 2  ] =  [ 1 1 ]   + [  2 ]  + [ 1 2]
                = 1 1 2 1 2
एक बात पर आप ग़ौर फ़र्माये.....
 अगर आप ने ’बह्र-ए-वाफ़िर’ [ 1 2 1 1 2 ] पर ग़ौर फ़र्मायेंगे तो देखेंगे कि वहां ’वतद’ [1 2]आगे था जब कि कामिल में पीछे आकर बह्र का आहंग बना रहा है । आप को नहीं लगता है कि ’बह्र-ए-कामिल’ ,’बह्र-ए-वाफ़िर ’का बरअक़्स [mirror image] है?

ख़ैर..
अब इस बह्र की भी वही परिभाषा है जो अन्य बहूर की है

जैसे (सभी मिसाल ’आहंग और अरूज़’-कमाल अहमद सिद्दीक़ी साहब कि किताब से आभार सहित }
बह्र-ए-कामिल मुरब्ब: सालिम : अगर किसी शे’र मे सालिम रुक्न ’मु त फ़ा इलुन् ’[ 1 1 2 1 2]  4-बार [यानी मिसरा में 2 बार] आये तो उस शे’र की बह्र होगी ’बह्र-ए-कामिल मुरब्ब: सालिम’ । सालिम इस लिए कि रुक्न ’मु त फ़ा इलुन् ’ बिना किसी रद्द-ओ-बदल,बिना किसी तब्दील के पूरा का पूरा सालिम(मुसल्लम ) शकल में तकरार पा रही है
एक मिसाल लेते है

न है कोई मेरा शरीके-ग़म
न किसी से मुझ को उमीद है

अब इसकी तक़्तीअ भी कर लेते हैं
1 1  2 1 2 / 1 1 2 1 2
न है कोई मे/ रा शरीक-ग़म
न किसी से मुझ/ को उमीद है

बात वही कि ’है’ ’ई’ ’से’ को -देखने में तो 2-वज़न का लगता है मगर तलफ़्फ़ुज़ अदायगी 1-वज़न पर होगी
बह्र-ए-कामिल मुसद्दस सालिम : अगर किसी शे’र में यह सालिम रुक्न’ ’मु त फ़ा इलुन् ’[ 1 1 2 1 2] 6-बार [यानी मिसरा में 3 बार] की तकरार [repetition]  हो तो उस शे’र की बह्र होगी ’ बह्र-ए-कामिल मुसद्दस सालिम’
एक मिसाल लेते हैं

न वो नख्ल ,फूल न फल ,चमन ही कहां रहा
तो चमन से बादे-बहार आई तो  क्या ख़ुशी

बात साफ़ करने के लिए इस की भी तक़्तीअ कर लेते हैं

1  1    2  1    2     / 1 1    2    1  2        / 1 1  2 1 2
न वो नख्ल ,फू /ल न फल,च मन /ही कहां रहा
तो चमन से बा/दे-बहार आ/ई तो  क्या ख़ुशी

बह्र-ए-कामिल मुसम्मन सालिम : अगर किसी शे’र में यह सालिम रुक्न [मुत फ़ा इलुन् ][ 1 1 2 1 2 ] 8-बार [यानी मिसरा में 4-बार] आये तो उस शे’र की बह्र होगी ’बह्र-ए-कामिल मुसम्मन सालिम’।
एक मिसाल लेते है
अल्लामा इक़बाल की एक बहुत ही उम्दा और आला मर्तबा की एक ग़ज़ल है..[यहां चन्द अश’आर ही लिख रहा हूं] इस गज़ल की आहंग /लय/गति देखे और दिल में इसकी ख़लिश महसूस करें इसकी मयार (स्तर) देखें

कभी ऎ हक़ीकते-मुन्तज़िर ,नज़र आ लिबासे-मजाज़ में
कि हज़ारों सिज़दे तड़प रहे हैं ,मेरी इक जबीने-नियाज़ में

तू बचा बचा के न रख इसे ,तेरा आईना है वो आईना
कि शिकस्ता हो तो अज़ीजतर ,है निगाहे-आईनासाज़ में

जो मैं सर-ब-सिज़दा हुआ कभी ,तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम-आश्ना ,तुझे क्या मिलेगा नमाज़ में
सारे अश’आर बहर-ए-कामिल मुसम्मन सालिम मे है ,मैं ’मत्ला’ की तक़्तीअ कर रहा हूँ ,बाक़ी की आप करें तो बेहतर होगा
1 1  2 1 2 /1 1  2  1  2  / 1 1  2 1 2   /1 1 2 1 2
कभ ऎ हक़ी/ कत-मुन् त ज़िर/ ,नज़र आ लिबा /से-मजाज़ में
कि हज़ारो सिज़/दे तड़प रहे/ हैं ,मेरी इक जबी/ने-नियाज़ में

वैसे तो इस बह्र की और सालिम शक्ल 16 रुक्नी [मिसरा में 8-बार] हो सकती है मगर शायर अमूमन मुरब्ब:---मुसद्दस...मुसम्मन की शक्ल में ज़्यादातर अपनी शायरी करते है । बात तो शे’र की शे’रियत और ग़ज़ल की तग़ज़्ज़ुल-ओ-तख़य्युल  [बलागत-ओ-लताफ़त] में है।

इस बह्र के मुज़ाहिफ़ शक्ल की बात बाद में करेंगे जब रुक्न पे ’ज़िहाफ़’ की बातचीत करेंगे
अहबाब-ए-महफ़िल (मंच के दोस्तों से) गुज़ारिश है कि इस बह्र की 16 रुक्नी सालिम शकल अगर आप की नज़र से कोई ग़ज़ल गुज़रती है तो बराए मेहरबानी इस मंच पर लगायें ताकि दीगर कारीं इस से मुस्तफ़ीद हो सकें
आप सभी कारीं (पाठकों) से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अपनी रहनुमाई से हमें आगाह करें
--------------
-नोट- असातिज़ा [ गुरुवरों ] से दस्तबस्ता  गुज़ारिश  है कि अगर कहीं कुछ ग़लतबयानी हो गई हो गई हो तो बराये मेहरबानी  निशान्दिही ज़रूर फ़र्माएं  ताकि मैं आइन्दा ख़ुद को दुरुस्त कर सकूँ --सादर ]

-आनन्द.पाठक-
Mb                 8800927181ं
akpathak3107 @ gmail.com

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 6 [ बह्र-ए-वाफ़िर ]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत -6

बह्र-ए वाफ़िर [1 2 1 1 2 ]



[Disclaimer clause : -वही -[भाग -1 का]
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[ अब तक ’बह्र-ए-मुतक़ारिब’, बह्र-ए-मुत्दारिक, बह्र-ए-हज़ज , बह्र-ए-रमल और बह्र-ए-रजज़ पर बातचीत कर चुका हूं और बात स्पष्ट करने के लिए उन की कुछ मिसालें भी पेश कर चुका हूँ । अब बात आगे बढ़ाते हुए ......]



उर्दू शायरी में एक प्रचलित बह्र है -जिसका नाम है " बह्र-ए-वाफ़िर" जिसका मूल रुक्न है ..’मुफ़ा इल तुन्" [ 1 2 1 1 2 ].यह रुक्न भी सालिम रुक्न की हैसियत रखता है यह भी एक सुबाई (7-हर्फ़ी) रुक्न है । दर हक़ीक़त यह बह्र अरबी में काफी प्रचलित है मगर उर्दू में इतनी लोकप्रिय बह्र नहीं बन सकी जितनी कि अन्य बह्रें बनी। ’वाफ़िर’ का लग़वी (शब्द कोशीय अर्थ) मानी है प्रचुरता ,अधिकता और इसी आधार पर डा0 कुँअर बेचैन जी ने इस बह्र का नाम ’प्रचुरिका छन्द’ रखा है

डा0 साहब का उर्दू के बह्रों को हिन्दी नाम देना और हिन्दी के दशाक्षरी "य मा ता रा ज भा न स ल गा" के सूत्र से इन बह्रों को समझाना आप का मौलिक प्रयास है।

आप ने इस बह्र की व्याख्या त्रिकल अक्षर(वतद ) और एकल अक्षर (1-हर्फ़ी) से की है जैसे 1-वतद(3-हर्फ़ी लफ़्ज़) + 1 एकल (1-हर्फ़ी) +1 वतद(3-हर्फ़ी लफ़्ज़) =7 हर्फ़ी रुक्न से की है

उदाहरण के लिए उन्होने एक शे’र नीचे दिया है (उनकी किताब : ग़ज़ल का व्याकरण से साभार)[नोट:- डा0 साहब ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह शे’र सिर्फ़ समझाने की गरज़ से कहा गया है इस में आप शे’रियत न देखें]

दुआ न मिले ,दवा न मिले

रहो न ,जहां हवा न मिले

यह बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्ब: सालिम का एक उदाहरण है -कारण कि रुक्न [1 2 1 1 2] शे’र में 4 बार [यानी मिसरा में 2-बार] आया है

अब इसकी तक़्तीअ कर के भी देख लेते हैं

1 2 1 1 2 / 1 2 1 1 2

दुआ न मिले /,दवा न मिले

रहो न ,जहां / हवा न मिले

हालांकि डा0 साहब ने इस की तक़्तीअ यूँ की है



दुआ+न+मिले , दवा+न+मिले

1 2 +1 +1 2 / 1 2+1 2

त्रिकल+एकल+त्रिकल / त्रिकल+एकल+त्रिकल

3-हर्फ़ी+ 1 हर्फ़ + 3-हर्फ़ी /3-हर्फ़ी+ 1 हर्फ़ + 3-हर्फ़ी

जो कि सही प्रतीत नहीं होता है

क्योंकि उर्दू की क्लासिकल अरूज़ की किताब में इसे या तो ’वतद’[3-हर्फ़ी] लफ़्ज़ और ’फ़ासिला’[4-हर्फ़ी] लफ़्ज़ = 7 हर्फ़ी रुक्न से समझाया गया है या तो फिर 1-वतद[3] +1-सबब[2] +1 सबब[2] = 7 हर्फ़ी से।

इस लिए ’बेचैन’ जी की तज़्वीज़ उचित प्रतीत नहीं हो रही है कारण कि 1-हर्फ़ से कोई रुक्न नहीं बनता ।यहाँ तक कि अगर सालिम रुक्न पे ज़िहाफ़ भी लगाते है तो न्यूनतम (सबसे छोटा से छोटा जुज़ (टुकड़ा) भी 2 हर्फ़ी ही रहता है। 1-हर्फ़ी नहीं होता।

एक बात और

’बेचैन’ जी के तज़्वीज़ में ’इ ल’ को ’इ’ मय हरकत अलग कर [1-हर्फ़] ’लाम’ को ’तुन्’ के साथ जोड़ कर ’लतुन्’[3-हर्फ़ी वतद्] बना दिया है। रुक्न् के वज़न में तो कोई फ़र्क नहीं पड़ा मगर तर्कीब में फ़र्क पड़ गया। कारण कि ’इल’ सबब है और ’तुन’ भी सबब है ्जब कि खाली ’इ’(ऎन) से कोई न रुक्न है और न ही कोई रुक्न का जुज़ है।

उर्दू के शो’अरा (शायरों ने] इस बह्र में ज़्यादा ग़ज़ल या शे’र नहीं कहे है शायद एक कारण यह भी हो कि बीच में 3 लगातार हरकत हर्फ़ [अलिफ़ एन और लाम ] आने से रवानी में ख़लल पड़ता है हालांकि उर्दू में तस्कीन-ए-औसत के लिहाज से बीच वाले हर्फ़ ’एन’ को साकिन कर के ही पढ़ते हैं

यह बह्र ’वतद’[3-हर्फ़ी कलमा] और ’फ़ासिला [4 हर्फ़ी कलमा] से बना है मगर कुछ अरूज़ी इसे वतद और सबब से भी बना कर बताते हैं। चूँकि हम ने अभी तक ’फ़ासिला’ की इस्तिलाह (परिभाषा) नहीं बयान की है तो अभी करेंगे भी नहीं । सिर्फ़ ’वतद’ और ’सबब’ के इश्तिराक (योग) से ही इस की भी व्याख्या करेंगे । आखिर ’फ़ासिला’ [4-हर्फ़ी कलमा] भी = ’सबब[2] + सबब[2] से भी दिखाया जा सकता है



पिछले अक़्सात (किस्तों में ) में मैने कहा था कि सबब के 2- भेद होते है । चलिए एक बार फिर दुहरा देते हैं

सबब-ए-ख़फ़ीफ़

सबब-ए-सक़ील

सबब-ए-ख़फ़ीफ़ = वो 2-हर्फ़ी कलमा जिसमे पहले हर्फ़ पर ’हरकत’ हो और दूसरा हर्फ़ ’साकिन’ हो

हिन्दी में ’साकिन’ का कन्स्पेट तो नही हैं फ़िलवक़्त ’साकिन’ हर्फ़ समझने के लिए आप संस्कृत का ’हलन्त’ का तसव्वुर करे

जैसे ’तुन्’ ’लुन्’ मुस्’ तफ़्’...यह् सब ’सबब-ए-ख़फ़ीफ़’ है जिसका वज़न [2] होता है जिसमें पहले हर्फ़ तु’..’ल’...’मु’ ...त’पर हरकत है जब कि ’न्’ ’स्’ फ़्’ हर्फ़ साकिन है



सबब-ए-सक़ील = वो 2-हर्फ़ी कलमा जिसमे दोनो हर्फ़ पर हरकत हो इसका भी वज़न 2 होता है मगर इसे दिखाते है [1 1] की शकल में , अगर आप दोनो हर्फ़ पर बराबर वज़न से बोल रहे होते है तब



चलिए अब मुफ़ा इल तुन’ रुक्न कैसे बनती है, देखते हैं

मुफ़ा इल तुन = वतद + सबब-ए-सक़ील + सबब-ए-ख़फ़ीफ़

[1 2 1 1 2 ] = [1 2 ] + [ 1 1 ] + [ 2 ]

= 1 2 1 1 2

एक बात पर आप ग़ौर फ़र्माये.....

अगर ’सबब-ए-सक़ील2-हर्फ़ी कलमा[हरकत+हरकत] वज़न [1 1 ] की जगह ’सबब-ए-खफ़ीफ़’-2-हर्फ़ी कलमा[हरकत + साकिन] वज़न [2] होता तो क्या होता ??

तो रुक्न का वज़न [1 2 2 2] हो जाता जो बह्र-ए-हज़ज के मूल रुक्न का वज़न है जो उर्दू शायरी में काफी लोकप्रिय व मधुर आहंग्खेज़ बह्र है जिसमें काफी प्रवाह [रवानी] है।

अब आप यह कहेंगे कि इस बात का यहां क्या तुक है ? क्या ज़रूरत है?

ज़रूरत है। ज़रूरत है यह बताने के लिए कि’ ’बह्र-ए-वाफ़िर’ जो अरबी में तो एक मानूस बह्र है वो उर्दू में लोकप्रिय बहर क्यों न बन सकी ? क्यों उर्दू के शायरों नें इस बहर में काफी शे’र या ग़ज़ल नहीं कहे? हमें लगता है कि [1 2 1 1 2 ] के सामने [ 1 2 2 2 ] -बह्र-ए-हज़ज थी जो ज़्यादा लोकप्रिय आहंगखेज़ मधुर लयात्मक थी इस में शे’र कहना ज़्यादा सरल और दिलकश था ।शायद यह भी एक सबब हो।

खैर

बह्र-ए-वाफ़िर की भी परिभाषा भी वही है जो अन्य बह्रों के हैं

यानी

बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्ब: सालिम : यानी यह रुक्न ’मुफ़ा इल तुन’ [12112] किसी शे’र में 4-बार [यानी मिसरा में 2 बार ] आये तो वो बह्र ’बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्ब: सालिम’ कहलायेगी

एक मिसाल लेते हैं [आहंग और अरूज़ से साभार]



कभी तो मिलायें आप नज़र

कभी सर-ए-रहगुज़र ही मिले

अब इसकी तक़्तीअ भी कर के देख लेते हैं

1 2 1 1 2 /1 2 1 1 2

कभी तो मिला/यें आप नज़र

कभी सर-ए-रह/गुज़र ही मिले

[यहां भी वही बात ’तो’.. ये’ ..ही ..हर्फ़-ए-इल्लत के ज़ेर-ए-असर 1-की वज़न पे ही अदा होंगे]

चूँकि [1 2 1 1 2] रुक्न शे’र मे 4-बार [यानी मिसरा में 2-बार ]आया है अत: इसे बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्ब: सालिम कहेंगे

बह्र-ए-्वाफ़िर मुसद्दस सालिम :यानी यह रुक्न ’मुफ़ा इल तुन’ अगर किसी शे’र में 6 बार [यानी मिसरा में 3 बार] आये तो वह बह्र-ए-वाफ़िर मुसद्दस सालिम कहलाएगी

एक मिसाल लेते हैं [आहंग और अरूज़ से साभार]

बहुत पी चुका हूं ज़हर-ए-हयात पीर-ए-मुगां

ये मैकदा है शराब पिला ,शराब मुझे

अब इसकी तक़्तीअ भी कर लेते हैं

1 2 1 1 2 / 1 2 1 1 2/1 2 1 1 2

बहुत पी चुका/ हूं ज़हर-ए-हया/त पीर-ए-मुगां

ये मैकदा है /शराब पिला /,शराब मुझे

एक बात पे ध्यान दें इज़ाफ़त हूं’ज़हर-ए-हया’ [1 2 1 1 2] या पीर-ए-मुगां यानी इज़ाफ़त -ए- वज़न में कोई रोल नहीं कर रहा है यानी बह्र की यही मांग है

बह्र-ए-वाफ़िर मुसम्मन सालिम: यानी यह रुक्न ’मुफ़ा इल तुन’ अगर किसी शे’र में 8 बार [यानी मिसरा में 4 बार] आये तो बो बह्र ’बह्र-ए-मुसम्मन सालिम’ कहलायेगी

एक मिसाल लेते हैं [आहंग और अरूज़ से साभार]



अगर ये कहा है तुम ने मेरे रकीब से क़त्ल कर दे मुझे

क़सम है मुझे अगर न उसे पेश कर दूंगा तुहफ़ा में सर

अब इसकी तक़्तीअ भी देख लेते हैं

1 2 1 1 2 / 1 2 1 1 2 / 1 2 1 1 2/ 1 2 1 1 2

अगर ये कहा /है तुम ने मेरे/ रकीब से क़त्/ल कर दे मुझे

क़सम है मुझे /अगर न उसे /मैं पेश कर दूं/गा तुहफ़ा में सर

यहाँ भी वही बात ....ये....है....ने...मे....दे...सब बह्र की मांग की मुताबिक़ 1-की वज़न पे पढ़े जायेंगे

वैसे इस बह्र में 16-रुक्नी बह्र नहीं देखी है..मुश्किल तो है मगर ना-मुमकिन नहीं

इस बह्र के मुज़ाहिफ़ शक्ल की बात बाद में करेंगे जब रुक्न पे ’ज़िहाफ़’ की बातचीत करेंगे

अहबाब-ए-महफ़िल (मंच के दोस्तों से) गुज़ारिश है कि इस बह्र की 16 रुक्नी सालिम शकल अगर आप की नज़र से कोई ग़ज़ल गुज़रती है तो बराए मेहरबानी इस मंच पर लगायें ताकि दीगर कारीं इस से मुस्तफ़ीद हो सकें
---------------------------
नोट- असातिज़ा [ गुरुवरों ] से दस्तबस्ता  गुज़ारिश  है कि अगर कहीं कुछ ग़लतबयानी हो गई हो गई हो तो बराये मेहरबानी  निशान्दिही ज़रूर फ़र्माएं  ताकि मैं आइन्दा ख़ुद को दुरुस्त कर सकूँ --सादर ]

-आनन्द.पाठक-
Mb                 8800927181ं
akpathak3107 @ gmail.com

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 5 [बह्र-ए-रजज़ ]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत -5

बह्र-ए-रजज़ [ 2 2 1 2 ]



[Disclaimer clause : -वही -[भाग -1 का]
-----------------------



[ अब तक ’बह्र-ए-मुतक़ारिब’, बह्र-ए-मुत्दारिक, बह्र-ए-हज़ज और बह्र-ए-रमल पर बातचीत कर चुका हूं और बात स्पष्ट करने के लिए उन की कुछ मिसालें भी पेश कर चुका हूँ । जो पाठकगण इन से वंचित रह गये हैं वो मेरे ब्लाग www.urdu-se-hindi.blogspot.com पर भी इन्हें पढ़ सकते हैं ।संक्षेप में एक बार दुहरा रहा हूँ कि बात ज़ेहननशीन हो जाय ।



बह्र मूल रुक्न वज़न तरकीब

मुत्क़ारिब फ़ऊ लुन 1 2 2 वतद + सबब =1 2 + 2 = 1 2 2 =5-हर्फ़ी

मुत्दारिक फ़ा इलुन 2 1 2 सबब + वतद = 2 + 12 = 2 1 2 = 5-हर्फ़ी



हज़ज मफ़ा ई लुन 1 2 2 2 वतद+सबब+सबब = 1 2+ 2+ 2 = 1 2 2 2 =7-हर्फ़ी

रमल फ़ा इला तुन 2 1 2 2 सबब+वतद +सबब = 2 +1 2+ 2 = 2 1 2 2 = 7-हर्फ़ी

रजज़ मुस तफ़ इलुन 2 2 1 2 सबब+ सबब+ वतद = 2+2+ 1 2 = 2 2 1 2 = 7-हर्फ़ी



आप ग़ौर फ़र्मायेंगे कि मूल रुक्न सबब और वतद के combination से बनते जा रहें हैं बस मुख़्तलिफ़ बहर में सबब (2-हर्फ़ी) वज़न के लिए कहीं ’लुन’ तो कहीं ’तुन’ तो कहीं ’मुस’ तो कहीं ’तफ़’ का इस्तेमाल हो रहा हैं ।मालूम नहीं क्यों?



उसी प्रकार वतद के लिए कहीं ’फ़ऊ’ तो कहीं तो कहीं ’मफ़ा’ ’इलुन’ तो कहीं इला’ का इस्तेमाल हो रहा है। मालूम नहीं क्यों?



शायद अरूज़ियों ने आहंग के लिए ऐसा ही तसव्वुर किया हो। खैर....



एक बात और..

हज़ज , रमल और रजज़ में ’वतद’ की location देखते चलिए और मात्रा 1-का वज़न कैसे अपनी जगह बदल रहा है इस बिना पर आप कह सकते हैं कि ’2 2 2 1 ’ भी कोई बह्र होगी । जी हां। आप बिल्कुल सही हैं इस वज़न की भी एक मूल रुक्न है और बह्र भी है .नाम बाद में बताऊंगा।...



अब मूल बात पर आते हैं -बह्र-ए-रजज़]



------ जी हाँ , उर्दू शायरी में एक बह्र है जिसका नाम है बह्र-ए-रजज़। जिसका बुनियादी रुक्न है -’मुस तफ़ इलुन’ [ 2 2 1 2 ]

इस का निर्माण कैसे होता है ऊपर बता चुका हूं। यह भी एक सबाई [7- हर्फ़ी] रुक्न है

डा0 कुँअर बेचैन जी ने इस बहर का हिन्दी नाम ..."वंश-गौरव’ छन्द दिया है । उन्हीं के शब्दों में -" ...’रजज़’ शब्द अरबी का है। इस शब्द का अर्थ है युद्ध क्षेत्र में अपने कुल की शूरता और श्रेष्ठता का वर्णन। इसी अर्थ के आधार पर हमने इस का नाम ’वंश-गौरव’ छन्द रखा है ।"

हमारे यहां शायद ’आल्हा’ में भी ऐसा ही कुछ वर्णन होता है

यह बह्र भी सालिम बह्र की हैसियत रखता है।

बह्र-ए-रजज़ की परिभाषा भी वही है जो अन्य सालिम बहूर [ब0ब0 बह्र] की है यानी

[1] बह्र--ए-रजज़ मुरब्ब: सालिम

यह रुक्न ’मुस तफ़ इलुन ’[ 2 2 1 2] अगर किसी शे’र में 4-बार (यानी मिसरा में 2-बार] आए तो शे’र की बह्र ’बह्र-ए-मुरब्ब: सालिम कहलायेगी

2 2 1 2 / 2 2 1 2 यानी मुस तफ़ इलुन /मुस तफ़ इलुन

2 2 1 2/ 2 2 1 2 मुस तफ़ इलुन /मुस तफ़ इलुन

[2] बह्र-ए-रजज़ मुसद्दस सालिम

अगर किसी शे’र में यह रुक्न [2 2 1 2 ] 6-बार [यानी मिसरा में 3-बार] आये तो बह्र ’ बह्र-ए-रजज़ मुसद्दस सालिम’ कहलायेगी



2 2 1 2/ 2 2 1 2 / 2 2 1 2 यानी मुस तफ़ इलुन/मुस तफ़ इलुन/मुस तफ़ इलुन

2 2 2 2 / 2 2 1 2 / 2 2 1 2 मुस तफ़ इलुन/मुस तफ़ इलुन/मुस तफ़ इलुन



[3] बह्र-ए-रजज़ मुसम्मन सालिम



अगर किसी शे’र में यह रुक्न [ 2 2 1 2 ] 8-बार [यानी मिसरा में 4-बार] आए तो यह बह्र-ए-मुसम्मन सालिम’ कहलायेगी



2 2 1 2 /2 2 1 2 /2 2 1 2 /2 2 1 2 यानी मुस तफ़ इलुन/मुस तफ़ इलुन/मुस तफ़ इलुन/मुस तफ़ इलुन

2 2 1 2 / 2 2 1 2/ 2 2 1 2/ 2 2 1 2 मुस तफ़ इलुन/ मुस तफ़ इलुन /मुस तफ़ इलुन/मुस तफ़ इलुन



यही बात 16-रुक्नी बह्र में होगी यानी किसी शे’र में यह रुक्न 16 बार [यानी मिसरा में 8-बार ] आये तो उसका नाम बह्र-ए-रज़ज मुइज़ाफ़ी मुसम्मन सालिम कहलायेगी [ इज़ाफ़ी मानी 2- गुना और मुसम्मन मानी 8]



यूं तो यह रुक्न यदि कोई शायर किसी शे’र में 12 बार या 14 बार प्रयोग करना चाहे तो मनाही तो नहीं है मगर अमूमन शायर यही मुसद्दस और मुसम्मन शक्ल ही प्रयोग करते हैं। बात सिर्फ़ रुक्न और बह्र की ही नहीं होती बल्कि शे’र की शे’रियत और गज़लियत की भी होती है शे’र किसी बह्र में हो बस और दिलकश हो दिल पज़ीर हो।



गो, बह्र के मुसम्मन सालिम या मुसद्दस सालिम के ज़्यादा शे’र नहीं मिला ज़्यादातर शायरों नें इसकी मुज़ाहिफ़ शक्ल में ही शे’र कहें हैं। वात स्पष्ट कर ने कि लिए इस बह्र ् के सालिम शक्ल के कुछ शे,र लेते हैं और फिर तक़्तीअ कर के देखते हैं



मैं कह रहा हूँ यह कि अब ,तू क्या करे, मैं क्या करूं

तू भी मुझे देखा करे ,मैं भी तुझे देखा करूँ

-डा0 कुँअर बेचैन [ग़ज़ल के व्याकरण से साभार]



[डा0 साहब ने यह बात पहले ही साफ़ कर दी है कि यह ख़ुदसाख़्ता शे’र सिर्फ़ बह्र को समझाने के किए कहा है ,इसमें ’शे’रिअत न देखी जाए]



अब इसकी तक़्तीअ भी देख लेते हैं

2 2 1 2 / 2 2 1 2 / 2 2 1 2 / 2 2 1 2

मैं कह रहा /हूँ यह कि अब /,तू क्या करे, /मैं क्या करूं

2 2 1 2 / 2 2 1 2/ 2 2 1 2 / 2 2 1 2

तू भी मुझे /देखा करे /,मैं भी तुझे /देखा करूँ



चूंकि 2 2 1 2 [मुस् तफ़् इलुन्] शे’र में 8 बार (यानी मिसरा में 4-बार] आया है अत: यह ’बह्र-ए-रजज़ मुसम्मन सालिम" की मिसाल हुई



एक मिसाल और लेते हैं



हम को भी क्या क्या नाज़ था टूटे हुए दिल पे मगर

उसने तो जिस पत्थर को ठुकराया वो इक दिल हो गया

[जनाब कमाल अहमद सिद्दिक़ी की किताब ’ आहंग और अरूज़ ’ से साभार]

अब इसके तक़्तीअ भी कर लेते हैं

2 2 1 2 / 2 2 1 2 / 2 2 1 2/ 2 2 1 2

हम को भी क्या/ क्या नाज़ था /टूटे हुए/ दिल पे मगर

2 2 1 2 / 2 2 1 2 / 2 2 1 2 / 2 2 1 2

उसने तो जिस/ पत्थर को ठुक/राया वो इक /दिल हो गया



[यहां पर भी वही बात ’ भी’ ’तो’ ’को’ ’वो’ कि देखने में तो सबब [2-हर्फ़ी] लफ़्ज़ लगता है मगर ’हर्फ़-ए-इल्लत’ के ज़ेर-ए-असर इसको गिरा कर [यानी दबा कर ] बह्र की माँग के मुताबिक 1-की वज़न पर पढ़ेगे]

इस बह्र के मुज़ाहिफ़ शक्ल की बात बाद में करेंगे जब रुक्न पे ’ज़िहाफ़’ की बातचीत करेंगे

अहबाब-ए-महफ़िल (मंच के दोस्तों से) गुज़ारिश है कि इस बह्र की सालिम शकल [ मुरब्ब: ,मुसद्दस, मुसम्मन } में अगर आप की नज़र से कोई ग़ज़ल गुज़रती है तो बराए मेहरबानी इस मंच पर लगायें ताकि दीगर कारीं इस से मुस्तफ़ीद हो सकें


-----------नोट- असातिज़ा [ गुरुवरों ] से दस्तबस्ता  गुज़ारिश  है कि अगर कहीं कुछ ग़लतबयानी हो गई हो गई हो तो बराये मेहरबानी  निशान्दिही ज़रूर फ़र्माएं  ताकि मैं आइन्दा ख़ुद को दुरुस्त कर सकूँ --सादर ]

-आनन्द.पाठक-
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उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 4 [ बह्र-ए-रमल ]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत (क़िस्त -4)

बह्र-ए-रमल [2 1 2 2 ]

[Disclaimer clause ;वही जो क़िस्त -1 में है]
-----------------------



[पिछली बातचीत में बह्र-ए-हज़ज [1 2 2 2 ] का ज़िक्र कर चुका हूं ।डा0 कुँअर बेचैन ने जिसका हिन्दी नाम "कोकिल छन्द रखा है]



अब आगे बढ़ते हैं .....]



उर्दू में एक और मान्य प्रचलित बह्र है -बह्र-ए-रमल - जिसका बुनियादी रुक्न है ’फ़ा इ ला तुन् ’जिसका वज़न है [2 1 2 2 ] और यह भी एक सालिम रुक्न है।यह भी बह्र-ए-ह्ज़ज की मूल रुक्न ’मफ़ा ई लुन ’ की तरह एक सबाई (7-हर्फ़ी) रुक्न है

डा0 कुँअर बेचैन ने इस बह्र का नाम ’बिन्दु अंकन छन्द’ रखा है। उन्हीं के शब्दों में -"’रमल शब्द अरबी भाषा का है।इस शब्द का अर्थ उस विद्या से है जिससे भविष्य में होने वाली घटनायें बता दी जाती हैं ।इस विद्या का मूल आधार नुक़्ते (ब0ब0 निक़ात) [बिंदियां] हैं ,इसी अर्थ के आधार पर हम इसे ’बिन्दु अंकन छन्द’ नाम दे रहे हैं।इस बह्र के विषय प्रेरणात्मक भी हो सकते हैं और उपदेशात्मक भी।"



ख़ैर ,नाम में क्या रखा है । वैसे मेरे ख़याल से ’रमल’ नाम भी कोई बुरा नहीं है

वैसे तो यह बह्र सालिम रुक्न की हैसियत रखता है मगर न जाने क्यों उर्दू में इस बह्र की सालिम शकल (मुसद्दस सालिम या मुसम्मन सालिम) में बहुत कम अश’आर कहे गयें है .प्राय: इस बह्र की मुज़ाहिफ़ शक्ल (ख़ास तौर पर मह्ज़ूफ़ ज़िहाफ़ की शकल) में ज़्यादा अश’आर कहे गये जो ज़्यादा आहंगख़ेज़ (लयपूर्ण) हैं ।ख़ैर.....



यह रुक्न भी ’सबब’(2 हर्फ़ी कलमा) और ’वतद (3 हर्फ़ी कलमा) के योग [combination ] से बना है वैसे ही जैसे बह्र-ए-हज़ज का रुक्न [मफ़ा ई लुन] बना था । देखिए कैसे



फ़ा इला तुन् =सबब +वतद + सबब

= 2 + ( 1 2) + 2

=2 1 2 2

बात वही .

उर्दू में सबब के 2 भेद और वतद के 3 भेद होते है

उर्दू शायरी में इस का ख़ास महत्व है कारण कि उनके यहां हर्फ़ हरक़त और साकिन से वज़न derive करते है जब कि हिन्दी में साकिन का Concept नहीं है [संस्कृत की बात और है]

इसी लिए मैने पहले ही कह दिया है कि यह मज़्मून हिन्दी दोस्तों के नुक़्त-ए-नज़र से लिख रहा हूँ जिन्हे उर्दू ग़ज़ल कहने और पढ़ने समझने का शौक़ है और वो कुछ कहना चाह्ते है यह मज़ामीन शायद उर्दू अदीब या अरूज़ी के नुक़्ते नज़र ज़्यादा कामयाब या मुस्तफ़ीद न हों।

बह्र-ए-रमल की भी परिभाषा भी वही है जो और सालिम बह्र के साथ है जैसे

[1] अगर यह रुक्न किसी शे’र में 4-बार (यानी मिसरा में 2-बार ] आता है तो बह्र-ए-रमल मुरब्ब: सालिम कहते हैं



2 1 2 2 / 2 1 2 2 यानी फ़ा इला तुन् / फ़ा इला तुन्

2 1 2 2 / 2 1 2 1 फ़ा इला तुन् / फ़ा इला तुन्



[2] अगर यह रुक्न किसी शे’र में 6 बार (यानी मिसरा में 3-बार) आये तो बह्र-ए-रमल मुसद्दस सालिम कहलायेगी



2122 /2122 /2122 यानी फ़ा इला तुन् / फ़ा इला तुन् / फ़ा इला तुन्

2122 /2122 /2122 फ़ा इला तुन् / फ़ा इला तुन् / फ़ा इला तुन्



[3] अगर यह रुक्न किसी शे’र में 8 बार (यानी मिसरा में 4-बार) आता है तो यह बह्र "बह्र-ए-मुसम्मन सालिम’ कहलाती है



2122 /2122 /2122/ 2122 यानी फ़ा इला तुन् / फ़ा इला तुन्/ फ़ा इला तुन् / फ़ा इला तुन्

2122 /2122 /2122 / 2122 फ़ा इला तुन् / फ़ा इला तुन् /फ़ा इला तुन् /फ़ा इला तुन्



[4] और अगर यह रुक्न किसी शे’र में 16 बार (यानी मिसरा मेम 8-बार ) आता है तो यह 16-रुक्नी बहर "बह्र-ए- मुइज़ाफ़ी मुसम्मन सालिम" कहलायेगी

2122 /2122/2122/2122/2122/2122/2122/2122

2122/ 2122/2122/2122/2122/2122/2122/2122



जैसा कि ऊपर कह चुका हूँ अगर्चे (यद्दपि) यह बहर सालिम रुक्न की हैसियत रखता है मगर इस की सालिम शक्ल में बहुत कम अश’आर कहे गये है-पता नही क्यों? इसकी ’मुज़ाहिफ़’ शकल ही ज़्यादा मुस्तमिल (इस्तेमाल में) है

फिर भी कुछ इधर उधर से अरुज़ की किताबों से ,इन्टर्नेट से खोज कर क़ारीं (पाठकों) की सहूलियत को मद्द-ए-नज़र और बात वाज़ेह करने के लिए लगा रहा हूँ । अहबाब(दोस्तों) से दस्तबस्ता (करबद्ध) गुज़ारिश है कि इस बह्र के सालिम शक्ल की कोई और मिसाल मिले तो राकिम-उल-हरूफ़ (इस लेखक को) ज़रूर आगाह कीजिएगा”

जनाब ’सरवर ’ साहब ने ’क़तील सिफ़ाई साहब के शे’र की बह्र-ए-रमल मुसम्मन सालिम’ की निशानदेही की है आप भी मुलाह्ज़ा फ़र्माये



था ’क़तील’ इक अहल-ए-दिल अब उस को भी क्यों चुप लगी है

एक हैरत सी है तारी ,शहर भर के दिलबरों पर

‘ -क़तील सिफ़ाइ

जो डुबाना था मुझे तो क्यों मुझे साहिल दिया था

तोड़ना ही था अगर तो क्यों मुझे यह दिल दिया था



-डा0 कुँअर बेचैन (ग़ज़ल का व्याकरण से)

रू-ब-रू हर बात कहना है यक़ीनन ज़ीस्त आदत

अपने बेगाने सभी हम से ख़फ़ा हैं क्या करें हम

-’आहंग और अरूज़ ’से (कमाल अहमद सिद्दक़ी }



अब इसकी तक़्तीअ कर के देख लेते हैं कि बात कहां तक वाज़ेह (साफ़)हुई

2 1 2 2 / 2 1 2 2 / 2 1 2 2 / 2 1 2 2

था ’क़तील’ इक/ अहल-ए-दिल अब /उस को भी क्यों /चुप लगी है

एक हैरत /सी है तारी /,शहर भर के/ दिलबरों पर

‘ -क़तील सिफ़ाइ

{’को’ ’है’ का वज़न 1- पर पढ़ें ]

अब आप देखेंगे कि 2122(फ़ा इला तुन) की तकरार (आवॄति) मिसरा में 4-बार आया है इसलिए बज़ाहिर (स्पष्ट है )यह मुसम्मन शकल है । अब इसी बह्र में एक दूसरा शे’र लेते हैं और इसकी तक़्तीअ करते हैं

2 1 2 2 /2 1 2 2 / 2 1 2 2 / 2 1 2 2

जो डुबाना/ था मुझे तो /क्यों मुझे सा /हिल दिया था

तोड़ना ही/ था अगर तो /क्यों मुझे यह /दिल दिया था



-डा0 कुँअर बेचैन (ग़ज़ल का व्याकरण से)-साभार

इसी बह्र में एक और शे’र लेकर बात और साफ़ करते हैं

2 1 2 2/ 2 1 2 2/ 2 1 2 2/ 2 1 2 2

रू-ब-रू हर/ बात कहना/ है यक़ीनन/ ज़ीस्त आदत

अपने बेगा/ने सभी हम /से ख़फ़ा हैं /क्या करें हम

-’आहंग और अरूज़ ’से (कमाल अहमद सिद्दक़ी }-साभार

अब एक मिसाल बह्र-ए-रमल मुसद्दस सालिम का भी देख लेते है



हिज्र में तन्हाई का आलम अजब था

डूब कर यादों में तेरी सो गये हम

-’आहंग और अरूज़ ’से (कमाल अहमद सिद्दक़ी }-साभार

और अब इस की तक़्तीअ भी कर लेते हैं

2 1 2 2 / 2 1 2 2 / 2 1 2 2

हिज् र् में तन्/ हाइ का आ /लम अजब था

डूब कर या/दों में तेरी /सो गये हम



यानी 2122 (फ़ा इला तुन्) का गिर्दान (मिसरा में 3-बार) और शे’र में 6-बार आया है इस लिए यह रमल मुसद्द्स सालिम कहलायेगी



एक बात ग़ौर फ़र्मायें



ऊपर के शे’र मिसरा उला में और मिसरा सानी में ’में’ दोनो जगह आया है मगर दोनो जगह इसका वज़न मुख़्तलिफ़ ( भिन्न) है

मिसरा-ऊला में इस का वज़न 2- करार पाता है जब की मिसरा सानी में 1-करार पा रहा है\ जानते हैं क्यों ?

क्योंकि’ रुक्न’ यही तलब कर रहा है बह्र की यही मांग है ।वगरना मिसरा सानी बहर से ख़ारिज़ हो जायेगा । यही है शे’र की नज़ाकत और बारीकियाँ



मिसाल के तौर पर अज़ीम शो’अरा (शायरों) के कलाम लगाने का मक़सद यह भी है कि हम आप उनके मयार-ए-सुखन से वाक़िफ़ हों और वक़्तन-फ़-वक़्तन (समय समय पर )हम अपने अपने कलाम भी देखें कि उस Bench mark से हम कहाँ है और हमारी कोशिश अभी कितनी मश्क़ तलब है

आप सभी कारीं (पाठकों) से गुज़ारिश है कि अपनी रहनुमाई से हमें आगाह करें


------------------
नोट- असातिज़ा [ गुरुवरों ] से दस्तबस्ता  गुज़ारिश  है कि अगर कहीं कुछ ग़लतबयानी हो गई हो गई हो तो बराये मेहरबानी  निशान्दिही ज़रूर फ़र्माएं  ताकि मैं आइन्दा ख़ुद को दुरुस्त कर सकूँ --सादर ]

-आनन्द.पाठक-
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उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 3 [ बह्र-ए-हज़ज ]


उर्दू बह्र पर एक बातचीत -3
बह्र-ए-हज़ज (1 2 2 2 )

[disclaimer clause ; वही क़िस्त -1) का
-----------------------------

[पिछली बातचीत में दो बहूर (बह्र का ब0ब0) -बह्र-ए-मुत्क़ारिब(1 2 2) और बह्र-ए-मुतदारिक (2 1 2) का ज़िक्र कर चुका हूं
ये दोनों बहूर ’ख़्म्मास (5-हर्फ़ी) हैं और सालिम बह्र हैं

डा0 कुँअर बेचैन ने इनका हिन्दी नाम भी रखा है
(1) बह्र-ए-मुतक़ारिब =मिलन छन्द
(2) बह्र-ए-मुतदारिक़ =पुनर्मिलन छन्द

अब आगे बढ़ते हैं .....]

उर्दू में एक और मान्य प्रचलित बह्र है जिसका नाम है -बह्र-ए-हज़ज जिसका मूल रुक़्न है "मफ़ा ई लुन्" और जिसका वज़न है 12 2 2. यह भी एक सालिम बह्र है ।सालिम इस लिए कि इस बह्र की बुनियादी रुक़्न (मफ़ा ई लुन) (12 2 2) (बिना किसी काट छाँट के ,बिना किसी कतर ब्योंत के ,बिना किसी तब्दीली के) अपने इसी शकल में रिपीट (गिर्दान) होगी। यह एक (सुबाई)7-हर्फ़ी बह्र है
’हज़ज’ का लग़वी मानी(dictionary meaning) होता है ’सुरीला’ और सचमुच इस बह्र में कही गई ग़ज़ल बहुत ही सुरीली होती है इसी कारण डा0 कुँअर बेचैन ने इस छन्द का हिन्दी नाम "कोकिल छन्द" रखा है
 अज़ीम शो’अरा (मान्य शायरों ) की यह एक बड़ी ही मक़्बूल बहर है इसी बह्र में काफ़ी कलाम कहे गये हैं और अति प्रचलित (राईज़) भी है
यह रुक़्न भी ’वतद’(3-हर्फ़ी कल्मा) और ’सबब"(2 -हर्फ़ी कल्मा) के इश्तिराक (साझा) से बना है
मफ़ाईलुन   = मफ़ा         +ई       + लुन
=(मीम, फ़े अलिफ़)+ (ऐन,ये)+ (लाम,नून)
= वतद         +सबब     +सबब
=  1 2         +2        +2
                        = 1 2 2 2
एक बात ’वतद" और ’सबब’ की बारे में कहना चाहूँगा
उर्दू अरुज़ के लिहाज से वतद के 3-भेद हैं

(1) वतद-ए-मज़्मुआ
(2) वतद-ए-मफ़्रूक़
(3) वतद-ए-मौकूफ़

उसी प्रकार ’सबब" के भी 2-भेद हैं
(1) सबब-ए-ख़फ़ीफ़
(2) सबब-ए-शकील

मगर मैं यहां इसकी तफ़्सीलात (विस्तृत विवेचना) में नहीं जाना चाहता हूँ बस आप तो हिन्दी में ग़ज़ल के लिए इतना ही समझ लें कि ’सबब’ का वज़न 2 है और ’वतद’ का वज़न 12 या 21 होगा

बहर -ए-हज़ज की परिभाषा भी वही है
(1) अगर यह रुक़्न किसी शे’र में 4-बार (यानी मिसरा मे 2 बार ) आये तो बह्र-ए-हज़ज मुरब्ब: सालिम कहलायेगी
     1222       /     1222
     1222        /    1222
(2) अगर किसी शे’र में यह रुक़्न 6-बार (यानी मिसरा में 3 बार) आये तो "बह्र-ए-हज़ज मुसद्दस सालिम" कहलायेगी
     1222    /   1222  /   1222
     1222     /   1222  /  1222
(3)  अगर किसी शे’र में यह रुक्न 8-बार (यानी मिसरा में 4 बार) आये तो "बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम" कहलायेगी
1222   /1222   /1222  /1222
      1222   /1222   /1222  /1222
(4) अगर किसी शे’र में यह रुक़्न 16-बार (यानी मिसरा में 8 बार ) आये तो भी ये "बहर-ए-हज़ज मुज़िआफ़ी मुसम्मन सालिम)  कहलायेगी ।कभी कभी इसे 16-रुक़्नी बहर भी कहते हैं
(इज़आफ़ मानी दूना करना)
      1222   /1222  /1222  /1222 /1222/   1222/ 1222/ 1222
      1222   /1222  /1222  /1222 /1222/   1222/ 1222/ 1222

इस बह्र में चन्द अश’आर पेश करता हूँ जिस से बात और साफ़ हो जाये..
इसी बह्र में अल्लामा इक़बाल की एक ग़ज़ल के चन्द अश’आर लगा रहा हूँ ,मुलाहिज़ा फ़र्मायें

ऎ पीराने-कलीसा-ओ-हरम! ऎ वाय मजबूरी
सिला इनकी क़दो-काविश का है सीनों की बेनूरी

कभी हैरत, कभी मस्ती,कभी आहे-सहरगाही
बदलता है हज़ारों रंग मेरा दर्दे-महजूरी

फ़क़ीराने-हरम के साथ ’इक़बाल’ आ गया क्योंकर
मयस्सर मीर-ओ-सुलतां को नहीं शाहीने-काफ़ूरी

अब इसकी तक़्तीअ भी कर के देख लेते हैं
1 2 2 2/ 1 2 2 2  / 12 2  2/ 1 2 2 2
ऎ पीराने/-कलीसा-ओ/-हरम! ऎ वा/य मजबूरी
सिला इनकी/ क़दो-काविश/ का है सीनों /की बेनूरी

कभी हैरत/, कभी मस्ती,/कभी आहे/-सहरगाही
बदलता है/ हज़ारों रन्/ ग मेरा दर्/दे-महजूरी

फ़क़ीराने/-हरम के सा/थ ’इक़बाल’ आ/ गया क्योंकर
मयस्सर मी/र-ओ-सुलतां/ को नहीं शाही/ने-काफ़ूरी

ऎ का की को  ने -देखने में तो सबब(2) के वज़न का  है मगर जब बह्र में इसे गुनगुनाइएगा तो बह्र के मांग के मुताबिक इसे 1 के वज़न में पढ़ना पड़ेगा।  मक़्ता के तीसरे नम्बर रुक्न /थ ’इक़बाल आ/ पर ग़ौर फ़र्माये ।यूँ तो इसका वज़न आप के ख़याल से /1 2 2 1 2/ होना चाहिए मगर नहीं/ ’ल’ के सामने ’आ ’ गया अत: ’ल’ और ’आ’ को एक साथ मिला कर पढ़ेंगे कि वज़न 1222 रहे और बह्र से ख़ारिज़ न हो। उर्दू अरूज़ के मुताबिक यह जायज है


इसी बह्र में अब्दुल हमीद ’अदम’ (अदम गोण्डवी नहीं) के चन्द अश’आर इसी सिल्सिले में लगा रहा हूँ

जो पहली मर्तबा आता है उनसे गुफ़्तगू कर के
बड़ा शादाब मिलता है ,बड़ा सरशार मिलता है

मुलाक़ात इस तरह होती है दो वाकिफ़ निगाहों में
कि जैसे झूमकर मयख्वार से मयख़्वार मिलता है

अब इसकी तक़्तीअ कर के भी देख लेते हैं
1  2  2  2 / 1 2 2 2 / 1 2 2 2   / 1 2 2 2
जो पहली मर्/तबा आता /है उनसे गुफ़्/तगू कर के
बड़ा शादा/ब मिलता है/ ,बड़ा सरशा/र मिलता है

मुलाक़ात इस/ तरह होती/ है दो वाकिफ़ /निगाहों में
कि जैसे झू/म कर मयख्वा/र से मयख़्वा/र मिलता है

जो, है में भी वही बात कि बह्र की मांग पर इसे 1-की वज़न पे पढ़ना पड़ेगा
"मुलाकात इस" को इस तरह पढ़ें कि इसका वज़न 1222 पे आ जाये यानी "त इस" को तिस की वज़न पे पढ़ना पड़ेगा

इसी बह्र में चन्द अश’आर इस हक़ीर (अकिंचन) का भी बर्दास्त कर लें

यहाँ लोगों की आंखों में नमी मालूम होती है
नदी इक दर्द की जैसे रुकी मालूम  होती  है

तुम्हारी फ़ाइलों में क़ैद मेरी रोटियां सपने
मेरी आवाज़ संसद ने ठगी ,मालूम होती है

अब इसकी तक़्तीअ कर के देख लेते हैं
1 2 2  2 /1  2  2  2 /1 2 2 2 / 1 2 2 2
यहाँ लोगों /की आंखों में /नमी मालू/म होती है
नदी इक दर्/द की जैसे /रुकी मालू/म  होती  है

तुम्हारी फ़ा/इलों में क़ै/द मेरी रो/टियां सपने
मेरी आवा/ज़ संसद ने /ठगी ,मालू/म होती है

ये तो रही अदबी बातें
आप ने पुरानी हिन्दी फ़िल्म का यह गाना ्ज़रूर सुना होगा ’सूरज; फ़िल्म का है

बहारों फूल बरसाओ ,मेरा महबूब आया है
हवाओं रागिनी गाओ मेरा महबूब आया है

आप ने इस की लय भी सुनी होगी ,सुर ताल भी सुने होंगे मगर यह न सोचा होगा कि यह गाना ’बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम में है/
अब देखिए कैसे
अब मैं इसकी तक़्तीअ करता हूं
1 2 2 2/1 2  2 2 / 1 2 2  2/ 1 2 22
बहारों फू/ल बरसाओ/ ,मेरा महबू/ब आया है  (रफ़ी साहब ने मेरा में ’मे’ को दबा दिया है और मिरा की वज़न पे
हवाओं रा/गिनी गाओ/ मेरा महबू/ब आया है   (गाया है)
आप स्वयं फ़ैसला करें
अब आप यह पूछेंगे कि अदबी तज़्किरा (चर्चा) में फ़िल्मी गीत का क्या सबब ?
हमारा मक़सद सिर्फ़ यह दिखाना है कि अगर गीत बह्र में हो तो कितना दिल कश हो जाता है कैसे सुर ताल मिल जाते हैं कैसे ज़ेर-ओ-बम (उतार-चढ़ाव ,रिदम) से आहंग (लय) पैदा होता है। अगर आप ग़ौर फ़र्मायेंगे तो बहुत से फ़िल्मी गीत ऐसे मिल जायेंगे जो किसी न किसी बह्र में होंगे। पिछली बार मैने ऐसे ही 2-3 गानों का ज़िक्र किया था जैसे...

इशारों /इशारों/ में दिल ले/ने वाले/बता ये/हुनर तू/ने सीखा/कहां से
122  /122 /  122     / 122 / 12 2/ 1 2 2/ 1 2 2/ 1 2 2        (बह्र-ए-मुत्क़ारिब)

तेरे प्या/र का आ/सरा चा/हता हूँ /वफ़ा कर/ रहा हूँ /वफ़ा चा/हता हूं  (शायद ’धूल का फूल” )
122    /1 2    2    / 1 2   2   /  1 2 2  / 1 2     2   /  1 2 2   /   1  2  2 /  1 2   2            (बह्र-मुत्क़ारिब)

अब तो नई फ़िल्मों के गाने की बात ही छोड़िए...अब वो बात कहां? अब तो मयार (स्तर) ’खटिया’ ’मचिया’ झंडू बाम ’ फ़ेविकोल पर आ गया है।खैर..
मिसाल के तौर पर अज़ीम शो’अरा (शायरों) के कलाम लगाने का मक़सद यह भी है कि हम आप उनके मयार-ए-सुखन से वाक़िफ़ हों और वक़्तन-फ़-वक़्तन हम अपने अपने कलाम भी देखें कि उस Bench mark से हम कहाँ है और हमारी कोशिश अभी  कितनी मश्क़ तलब है
आप सभी कारीं (पाठकों) से गुज़ारिश है कि अपनी रहनुमाई से हमें आगाह करें

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नोट- असातिज़ा [ गुरुवरों ] से दस्तबस्ता  गुज़ारिश  है कि अगर कहीं कुछ ग़लतबयानी हो गई हो गई हो तो बराये मेहरबानी  निशान्दिही ज़रूर फ़र्माएं  ताकि मैं आइन्दा ख़ुद को दुरुस्त कर सकूँ --सादर ]

-आनन्द.पाठक-
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उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 2 [ बह्र-ए-मुतदारिक ]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत-2
बह्र-ए-मुत्दारिक ( 212)

[disclaimer clause :- -वही-(भाग-1 का)

[ पिछली बार , हमने ’बह्र-ए-मुत्क़ारिब’(122) पर बातचीत की थी .अभी हम सालिम रुक्न पर ही बातचीत जारी रखेंगे .इस बहस को अभी फ़िलवक़्त यहीं छोड़ कर आगे बढ़ते है अगली बहर है ’बह्र-ए-मुत्दारिक’
कुछ दिनों बाद हम फिर लौट कर आयेंगे और बह्र-ए-मुत्क़ारिब पर और बातचीत करेंगे ...

एक बात और
यह लेख अपने हिन्दीदाँ दोस्तों के नज़्रिये से लिखा जा रहा है जिस से मोटा मोटी बहर और वज़न समझने में सुविधा हो .उर्दू अरूज़ की बारिकियां शायद इस में उतनी नज़र न आये।]


उर्दू में एक बह्र है "बह्र-ए-मुतदारिक’ जिसका बुनियादी रुक़्न है "फ़ाइलुन" और जिसका वज़न है 212. ’बह्र-ए-मुतक़ारिब’ की तरह यह भी एक ख़म्मस रुक़्न (5-हर्फ़ी) है।  कुँवर बेचैन जी ने इस का हिन्दी नाम ’पुनर्मिलन छन्द" दिया है उन्हीं के शब्दों में .."मुतदारिक’ शब्द अरबी भाषा का है जिसका अर्थ है --खोई हुई वस्तु पाने वाला। इसी अर्थ के आधार पर हमने इसे ’पुनर्मिलन छन्द’ का नाम दिया है  .।
शायद कालान्तर में इस बह्र का यह हिन्दी नामकरण भी प्रचलित हो जाय जैसी ’नीरज’ जी ने ’रुबाई’ के लिए ’मुक्तक’ नाम दिया है। खैर.....

बह्र-ए-मुतदारिक का रुक़्न भी ’सबब’(2-हर्फ़ी) और वतद (3 हर्फ़ी) के योग से बना है वैसे ही जैसे ’बह्र-ए-मुतक़ारिब का रुक़्न बना है

फ़ाइलुन   =फ़ा + इलुन
  = (फ़े,अलिफ़)+ (ऎन,लाम,नून)
   =सबब+वतद
   = 2 + 12 = 2 1 2

आप ध्यान दें कि बह्र-ए-मुत्क़ारिब का मूल रुक्न " फ़ ऊ लुन’  भी सबब(2) और वतद(12) के योग से बना है

फ़ऊलुन = फ़ऊ + लुन
=  (फ़े,ऎन,वाव) + (लाम,नून)
=  वतद + सबब
=  12  +  2 =1 2 2
वैसे ही आप पायेंगे कि सिर्फ़ ’सबब’ और ’वतद’ का क्रम बदला हुआ है वरना दोनों ही खमम्स (5-हर्फ़ी) रुक़्न है
अब प्रश्न उठता है कि ’फ़ाइलुन’ में ’सबब’ के लिए ’फ़ा’ तज़्वीज़ किया तो फ़ऊलुन’ में सबब के लिए ’लुन’ क्यों लिया ?

इस पर मैं कुछ कह नहीं सकता ,ये तो अरूज़ियों की बातें हैं ।उनके पास ’सबब’ के लिए और भी ऐसे ही कुछ हर्फ़ हैं जिसका वज़न 2 ही है पर लफ़्ज़ (जुज़ ,कलमा) अलग अलग है और अलग अलग रुक़्न में ये लोग अलग अलग प्रयोग करते है। आप की जानकारी के लिए कुछ ऐसे ही ’जुज़’(टुकड़ा) लिख रहा हूं

सबब (वज़न 2)       : फ़ा , तुन् , ई, ..लुन्.. ,मुस्.., तफ़् , मुफ़् , ऊ , वग़ैरह
वतद (वज़न 1,2 या 2,1): मफ़ा , इला ,इलुन्, लतुन् ..फ़ाअ’..तफ़अ’.लात्... वग़ैरह्

एक दिलचस्प बात और

इन रुक़्न (ब0ब0 अर्क़ान ) के और भी नाम से जाना जाता है ।कुछ अरूज़ की किताबों में इसे ’फ़ेल’ फ़अ’ल(ब0ब0 अफ़ाईल तफ़ाइल  उसूल) के नाम से भी जाना जाता है । हर रुक्न में (बाद में आप देखेंगे) कि ऎन.फ़े.लाम में से कोई 2-हर्फ़ ज़रूर आता है इसीलिए ’रुक़्न ’ का दूसरा नाम ’फ़.अ’,ल भी है [( अ’) को आप ’ऎन’ समझे और (अ) को अलिफ़]

इन रुक़्न पर "ज़िहाफ़’( इस पर बाद में बातचीत करेंगे) लगाने से इनकी शक्ल में तब्दीली हो जाती फिर ये रुक़्न ’सालिम’ नहीं रह पाते .कभी कभी तो ’फ़े.अ’.लाम भी नहीं रह पाता तो ऐसे मुज़ाहिफ़ रुक़्न (ज़िहाफ़ लगाने के बाद बदली हुई रुक्न) को किसी मानूस (मान्य व प्रचलित) हम वज़न रुक्न से बदल लेते हैं कि फ़े.अ’.लाम की शर्त बरक़रार रहे

अब मूल विषय पर आते हैं

बह्र-ए-मुतदारिक का मूल रुक़्न ’फ़ाइलुन’ है और वज़न 2 1 2 है

और परिभाषा भी वही कि
(1) अगर यह रुक्न किसी शे’र में 4 बार(यानी मिसरा में 2 बार) आये तो बह्र-ए-मुत्दारिक मुरब्बअ सालिम कहलायेगी
    212  / 212
    212  / 212
(2) अगर यह रुक़्न किसी शे’र में 6 बार रिपीट (यानी मिसरा में 3 बार) आये तो बह्र-ए-मुत्दारिक मुसद्दस सालिम कहलायेगी
    212  /212/  212
    212  /212 /212
(3) अगर यह रुक़्न किसी शे’र में 8 बार रिपीट (यानी मिसरा में 4 बार) आये तो बह्र-ए-मुत्दारिक मुसम्मन सालिम कहलायेगी
     212  /212  /212  / 212
     212  /212  /212 /  212
(4) अगर यह रुक़्न किसी शे’र में 16 बार रिपीट (यानी मिसरा मे 8 बार) आये तो भी यह बह्र-ए-मुत्दारिक  मुइज़ाफ़ी मुसम्मन सालिम   ही कहलायेगी

 अब मैं जनाब ’सरवर आलम राज़ ’सरवर’ के 16 रुक्ऩी ग़ज़ल के चन्द अश’आर इसी बह्र में आप के लिए लगा रहा हूं मुलाहिज़ा फ़र्माये (पूरी ग़ज़ल और अन्य ग़ज़लें आप हिन्दी में यहाँ देख सकते हैं http://sarwarraz.com/ के artcle section में ek pardha Uthaa meGhazal no 2..]

              दिल दुखाए कभी ,जाँ जलाए कभी, हर तरह आज़माए तो मैं क्या करूँ ?
मैं उसे याद करता रहूँ हर घड़ी , वो मुझे भूल  जाए  तो मैं क्या करूँ ?

हाले-दिल गर कहूँ मैं तो किस से कहूँ,और ज़बाँ बन्द रक्खुँ तो क्यों कर जियूँ ?
ये शबे-इम्तिहां और ये सोज़े-दूरूं ,खिरमने-दिल  जलाए  तो मैं क्या करूँ ?

मैने माना कि कोई ख़राबी  नहीं , पर करूँ क्या तबियत  ’गुलाबी’ नहीं
मैं शराबी नहीं ! मैं शराबी नहीं ! वो नज़र  से पिलाए तो मैं क्या करूँ ?

अब मैं इसकी तक़्तीअ करता हूं

212    /212   /212  /212   /212    /212   /212   /212
             दिल दुखा/ए कभी ,/जाँ जला/ए कभी,/ हर तरह/ आज़मा/ए तो मैं/ क्या करूँ ?
मैं उसे /याद कर/ता रहूँ /हर घड़ी /, वो मुझे /भूल  जा/ए  तो मैं /क्या करूँ ?

हाले-दिल/ गर कहूँ /मैं तो किस /से कहूँ,/और ज़बाँ /बन्द रक्खुँ/ तो क्यों /कर जियूँ ?
ये शबे-/इम्तिहां /और ये /सोज़े-दूरूं/ ,खिरमने-/दिल  जला/ए  तो मैं/ क्या करूँ ?

मैने मा/ना कि को/ई ख़रा/बी  नहीं /, पर करूँ /क्या तबि/यत  ’गुला/बी’ नहीं
मैं शरा/बी नहीं /! मैं शरा/बी नहीं /! वो नज़र / से पिला/ए तो मैं/ क्या करूँ ?

अब आप देखेंगे कि ’वो’ ’तो’ देखने में तो सबब (वज़न 2) के लगते है मगर जब आप तरन्नुम में पढ़ेंगे तो इस को वज़न 1 के ज़ोर से पढ़ेंगे तभी इस बहर के आहंग का लुत्फ़ आयेगा ।ये बह्र के आहंग की मांग है
ऊपर ’रक्ख़ुँ’ पर ध्यान दे...सही लफ़्ज़ तो ’रखूँ’ ही था मगर बहर की मांग के कारण इसे ’रक्ख़ुँ’ लिखना पड़ा बग़ैर मानी में किसी तब्दीली के\
यही बात ’तबि’ में भी है इसे ’तबी’ की वज़न पर पढ़ेंगे

अब शकील बदायूनी साहेब की  एक ग़ज़ल के चन्द अश’आर इसी बह्र में लगा रहा हूं मुलाहिज़ा फ़र्मायें

बे-झिझक आ गए ,बेख़बर आ गए
      आज रिन्दों में वाइज़ किधर आ गए

गुफ़्तगू उनसे होती ये किस्मत कहां
   ये भी उनका करम है नज़र आ गए

आना जाना भी ये ख़ूब है आप का
बे-कहे चल दिए बेख़बर आ गए

हम तो रोते ही थे इश्क़ मे रात दिन
तुम भी आख़िर इसी राह पर आ गए

अब इसके तक़्तीअ भी कर के देख लेते हैं
 212    /212    /212    /212
बे-झिझक/ आ गए /,बेख़बर /आ गए
      आज रिन्/दों में वा/इज़ किधर/ आ गए

गुफ़् त गू/ उन से हो/ती ये किस्/मत कहां
   ये भी उन/का करम/ है नज़र/ आ गए

आना जा/ना भी ये /ख़ूब है /आप का
बे-कहे/ चल दिए /बेख़बर/ आ गए

हम तो रो/ते ही थे /इश्क़ मे/ रात दिन
तुम भी आ/ख़िर इसी /राह पर /आ गए
 देखने में .. में..से...भी..ना...तो..ही..तो इनका वज़न 2 लगता है मगर तलफ़्फ़ुज़ की अदायगी में बह्र के मांग के मुताबिक इन्हें वज़न 1 पर पढ़ेंगे (और इसे ही मात्रा गिराना कहते हैं)
चूँकि इस बहर में सालिम रुक़्न ’फ़ाइलुन’(212) का हर शे’र में 8-बार (यानी मिसरा में 4 बार) रिपीट हुआ है अत: इस बह्र का नाम हुआ ’बह्र-ए-मुत्दारिक मुसम्मन सालिम"

इसी बह्र मे चन्द अश’आर इस ग़रीब खाकसार के भी बर्दास्त कर लें

आँधियों से न कोई गिला कीजिए
       लौ दिए की  बढ़ाते रहा कीजिए

सर्द रिश्ते भी इक दिन पिघल जायेंगे
       ग़ुफ़्तगू का कोई सिलसिला कीजिए

हम वतन आप हैं हम ज़बां आप हैं
दो दिलों में न यूँ फ़ासिला कीजिए

अब इसके तक़्तीअ कर के भी देख लेते हैं

212    /212    /212    /212
आँधियों /से न को/ई गिला /कीजिए
       लौ दिए/ की  बढ़ा/ते रहा /कीजिए

सर्द रिश्/ते भी इक/ दिन पिघल/ जायेंगे
       ग़ुफ़् तगू/ का कोई /सिलसिला/ कीजिए

हम वतन /आप हैं /हम ज़बां /आप हैं
दो दिलों /में न यूँ /फ़ासिला /कीजिए

यहाँ भी ...भी ..को...पर मात्रा गिराई गई है और इसे 1-की वज़न पर ही पढ़ा जाएगा
इस बह्र का भी वही नाम हुआ...’बह्र-ए-मुतदारिक मुसम्मन सालिम.
ज़िहाफ़ात की बात बाद में करेंगे
आप के सुझाव की प्रतीक्षा रहेगी...बातचीत  जारी रहेगी....
क्रमश:.......

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नोट- असातिज़ा [ गुरुवरों ] से दस्तबस्ता  गुज़ारिश  है कि अगर कहीं कुछ ग़लतबयानी हो गई हो गई हो तो बराये मेहरबानी  निशान्दिही ज़रूर फ़र्माएं  ताकि मैं आइन्दा ख़ुद को दुरुस्त कर सकूँ --सादर ]

-आनन्द.पाठक-
Mb                 8800927181ं
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