मंगलवार, 12 जनवरी 2021

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 76 [ तस्कीन-ए-औसत का अमल ]

तस्कीन-ए-औसत का अमल 


इससे पहले हमने तख़नीक के अमल पर चर्चा की थी ।जैसे

क़िस्त 59--मीर की बह्र की चर्चा के समय
क़िस्त 60-- रुबाई की बह्र की चर्चा के समय

 आज तस्कीन-ए-औसत के अमल पर चर्चा करेंगे । संक्षेप में क़िस्त 61 [ माहिया की बह्र की चर्चा करते समय इस पर भी चर्चा कर चुका हूँ ]आज विस्तार से इस पर चर्चा करूँगा।

वस्तुत: दोनो का अमल एक जैसा ही है फ़र्क़ बस यह है कि तक़नीक़ के अमल में ’दो consecutive रुक्न

में 3-मुतस्सिल मुतहर्रिक " आते हैं तब लगाते  है जब कि ’तस्कीन के अमल में ’एक ही रुक्न मे" 3-मुतस्सिल 

मुतहर्रिक आते हैं तब अमल दरामद होता है । शर्ते दोनो ही स्थिति में वही है ।

1- यह अमल हमेशा ’मुज़ाहिफ़ रुक्न [ ज़िहाफ़ शुदा रुक्न ] पर ही लगता है---

सालिम रुक्न पर कभी नहीं लगता। जैसे अगर्चे बह्र-ए-कामिल [ मुतफ़ाइलुन 1 1 212 ] या बह्र-ए-वाफ़िर [ मुफ़ा इ ल तुन  1 2 1 1 2 ] में भी मुतस्सिल [लगातार ]3-मुतहर्रिक आते है पर तस्कीन-ए-औसत का अमल नहीं होता ।
कारण ? आप लगा कर देख लें--बात साफ़ हो जायेगी । मुतफ़ाइलुन [11212]  बदल जायेगा ---- [ आप बताएँ]  

यानी मूल अर्कान / बह्र बदल जायेगी --जिसकी मनाही है इस के अमल में 

2- इस अमल से बह्र बदलनी नहीं चाहिए

अब आगे बढ़ते है --

मुतदारिक का एक आहंग है  - मुतदारिक मुसम्मन सालिम = फ़ाइलुन--फ़ाइलुन--फ़ाइलुन--फ़ाइलुन

 212---212---212---212-अगर इस पर ’ख़ब्न ’ का ज़िहाफ़ लगा दे तो रुक्न बरामद होगी


112---112---112---112---यानी 

फ़’अलुन ---फ़’अलुन ---फ़’अलुन --फ़’अलुन  यानी मुज़ाहिफ़ रुक्न --और तीन मुतहररिक ’एक ही ’

रुक्न "फ़’अलुन’ [ फ़े--ऎन--लाम ] और अब इस पर तस्कीन-ए-औसत का [ तख़नीक का नहीं ध्यान रहे ] 

अमल हो सकता है 

हम 112---112---112---112- को मूल बह्र कहेंगे क्यों कि इसी बह्र से हम कई मुतबादिल औज़ान [ वज़न का बहु वचन  ]

बरामद करेंगे---जो आप बाअसानी कर सकते है ।


अब हम ’अदम ’ साहब की एक ग़ज़ल लेते हैं --जो इसी आहंग की ’मुज़ाइफ़ ’ [ दो-गुनी ] शकल है 

यानी 112---112---112--112-// 112--112--112--112


मयख़ाना-ए-हस्ती में अकसर हम अपना ठिकाना भूल गए

या होश से जाना भूल गए या होश में आना  भूल  गए


असबाब तो बन ही जाते हैं तकदीर की ज़िद को क्या कहिए

इक जाम तो पहुँचा था हम तक ,हम जाम उठाना भूल गए


----

-----


मालूम नही आइने में चुपके से हँसा  था कौन ’अदम’

हम जाम उठाना भूल गए ,वो साज़ बजाना  भूल गए


[ पूरी ग़ज़ल गूगल पर मिल जायेगी ]

आप की सुविधा के लिए --मतला की तक़्तीअ’ कर दे रहे हैं ---बाक़ी अश’आर की तक़्तीअ आप कर लें --तो मश्क़ 

का मश्क़ हो जायेगा \

  2    2  / 1  1  2 /  2  2 / 2  2   //   2  2   / 1  1 2  / 2  2/ 1 2 2

मय ख़ा/ न:-ए-हस/ ती में /अकसर //हम अप /ना ठिका/ना भू/ल गए =   22--112---22--22--//22--112--22---112


2    2  / 1 1  2  / 2 2/ 1 1 2 // 2 2 / 1 1  2 / 2 2 / 1 1 2    =  22----112---22-112-//22--112---22---112

या हो /श से जा/ना भू/ल गए // या हो/श में आ/ना  भू/ल  गए

 इस में आवश्यकतानुसार --11 को 2 लिया गया है जो ’तस्कीन के अमल से जायज़ है ।


अब एक ग़ज़ल शकील बदायूनी वाली लेते है 


करने दो अगर कत्ताल-ए जहाँ तलवार की बाते करते हैं

अर्ज़ा नही होता उनका लहू जो प्यार की बाते करते  है


ग़म में भी रह एहसास-ए-तरब देखो तो हमारी नादानी

वीराने में सारी उम्र कटी गुलज़ार  की बातेम करते  हैं


ये अहल-ए-क़लम ये अहल-ए-हुनर देखो तो ’शकील’ इन सबके जिगर

फ़ाँकों से हई दिल मुरझाए हुए ,दिलदार की बातें करते हैं


[ पूरी ग़ज़ल गूगल पर मिल जायेगी ]

आप की सुविधा के लिए --मतला की तक़्तीअ’ कर दे रहे हैं ---बाक़ी अश’आर की तक़्तीअ आप कर लें --तो मश्क़ 

का मश्क़ हो जायेगा ।


 2 2    / 1  1 2    /  2  2  / 1  1 2 //  2 2 / 1 1  2 / 2  2   / 2 2= 22--112---22---112--// 22--112---22--22

कर ने / दो अगर /कत ता /ल जहाँ //तल वा/र की बा/ते कर /ते हैं


  2    2  / 1 1 2 / 2  2  / 1 1 2  // 2 2    / 1 1  2 / 2  2  / 2 2  =  22---112--22--112 // 22--112--22--22

अर् ज़ा /नही हो/ ता उन/का लहू /जो प्या/ र की बा/ते कर /ते  है


यानी किसी भी रुक्न के 112  को हम  22 कर सकते है [ तस्कीन-ए-औसत की अमल से ]

मगत  22-- को   112  नहीं कर सकते । और करेंगे तो किस अमल से ??? यही मेरा सवाल है ---अजय तिवारी जी से 


आप ऐसी ही 2-4 ग़ज़लो पर मश्क़ करते रहें इन्शाअल्लाह इसे  सीखने में आप को कामयाबी मिलेगी


-आनन्द.पाठक-






गुरुवार, 12 नवंबर 2020

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 001 [ सालिम रुक्न कैसे बनते है ?

 उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 001 [ सालिम रुक्न कैसे बनते है ?


क़िस्त 000 में हम 8-सालिम रुक्न की चर्चा कर चुके है । ये बनते कैसे  हैं , आज हम उसी पर चर्चा करेंगे।

 हर सालिम रुक्न सबब और वतद के योग से बनता है। आप जानते हैं कि शायरी के लिए 8- सालिम रुक्न मुक़र्रर है

। देखिए कैसे यह वतद और सबब के कलमा के  योग से बनते हैं ।


1- फ़ऊलुन فعولن  फ़ऊ+ लुन  = 12+ 2  =  1 2 2  =वतद -सबब

2- फ़ाइलुन فا علن  = फ़ा + इलुन  = 2 + 12  =  2 1 2  =सबब+ वतद

3- मुफ़ाईलुन مفا ٰعلن  मुफ़ा +ई+लुन  = 12 + 2 +2  = 1 2 2 2  = वतद सबब+सबब

4- फ़ाइलातुन فاعلاتن फ़ा +इला+ तुन = 2 +1 2 + 2 = 2 1 2 2 सबबवतद+ सबब

5- मुस तफ़ इलुन مستفعلن    = मुस+तफ़+इलुन = 2+2+ 12 =2 2 1 2  सबब+सबबवतद 

6- मुतफ़ाइलुन متفاعلن = मु +त+फ़ा+इलुन = (1+1)+2+12= 1 1 2 1 2     =  सबब+सबब +वतद 

7- मुफ़ा इ ल तुन مفاعلتن मुफ़ा_ इ+ल+तुन =  12 + {1+1) + 2= 1 2 1 1 2 = वतद + सबब+ सबब

8- मफ़ऊलातु مفعلاتُ = मफ़+ऊ+लातु = 2 +2+2 1 = 2 2 2 1  =    सबब+सबब+ वतद 


ध्यान से देखें :- 

[अ] सभी रुक्न में -वतद -एक खूंटॆ [ PEG] की तरह स्थिर  गड़ा हुआ है -और -सबब- एक रस्सी सा बँधा हुआ है इस खूंटे से,-जो कभी -वतद -के बाएं तो कभी दाएं आ जाते है --मगर वतद को छोड़ नही रहे है। इसीलिए मैने पिछले क़िस्त में कहा था कि अरबी में - वतद -का एक अर्थ ’खूँटा’ भी  होता है और सबब का एक अर्थ ’रस्सी’ ।’सबब’ कभी”वतद’ के बाएँ --कभी दाएँ कभी दोनॊ बाएं -कभी दोनो दाएँ  घूम रहे हैं।

[ब] आप देख रहे है -सबब - के किए कहीं -लुन--कहीं - फ़ा- कहीं -ई- कहीं -तुन-- कहीं -मुस-=- कहीं -तफ़- कहीं--मफ़- ये सब दो हर्फ़ी कलमा है जिसमे पहला हर्फ़ ’मुतहर्रिक’ है और दूसरा हर्फ़ :साकिन’ । सवाल यह है कि सबब-ए-ख़फ़ीफ़ के लिए कोई एक  ही कलमा काफी था ,पता नहीं इतने लाने की क्या ज़रूरत थी । यह तो कोई अरूज़ी ही बता सकता है ।

[स]  यही बात वतद के लिए भी है । कहीं- फ़ऊ- --कहीं -इलुन- कहीं -मुफ़ा- --कहीं -इला-लिया ,।

[द] मज़े की बात तो सबब-ए-सकील में के लिए है। वाफ़िर [ मफ़ा इ ल तुन ] में इसे --इ-ल- लिया मगर कामिल [ मु त फ़ा इलुन] में इसे मु-त -लिया[ दोनॊ मुतहर्रिक ] । मगर अलग अलग।

इन सभी सालिम अर्कान पर एक एक कर के चर्चा कर लेते हैं ।

1- फ़ऊलुन  فعولن =2 12 

’फ़ऊलुन’[ फ़े’लुन]- एक सालिम रुक्न है और यह -"बहर-ए-मुतक़ारिब ’ का बुनियादी रुक्न है ।यह 5-हर्फ़ [ फ़े-ऐन- वाव--लाम --नून = 5 ] से मिल कर बना है तो इसे  ’ख़म्मासी’ रुक्न भी कहते हैं [ख़म्स: माने-5-वस्तुओं का समाहार ]-] फ़ऊ --क्या है ? कुछ नहीं है ।यह सालिम रुक्न " वतद-ए-मज्मुआ [फ़ऊ] + सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [लुन] से मिल कर बना है यानी 1 2+2 = 1 2 2 से बनता है।

इस हमवज़न अल्फ़ाज़ हैं जैसे-----ज़माना/-- फ़साना-- बहाना--निशाना---वफ़ा कर/ सितमगर/ इशारा/ निगाहों / सितारों /सनम /मुकाबिल  ---  ऎसे बहुत से अल्फ़ाज़।

एक बात और । इसका वज़न हिन्दी के के गण [ देखें क़िस्त 000 ] यगंण [ यमाता = 1 2 2 ] के वज़न पर उतरता है । बस एक व्यवस्था है वज़न दिखाने का ।-फ़े -ऐन-वाव  [ मुतहर्रिक +मुतहर्रिक + साकिन ] है जो वतद-ए-मज़्मुआ की नुमाइन्दगी कर रहा है बस। और लुन ? लुन भी कुछ नहीं है । लाम -नून [ मुतह्र्रिक +साकिन] सबब-ए-ख़फ़ीफ़ की नुमाइन्दगी कर रहा है । 

ज़िहाफ़ [ चर्चा आगे किसी मुनासिब मुक़ाम पर करेंगे] --हमेशा सालिम  रुक्न पर ही लगता है और वह भी सालिम रुकन के ’जुज़’ [ टुकड़े पर ] ही लगता है ।यानी कोई ज़िहाफ़ [ चाहे मुफ़र्द हो या मुरक़्क़ब हो]लगेगा तो सबब के जुज़ पर या वतद के जुज़ पर ही लगेगा । ये ज़िहाफ़ात भी अलग अलग अमल के होते है _- सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर लगने वाले ज़िहाफ़ात अलग [ जैसे---ख़ब्न--तय्य--क़ब्ज़---कफ़--कस्र--हज़्फ़--आदि

वतद-ए-मज़्मुआ पर लगने वाले ज़िहाफ़ात अलग [ जैसे-ख़रम--सलम--कतअ’ बतर--इज़ाला आदिक-----॥ 

इसमें कुछ ज़िहाफ़ात तो शे’र में  -सद्र/इब्तिदा के लिए ही ख़ास है --।] कुछ अरूज़ और ज़र्ब के लिए ख़ास है । ज़िहाफ़ात की चर्चा --आगे कही करेंगे।

2- फ़ाइलुन [2 1 2 ]= مفا ٰعلن 

’फ़ाइलुन’ - एक सालिम रुक्न है और यह "बह्र-ए-मुतदारिक" का बुनियादी रुक्न है। यह भी एक 5- हर्फ़ी यानी ख़म्मासी रुक्न भी कहते हैं[यह रुक्न  सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [ फ़ा] +वतद-ए-मज़्मुआ [ इलुन] से मिल कर बना है

 यानी  2+1 2= 2 1 2 के योग से बनता है। आप "फ़ऊलुन [ 1 2 2 ] से इसकी तुलना करें । देखें कि क्या फ़र्क़ है --व्यवस्था में, वतद-सबब के लिहाज़ से ।

इसके हमवज़न  अल्फ़ाज़ हैं----- प्यार का /आशना / कामना / सामना/ दिल्ररूबा / ऎ सनम/ ऐसे बहुत से अल्फ़ाज़। 

एक बात और। हिंदी के गण से तुलना करें [ देखें 000] तो इसका वज़न ’रगण’ [ राज़भा = 2 1 2] पर उतरता है

इसीलिए कहते हैं कि ये दोनो रुक्न हिन्दी छन्द शास्त्र  से उर्दू अरूज़ में आए हैं और उसमे ’ फ़ाइलुन’ -पहले आया । ठीक ’फ़ऊलुन’ की तरह इस पर वही ज़िहाफ़ लगेगे जो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ और वतद-ए-मज़्मुआ पर लगेंगे मगर कुछ क़ैद के साथ । कारण कि इस रुक्न की शुरुआत "सबब’ [फ़ा]से हो रही है जब कि ’फ़ऊलुन’[फ़ऊ] शुरुआत ’ वतद-ए-मज़्मुआ’ से शुरु हो रही है । ज़िहाफ़ की चर्चा बाद में करेंगे।

3- मुफ़ाईलुन [ 1 2 2 2 ] =مفا ٰعلن 

’मुफ़ाईलुन ’ -भी एक सालिम रुक्न है और यह "बह्र-ए-हज़ज" का बुनियादी रुक्न है ।यह भी एक 7-हर्फ़ी [ मीम---फ़े--अलिफ़--ऐन- ये--लाम--नून=7] सुबाई रुक्न है। यह वतद-ए-मज्मुआ [ मुफ़ा ]+ सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [ई]+ सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [लुन] से मिल कर बना है यानी  = 12+2_+2 = 1 2 2 2 से बनता है । यह हिन्दी छन्द-शास्त्र के किसी गण से नहीं मिलता है ।

इसके हमवज़न अल्फ़ाज़ हो सकते है--- मना कर दो / वफ़ा करना / सितमगर हो/ पता दे दो / निभाना है / --जैसे बहुत से अल्फ़ाज़।

इस रुक्न पर लगने वाले कुछ ख़ास ख़ास ज़िहाफ़ के नाम यहाँ लिख रहा हूँ जैसे ख़रम---कफ़---कस्र--क़ब्ज़---सरम--हत्म--जब्ब:--बत्र--सतर-- । इसके अलावा और भी  फ़र्द और मुरक़्कब ज़िहाफ़ भी लगते हैं।

ज़िहाफ़ की चर्चा बाद में करुँगा। 

4- फ़ाइलातुन  [ 2 1 2 2 ] =فاعلاتن

फ़ाइलातुन - भी एक सालिम रुक्न है और यह ’बह्र-ए-रमल’ का बुनियादी रुक्न है। यह भी एक -7- हर्फ़ी [सुबाई] है।  यह रुक्न सबब-ए-ख़फ़ीफ़[ फ़ा] + वतद-ए-मज्मुआ [इला] + सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [तुन] =  2+ 1 2 + 2 = 2 1 2 2  से बनता है।यह भी एक 7-हर्फ़ी सुबाई रुक्न है ।

इसके हम वज़न अल्फ़ाज़ हो सकते हैं ---दिल-ए-बीना-- .नासुबूरी----बेहुज़ूरी -- अंजुमन है--- जैसे बहुत से अल्फ़ाज़ ।

इस सालिम रुक्न पर लगने वाले ख़ास ख़ास ज़िहाफ़ है --ख़ब्न---कफ़---क़स्र--तश्शीस---हज़्फ़--शकल आदि । इसके अलावा और भी बहुत से फ़र्द और मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ भी लगते है ।

5- मुसतफ़इलुन [ 2 2 1 2 ]

”’मुसतफ़इलुन’- भी एक सालिम रुक्न है और यह ’बह्र-ए- रजज़" का बुनियादी रुक्न है । यह भी एक 7-हर्फ़ी  सुबाई रुक्न है।

यह रुक्न सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [मुस] +सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [तफ़]+ वतद-ए-मज्मुआ [ इलुन ] से मिल कर बना है।यानी  2+2+12 =2 2 1 2

इसके हम वज़न अल्फ़ाज़ हो सकते है जैसे - आ जा सनम / आए नहीं / इतना सितम / जैसे बहुत से अल्फ़ाज़ 

इस सालिम रुक्न पर लगने वाले मुख्य ज़िहाफ़ हैं ------ख़ब्न---तय्यी--क़तअ’--इज़ाला और भी बहुत से फ़र्द और मुरक़्क़ब ज़िहाफ़

6- मुतफ़ाइलुन [ 1 1 2 1 2 ]

मुतफ़ाइलुन - भी एक सालिम रुक्न है और यह  ’बह्र-ए-कामिल ’ का बुनियादी रुक्न है। यह भी एक 7-हर्फ़ी सुबाई रुक्न है।

यह रुक्न सबब-ए-सकील [ मु त ] + सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [फ़ा]+वतद-ए-मज्मुआ [इलुन ] से मिल कर बना है यानी 1 1+ 2+ 1 2 = 1 1 2 1 2 

यहाँ पर प्रदर्शित 1 1 को आप मुतहर्रिक हर्फ़ समझे न कि हिंदी का ’लघु वर्ण’ समझें।

ध्यान देने की बात है कि पहला - सबब- सबब-ए-सकील है और जब कि दूसरा सबब -सबब-ए-ख़फ़ीफ़ है ।कहने का मतलब यह कि 

सबब-ए-सकील पर लगने वाले ज़िहाफ़ात अलग होते हैं जब कि सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर लगने वाले ज़िहाफ़ात अलग होते हैं।

[ एक विशेष टिप्पणी --पिछली क़िस्त [000] में "फ़ासिला सुग़रा" की चर्चा किए थे कि वह चार हर्फ़ी कलमा जिसमे मुतहर्रिक+ मुतहर्रिक + मुतहर्रिक +साकिन  हर्फ़ हो यानी 1 1 2 जैसे--बरकत-- हरकत आदि जिसमें -ते [ते] साकिन है और बाक़ी सभी मुस्तमिल [ इस्तेमाल किए हुए ] हर्फ़ पर ज़बर का हरकत है । तो मु त फ़ा इलुन को फ़ासिला + वतद से भी दिखा सकते हैं । मगर हमने तो ऊपर सबब और वतद के परिभाषा से ही दिखा दिया और बता दिया । इसीलिए मैने कहा था कि 

फ़ासिला के बग़ैर भी अरूज़ का काम चल सकता है ।]

इस के हमवज़न अल्फ़ाज़ हो सकते है ---यूँ ही बेसबब / न फ़िरा करो / कोई शाम घर / भी रहा करो /[बशीर बद्र की एक ग़ज़ल से]-या ऐसे ही बहुत से जुमले।

या -तू बचा बचा / के न रख इसे / न कही जहाँ / में अमाँ मिली / [ इक़बाल की एक ग़ज़ल से ] 

और इस पर लगने वाले मुख्य मुख्य  ज़िहाफ़ात है ---इज़्मार--वक़्स--क़त’अ--इज़ाला --

7- मफ़ाइलतुन [ 1 2 1 1 2 ]

मफ़ाइलतुन - भी एक सालिम रुक्न है और यह बह्र-ए-वाफ़िर का बुनियादी रुक्न है। यह भी एक 7-हर्फ़ी सुबाई रुक्न है।

यह  वतद-ए-मज्मुआ [ मुफ़ा ]+ सबब-ए-सकील[ इ ल] + सबब-ए-ख़फ़ीफ़[ तुन] से मिल कर बना है यानी 12 1 1 2 = 1 2 1 1 2 

यहाँ पर प्रदर्शित 1 1 को आप मुतहर्रिक हर्फ़ समझे न कि हिंदी का लघु वर्ण ।

[ एक विशेष टिप्पणी --इस रुक्न को भी फ़ासिला + सबब से दिखा सकते हैं यानी वतद+फ़ासिला = 12 112    और   वतद और सबब से भी।आप को जो सुविधाजनक लगे।

  एक बार ध्यान से देखें -- क्या आप को मफ़ा इ ल तुन [ वाफ़िर] --बरअक्स मु त फ़ाइलुन [ कामिल का नहीं लगता ?

इस पर लगने वाले मुख्य ज़िहाफ़ात हैं------इज़्मार---वक़्स---कतअ’--इज़ाला --और भी बहुत से फ़र्द और मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ भी।

8-  मफ़ऊलातु [ 2 2 2 1 ] 

मफ़ऊलातु -- भी एक सालिम 7-हर्फ़ी सुबाई रुक्न तो है मगर यह किसी सालिम बह्र की बुनियादी रुकन नहीं है। हो भी नहीं सकती । कारण कि इसका हर्फ़-उल-आखिर -तु- [ ते पर 

पेश की हरकत है ] मुतहर्रिक है । उर्दू ज़बान की फ़ितरत ऐसी है कि मिसरा का आख़िरी हर्फ़ -साकिन -हर्फ़ पर गिरता है, मुतहर्रिक पर कभी नहीं गिरता ।तो ?

यह मिसरा के आखिर में अपने मुज़ाहिफ़ शक्ल  [ जिसमे आखिरी साकिन हो जाता है ] में ही आ सकता है । हाँ यह रुक्न अपने  सालिम शकल में मुरक़्क़ब बहर के बीच में आ सकती

है और आती भी है । मगर ज़्यादातर अपनी मुज़ाहिफ़ शकल में ही आती है ।

इस के हम वज़न अल्फ़ाज़ तो सालिम शकल में नहीं दिए जा सकते । हाँ क़सरा-ए-इज़ाफ़त और वाव-ओ-अत्फ़ की तरक़ीब से हो सकता है ।

इस पर लगने वाले ्मुख्य मुख्य ज़िहाफ़ात हैं---अज़्ब--क़स्म--जम्म-- अक़्ल --नक़्स-- और भी बहुत से मुफ़र्द और मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ भी।

उर्दू शायरी में प्रचलित 8-सालिम अर्कान की बात तो हो चुकी मगर अबतक "वतद-ए-मफ़रूक़" का ज़िक्र तो आया नहीं जब कि पिछले क़िस्त [000]  में इस पर चर्चा कर चुका हूँ।

ऊपर वर्णित दो रुक्न -ऎसे हैं जिनके इमला की दो शकले [ उर्दू स्क्रिप्ट में लिखने के दो तरीक़े ] मुमकिन है और लिखे जाते हैं । एक तरीक़े को --मुतस्सिल और दूसरा तरीक़े को मुन्फ़सिल कहते है।

मुत्तस्सिल तरीके में अर्कान में मुस्तमिल तमाम हर्फ़ -सिल्सिले- से यानी एक दूसरे से मिला कर लिखते है जब कि -मुन्फ़सिल- तरीक़े में कुछ हर्फ़ में ’फ़ासिला- देकर लिखते है

मुत्तस्सिल तरीक़ा तो वही जो ऊपर लिखा जा चुका है । मुन्फ़सिल तरीका नीचे लिख रहा हूँ ।

तरीक़ा कोई हो- वज़न दोनो में समान ही रहेगा और तलफ़्फ़ुज़ भी लगभग समान रहेगा।

--फ़ाइलातुन [ रमल ] فاع لاتن =’ मुन्फ़सिल शकल ]= 2 1 2 2 = फ़ाअ’ ला तुन = [ फ़ा अ’ में---ऎन ्मुतहर्रिक है यानी --्फ़े [-मुतहर्रिक] +अलिफ़ [साकिन] + ऐन [ मुतहर्रिक } ---यानी वतद-ए-मफ़रुक़ [ दोनो मुतहर्रिक के बीच में फ़र्क है। 

--मुसतफ़इलुन [ रजज़]   مس تفع لن= मुन्फ़सिल शकल = 2 2 1 2 = मुस तफ़अ’ लुन = [ तफ़ अ’ -यहाँ भी -ऎन- मुतहर्रिक है ते -[ मुतहर्रिक] + फ़े [ साकिन ] + ऐन [ मुतहर्रिक ]-- यानी वतद-ए-मफ़रुक़ [ दोनो मुतहर्रिक के बीच में फ़र्क है। 

अब आप कहेंगे कि इस मुक़ाम पर इसकी चर्चा क्यों कर रहे हैं ? बिलकुल सही। इसलिए कर रहे है कि कुछ मुरक़्क़ब बह्र [ जैसे-----\] में यह रुक्न अपने मुन्फ़सिल शकल में ही आती हैं।

और उस बह्र  लगने वाले ज़िहाफ़ -वतद-ए-मफ़रुक -वाले ज़िहाफ़ लगेंगे। बहुत से लोग यही गलती कर देते है और उस मुक़ाम पर भी --वतद-ए- मज्मुआ वाले ज़िहाफ़ लगा देते हैं । हमे इसका पास [ ख़याल ] रखना होगा

ये दोनो कोई नया रुक्न नहीं है । ये तो बस वर्णित रुक्न के बदली शकल हैं ।नया कुछ भी नहीं।

-आनन्द.पाठक-